एक लड़की, रजनीगंधा सी

एक लड़की,रजनीगंधा सी

मस्त मलंग हाव भाव,
तन मन अति सुडौल ।
अल्हड़ता व्यवहार अंतर,
मधुर मृदुल प्रियल बोल।
अधुना शैली परिधान संग,
चारुता चंचल चंदा सी ।
एक लड़की, रजनीगंधा सी ।।

अंग प्रत्यंग चहक महक ,
नव यौवन उत्तम उभार ।
आचार विचार मर्यादामय ,
अंतःकरण शोभित संस्कार ।
ज्ञान ध्यान निज सामर्थ्य ,
हौसली उड़ान नंदा सी ।
एक लड़की, रजनीगंधा सी ।।

चाह अग्र कदम हर क्षेत्र ,
मिटा पुरात्तन सोच आरेख ।
ललक झलक प्रगति पथ,
प्रेरणा आत्मसात मीन मेख ।
तज अंध विश्वास कुरीतियां,
उर भावना पूज्या वृंदा सी ।
एक लड़की, रजनीगंधा सी ।।

सहन समाज व्यंग्य बाण ,
लैंगिक कटाक्ष अनंत वहन ।
पग पग पहरा शील चरित्र ,
स्वतंत्रता बिंदु मनन गहन ।
अहम भूमिका परिवार राष्ट्र,
निर्मल पुनीत पावन गंगा सी ।
एक लड़की ,रजनीगंधा सी ।।

महेन्द्र कुमार

नवलगढ़ (राजस्थान)

Similar Posts

  • Hindi kavita : मेरी इच्छा

    मेरी इच्छा ( Meri ichha : Kavita )    काश हवा में हम भी उड़ते तितलियों से बातें करते नील गगन की सैर करते अपने सपने को सच करते बादलों को हम छू लेते चाँद पर पिकनिक मनाते  मनचाही मंजिल हम पाते पेड़ो पर झट चढ़ कर हम जंगली जानवरों से बातें करते पंछियों से…

  • बसंत ऋतु | Basant Ritu

    बसंत ऋतु ( Basant Ritu )    आ गए ऋतुराज बसंत चहुं ओर फैल रही स्वर्णिम आभा, सुंदर प्राकृतिक छटा में खिली पीले पुष्पों की स्वर्ण प्रभा। मां शारदे की पूजा का पावन अवसर है इसमें आता, ज्ञानदायिनी देवी की कृपा से जगत उजियारा पाता। बसंत ऋतु आते ही सुंदर सुरम्य वातावरण हुआ, ठंडी पवन…

  • सिंदूरी सूरज | Poem Sindoori Suraj

    सिंदूरी सूरज ( Sindoori suraj )    सिंदूरी सूरज विशाल तेजी से अस्त हुआ धीरे-धीरे सांझ को बुलावा दे चला सरसराती पवन ने बालियों को यू छुआ पंछियों के कलरव ने अंबर से धरती तक चारों दिशाओं को गुंजायमान किया घरौंदो को लौट चलो कि अब अंधेरा हुआ गायों के गले की बजती हुई घंटियां…

  • Kavita Corona ka Kahar | कोरोना का कहर

    कोरोना का कहर ( Corona ka kahar )     हर सिम्त चल रही है,बस मौत की हवा। थम  जाये  कोरोना, अब  कीजिए  दुआ।   संकट में नौकरी है,दहशत में ज़िन्दगी, आई है कहर बनके,यह बला सी वबा।   भयभीत हैं सब लोग,दुबके हैं घरों में, खता किसी की है,हमको मिली सजा।   उपचार  के…

  • दशानन | Dashanan

    दशानन ( Dashanan )  ( 2)  जली थी दशानन की नगरी कभी कभी हुआ था वध रावण के तन का जला लो भले आज पुतले रावण के उसने चुन लिया है घर आपके मन का.. मर गया हो भले वह शरीर के रूप मे किंतु कर रहा रमन विभिन्न स्वरूप मे बसा ,हुआ खिल खिला…

  • संसार न होता | Kavita Sansar na Hota

    संसार न होता….! ( Sansar na hota )   मन का चाहा यदि मिल जाता, तो फिर यह संसार न होता। हार न होती, जीत न होती, सुख दु:ख का व्यापार न होता। रोग-शोक-संताप न होता, लगा पुण्य से पाप न होता। क्यों छलकाते अश्रु नयन ये, जो उर में परिताप न होता। स्नेह स्वार्थ…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *