धर्म कर्म में हो बदलाव

धर्म कर्म में हो बदलाव

धर्म , संस्कृति की सरल धारा में ,
कर्म की क्षमता को भूल गए हैं ।

कुरीतियां , जहरीली हवा बहाकर ,
कैसे सबको मानव धर्म में वापस लाएं ।

आंखों को बंद कर मन की ग्रंथि चोक हुई,
आलोचक भी हथियार डाल चुके हैं ।

शुद्ध विचारों की गंभीरता पर हास्य आया ,
सहनशीलता शब्द पर लगाम खेंच चुके हैं ।

समाज रचना का बदलाव समय आया है,
कृत्रिम बुद्धिमता के असुर कदम फेंक चुके हैं ।

नरेंद्र परिहार

नागपुर महाराष्ट्र

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