गाली गलौज

गाली गलौज

मेरे 4 वर्षीय बेटे विभु का जन्मदिन था। विभु अपने जन्मदिन को लेकर कई दिन से बहुत उत्साहित था। मैं उसका दिल नहीं तोड़ना चाहती थी। मैने विभु के जन्मदिन पर बच्चों की पार्टी करने की सोची। इसलिए मैंने प्लान बनाया कि अगर पड़ोस के विभु के हमउम्र बच्चों को बर्थडे सेलिब्रेशन में शामिल किया जाए तो कितना अच्छा रहेगा? विभु को भी बहुत खुशी मिलेगी। बच्चों का मन भी बहल जायेगा।

अपने दो पड़ोसियों के बच्चों को जन्मदिन हेतु आमंत्रित करने के लिए मैं उनके घर के लिए निकली तो मैंने देखा- मेरी दोनों पड़ोसन (रेखा और सुमन) घर के बाहर ही सड़क पर खड़ी होकर एक दूसरे से बातें कर रही थीं। मेरी उनसे काफी अच्छी दोस्ती थी लेकिन पिछले 3 महीने से अचानक उन्होंने घर पर आना-जाना बंद कर दिया था। व्यस्तता के चलते मेरा भी घर से निकलना नहीं हुआ, अतः मुलाकात नहीं हो पाई, हालांकि फोन पर एक दो बार बात हुई थी। मैंने उन दोनों को देखकर अभिवादन करते हुए कहा:-

“शाम को विभु का जन्मदिन है। मेरी ओर से आज आप दोनों के बच्चों की दावत है। आप याद से अपने बच्चों को शाम 7 बजे तक घर पर भेज देना। हम ज्यादा बड़ा प्रोग्राम तो कर नहीं रहे हैं, सिर्फ बच्चों की ही पार्टी की है। मैं चाहती हूँ कि विभु और उसके दोस्तों को इंजॉय करने का और साथ में समय बिताने का मौका मिले।”

रेखा बोली:- “मैं तो अपने बच्चों को नहीं भेजूंगी?”

“क्यों क्या हुआ?” मैंने आश्चर्य से पूछा।

“बुरा तो मत मानना बहन। लेकिन तुम्हारे ससुर जी हमारे बच्चों को पसंद नहीं करते हैं। कोई भी बात हो.. वह हमारे बच्चों से मां बहन की गाली देकर बात करते हैं। इसलिए मैने अपने बच्चों को तुम्हारे घर भेजना बंद कर दिया है। इस बात को तुमने भी नोटिस किया होगा।”

“अच्छा, तो इसलिए बच्चें घर पर खेलने काफी दिनों से नहीं आ रहे। मुझे तो ससुर जी की इस गन्दी हरकत के बारे में पता ही नहीं था। अच्छा हुआ.. आपने मुझे इस बारे में बता दिया। मैं अभी जाकर ससुर जी से इस बारे में बात करती हूँ। मैं उनको समझाऊंगी, लेकिन मेरी भी सीमाएं हैं। मैं उनको एक हद तक ही समझा सकती हूँ। मेरी बात वे मानें या न मानें.. मैं कह नहीं सकती। वे मुझसे काफी बड़े हैं। मैं उनकी ओर से आपसे हाथ जोड़कर माफी मांगती हूँ।” मैंने कहा।

“आप क्यों माफी मांग रही हो। इसमें आपकी गलती थोड़ी ही है। तुमसे तो हमारे संबंध हमेशा से अच्छे रहे हैं, कभी झगड़ा नहीं हुआ। सिर्फ तुम्हारे ससुर और बच्चों की वजह से ही हमने तुम्हारे घर से दूरी बनाई।” रेखा ने जवाब दिया।

“अच्छा हुआ, आपने मुझे यह बात बताई। आपमें बड़ी हिम्मत है। अगर आपकी जगह मैं होती तो शायद इस बारे में आपसे कह भी न पाती, नज़र चुराती, तुमसे बचती। आप ससुर जी की तरफ से आश्वस्त रहिए, मैं घर पहुँचकर उनसे बात करती हूँ।” मैंने रेखा को आश्वस्त करते हुए कहा। सुमन चुपचाप हमारी बातें सुन रही थी। लेकिन इसके बाद भी रेखा ने बोलना जारी रखा।

“मान लो, अगर हमारे बच्चों की गलती भी थी… तो क्या वे हमारे बच्चों को गाली देकर समझाएंगे या बात-बात पर डांटेंगे? बच्चों को प्यार से भी तो समझाया जा सकता है। बच्चें गन्दी बातें सुनेंगे तो गन्दा ही तो सीखेंगे, बोलेंगे।”

“आप सही कहती हो। आपका गुस्सा जायज है। मैं अभी घर जाकर ससुर जी से बात करती हूँ। आप शाम को अपने बच्चों को घर जरूर भेज देना, मुझे आप दोनों के बच्चों का इंतज़ार रहेगा। कोशिश रहेगी कि आपको निकट भविष्य में कभी शिकायत का मौका न मिले और फिर से हमारे सम्बंध मधुर हो जायें और मन की कड़वाहट घुल जाये।” मैंने रेखा की नाराजगी दूर करने की कोशिश की।

घर पहुँचकर मैं सीधे पापा जी(ससुर जी) के पास गई और उनसे कहा:-

“पापा जी, आज विभु के जन्मदिन को सेलिब्रेट करने पड़ोस के बच्चे आएंगे। मेरी आपसे विनती है कि आप उन बच्चों पर गुस्सा ना करें। बच्चें जो करें, उनको करने दें। आप बच्चों से कुछ कहना मत।”

“बेटा, मैं बच्चों को भला कुछ क्यों कहूँगा।” ससुर जी मुझसे बोले।

मैंने पिताजी को पड़ोसन वाली सब बातें बता दी।

“अच्छा, वह मेरे बारे में ऐसे बोल रही थी। मैं तो कभी गाली नहीं देता लेकिन अब मैं उन्हें गाली भी दूंगा और शैतानी करने पर मारूंगा भी सालों को। अगर उन्होंने बदतमीजी दिखाई तो मैं बर्दाश्त नहीं करूंगा।” ससुर दोटूक बोले।

“पापा जी, आपने या हमने बच्चों को सुधारने का ठेका थोड़ी ही ले रखा है। हमारा जोर हमारे घर के बच्चों पर ही तो है। अगर पड़ोसी के बच्चें शाम को घर आतें हैं तो उन्हें आप आने देना। बच्चों को कुछ मत कहना।” मैंने उनसे पुनः अपनी बात रखते हुए निवेदन किया।

मैं जानती थी कि सारी गलती मेरे ससुर की है। उनको अक्सर मैंने गाली गलौज के साथ बात करते देखा था लेकिन वे बच्चों को भी न बख्शेंगे, मुझे इसका नहीं पता था। मैं मुँह बनाकर वहाँ से चली गयी। उनसे ज्यादा बोलना मुझे ठीक नहीं लगा।

रात में 10 बजे तक बर्थडे सेलिब्रेशन चला। प्रोग्राम निबट जाने के बाद, जब सब बच्चे अपनी-अपने घर चले गए तब पिताजी घर वापस आये। इतना कहने के बाद भी रेखा ने अपने बच्चों को नहीं भेजा था जबकि सुमन के बच्चें प्रोग्राम में आये थे। रेखा का गुस्सा जायज था। उसकी जगह मैं होती तो शायद मैं भी यही करती।

विचारणीय प्रश्न:-
अक्सर ऐसा होता है कि परिवार के किसी भी एक सदस्य की वजह से हमें समाज में शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है। लोग हमसे बचने लगते हैं। घर आने से कतराने लगते हैं। ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो अपने मन की बातें आपसे कह पाते हैं। बात स्पष्ट बोलने में बहुत हिम्मत चाहिए होती है।

लोग बातें मन में रखते हैं, आपके सामने आने से कतराते हैं और बचकर निकल जाते हैं। और तो और पूछने पर बात बताते भी नहीं। अगर कोई आपका शुभचिंतक, परिवार का सदस्य या दोस्त आपसे मन की बात कह रहा है या समस्या को शेयर कर रहा है तो कहीं ना कहीं वह आपका महत्व अपने जीवन में समझता है।

वह आपको बेहतरीन इंसान मानकर आपको खोना नहीं चाहता। वह चाहता है कि उक्त समस्या.. जिसकी वजह से उनकी बोलचाल बंद हुई… उनका आना-जाना बंद हुआ और उनमें दूरियां बन गई… बस किसी तरह से यह समस्या दूर हो जाए और उनका पहले की तरह.. उस घर में आना-जाना, आपसे बातचीत शुरू हो जाए।

हमारी और हमारे परिवार के सदस्यों की भाषा ऐसी हो जोकि लोगों को अपना बनाएं। हमें कब, कहाँ, क्या बोलना है? यह समझने के लिए हमारी पूरी उम्र भी कम पड़ जाती है। अतः नपे तुले शब्दों में सोच-समझकर बोलना बहुत जरूरी है। अपनी बातों से ही हम लोगों को अपना या पराया बनाते हैं।

बच्चों को, बड़ों को समझाने के हजार तरीके हो सकते हैं, जरूरी नहीं कि अपनी बातों में गालियों को शामिल किया जाए। ज्यादातर लोगों को लगता है कि गाली का प्रयोग करने से उनकी बातों में वजन हो जाएगा, जबकि ऐसा नहीं है। इस तरह की गन्दी बातों से/अपशब्दों से सभ्य लोग बचते हैं।

अपनी बातों में गाली का इस्तेमाल करने वाले लोगों से और ऐसे परिवार से वे खुद को और अपने बच्चों को दूर कर लेते हैं। प्रत्येक बच्चें के माता पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा अच्छी बातें सीखें, बुरी संगति व गलत लोगों से बचकर रहे।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

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