गृहशिल्पी

गृहशिल्पी

जब शिल्पी की शादी हुई तब उसकी उम्र 24 वर्ष थी।वह भी अन्य लड़कियों की तरह अपने जीवनसाथी की अर्धांगिनी बन उसके सुख-दुख बांटने ससुराल आ गयी।
वह पढ़ी लिखी तो थी ही सुलझी और समझदार भी थी वरना पढ़ाई बीच मे छोड़कर अपने बूढ़े पिता का मान रखने की खातिर शादी के लिए बिना एक शब्द कहे राजी न हो जाती।
कुछ बातें हम किताबों से सीखते हैं तो कुछ हमे वक्त सिखा देता है।शिल्पी जवानी की दहलीज पर पांव रख ही रही थी कि मां को बीमारी ने छीन लिया। अभी वह कुछ समझ पाती कि घर की अकेली युवती होने से सारी जिम्मेदारी उसके सर पर आन पड़ी।
बूढ़े पिता एकमात्र घर के कमाऊ सदस्य थे जो दिनभर खेतों पर पिसकर गृहस्थी की चक्की चला रहे थे।दोनो बड़े भाई निठल्ले और कामचोर थे तो छोटा भाई अभी स्कूल जाता था।
चौके बर्तन से लेकर बाजार-हाट सब शिल्पी को ही करने पड़ते।भावज अपने कमरे में पड़ी रहतीं और खाना बनाना ही एकमात्र जिम्मेदारी समझतीं थीं।घर मे 2 जवान भाई होते हुए भी घर की सारी फिक्र शिल्पी को ही करनी पड़ती।
बड़े भैया रामवचन ताश खेलना और गप्पें लड़ाकर दिन पार कर देना ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य समझते तो मंझले भैया कालेज जाने के बहाने आवारागर्दी करते,लड़कियां छेड़ते।
पराए धन को कोई कब तक अपने पास रख सकता है सो बूढ़े पिता ने बेटी की शादी उचित वर देखकर कर दी।बेटी के ससुराल जाते ही घर की रौनक भी जाती रही। अब घर काटने को दौड़ता था।
शिल्पी सौभाग्यशाली थी जो उसे ससुराल अच्छी भले न मिली लेकिन पति समझदार मिला।सास और ननद के बात-बात पर ताने सुनने के बाद भी वह व्यथित नही होती।
वह जानती थी कि नई गृहस्थी बसाने में बर्तन आवाज करते हैं, बाद में सब ठीक हो जाता है। लेकिन जब दान-दहेज के लिए उसे खूब जली-कटी सुनाई जातीं तो उसका मन व्यथित हो जाता।
आखिर उसके पिता ने हर पिताओं की तरह अपनी सामर्थ्य से बढ़कर दहेज दिया लेकिन आदतन ससुराल वालों को लगा कि उनके साथ धोखा हुआ है। आखिर मोटरसाइकिल की जिद पकड़े ससुर रामप्रसाद की इच्छा उसका बूढ़ा लाचार बाप पूरा नही कर सका था।
शिल्पी उनकी जली कटी बातें सुनकर खून का घूंट पीकर रह जाती।आज उसके हाथ मे कुछ नही था। यदि उसके भाई निठल्ले न होते तो क्या उसे इस तरह से ताने सहने पड़ते!!
हालांकि शिल्पी जानती थी कि दहेज मानसिक समस्या है लड़की वाले चाहे जितना दे दें लड़के वालों का पेट खाली ही रहता है। शिल्पी ने एक दिन दबी जुबान से पति से अपनी छूटी पढ़ाई को फिर से शुरू करने की इच्छा जताई।
पति अवधेश भी पढ़े लिखे थे।पढ़ाई का महत्व वह समझते थे सो उन्होंने सहमति दे दी।शिल्पी को तो मानो मन की मुराद मिल गयी।
 उधर शिल्पी के ससुराल आते ही मायके में उसकी भावज ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए।रामवचन बीवी के पल्ले से बंधा हुआ आदमी था सो जो वह कहती वही करता।
बात बंटवारे तक आ गयी तो शिल्पी को खबर हुई।जब शिल्पी मायके आई तो उसे सब बदला हुआ नजर आया।जैसा घर वह छोड़कर गयी थी वैसा अब कुछ न बचा था।
फांको के नौबत आ गए थे।छोटा भाई तो स्कूल जाता लेकिन दोनो जवान भाई  कमाने की उम्र में जुए और शराब में घर लुटाने को आमादा थे।
शिल्पी से घर की हालत देखी न गयी।बाबू अब चारपाई पर आ चुके थे। घर संभालने की जिम्मेदारी रामवचन और मंझले भैया पर थी लेकिन वो दूसरी ही दुनिया मे खोए थे। शिल्पी ने उम्मीद न होते हुए भी भावज को समझाने का निर्णय लिया।
“भाभी,घर की हालत तुमसे छिपी नही है।दोनो भैया पूरा दिन ऐसे ही गुजार कर शाम को शराब पी लेते हैं।खेती है तो वह भी परती पड़ी रहती है। भैया हफ्ते में 2 दिन मजूरी कर जो कमाते हैं वह जुए और शराब में लुटा देते हैं।आगे तुम्हारे भी बाल बच्चे होंगे तो क्या उनको सड़क पर पालोगी?”
“बिट्टी,हमारी वो सुनते ही नही हैं, कह कह कर थक गए कि शराब न पियो लेकिन इनके कान में जूं तक नही रेंगती।उनकी देखा देखी देवर जी भी शराब पीने लगे हैं।”
उसने इतना कहा और रोने लगी।शिल्पी ने जब भाभी के मुंह से ऐसा सुना तो उसे आशा की एक किरण नजर आयी। उसे लगा कि भाभी को समझाने से घर टूटने से बच सकता है।
“भाभी, स्त्री के हाथ मे घर की बागडोर होती है।वह जिस ओर चाहे घर को ले जा सकती है।घर को स्वर्ग या नर्क बनाना स्त्री के हाथ मे होता है।तुम चाहो तो सबको सही दिशा दे सकती हो।
अभी कुछ नही बिगड़ा।पत्नी यह अच्छे से जानती है कि पति को कैसे समझाना है।”शिल्पी ने अंतिम वाक्य कह कर संकेतों में ही भावज से बड़ी बात कह दी थी।
काफी देर तक भावज को समझाने के बाद शिल्पी ससुराल लौट आयी।
                            ★★
दिन बीतते रहे।भाग्य ने खेल दिखाया। शिल्पी शिक्षिका बन गयी।उधर मायके में शिल्पी का भावज को समझाना रंग लाया और धीरे-धीरे रामवचन और मंझले भैया की बुरी आदतें जाती रहीं।
वह अब खेतों में खूब मेहनत करते।खेती से बचे समय का भी वह सदुपयोग करते। अंततः उनकी गरीबी जाती रही।
                           ★★
एक स्त्री सिर्फ मां ही नही होती शिल्पकार भी होती है।घर को स्वर्ग बनाना वह अच्छे से जानती है।शिल्पी की दूरदर्शिता ने आज दोंनो घरों की खुशियां लौटा दी थीं।

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