भारत मे हिंगलिश का प्रयोग सबसे पहले कब और किसने किया था
भारत मे हिंगलिश का प्रयोग सबसे पहले कब और किसने किया था

हम लोग अपनी बोलचाल की भाषा में कई सारी भाषाओं का प्रयोग करते हैं अधिकतर हिंदी भाषी क्षेत्र के लोग हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी के भी कई शब्द बोलते हैं जिसे आजकल लोग हिंगलिश के नाम से जानते हैं लेकिन हिंगलिश का प्रयोग सबसे पहले कब हुआ था और किसने किया था कि आपको पता है।

जवाब जानने के लिए हम पहले कहानी के बारे में जानते हैं 1931 में कोलकाता से हिंदू कॉलेज जो कि आज प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी के नाम से जाना जाता है मैं भद्रलोक नाम के एक व्यक्ति ने एक मामले पर बैठक बुलाई ।

यह मामला था एक युवक प्रोफ़ेसर के भविष्य का जो यहां पर पढ़ाया करते थे उनका नाम था हेनरी लुइस विवेन डिरोजियो, जिन पर आरोप था कि वे अपने विद्यार्थियों को विद्रोह के लिए उकसाते हैं।

गौ मांस खाने , मूर्ति पूजा का विरोध करने, जनेऊ ना पहनने के लिए उकसाते हैं । इस प्रोफ़ेसर की छाप इस तरह की थी। उनके विद्यार्थी एक धार्मिक समारोह में छंद की जगह होमर के इल्लियाड की पंक्ति पढ़ते पकड़े गए थे।

प्रोफेसर के भविष्य के फैसले लेने वाली बैठक में केशव चंद्र सेन ( ब्रम्हा समाज के प्रमुख नेता) के दादा जी राम कोमुल सेन भी शामिल थे, साथ ही अन्य दो ब्रिटिश भी शामिल थे।

भद्रलोक की वजह से हेनरी लुइस विवेन डिरोजिओ को अपना प्रोफेसर का पद छोड़ना पड़ा था और इन्हें अपनी बातें कहने का मौका भी नही दिया गया था।

हेनरी लुइस विवेन डिरोजिओ का जीवन

1809 में हेनरी लुइस विवेन डिरोजियो का जन्म हुआ था इसके पिता का नाम फ्रांसिस डीरीजीओ और माता का नाम सोफी जॉनसन था।

ब्रिटिश शासन के दौरान कोलकाता का काफी महत्वपूर्ण शहर था और यहीं पर हेनरी लुइस बड़े हुए इनकी पढ़ाई धुररूमटोला अकैडमी में हुई।

इसके संस्थापक डेविड ड्रमोंड थे, ड्रमोंड ही डिरोजिओ के मन ने स्वतंत्रता के विचार डाले। उन्होंने बताया कि किसी भी परंपरा को वहां से बात किया स्वीकार करना सही नहीं है इस स्कूल में 6 से 14 साल की उम्र तक डीरीजीओ ने पढ़ाई की और यहीं पर उनकी सोच को एक दिशा मिली।

वे स्कूल के दौरान क्रिकेट नाटक व अंग्रेजी साहित्य में रुचि रखते थे 13 साल की उम्र में ही उनकी पहली कविता 19 18 सो 82 में इंडिया रिजल्ट में प्रकाशित हुई थी।

स्कूल से निकलने के बाद 14 साल की उम्र में उन्होंने अपने पिता की कंपनी में जहां उनके पिता काम करते थे नौकरी करने लगे और 2 साल बाद 16 साल की उम्र में भागलपुर नील की खेती करने के लिए चले गए।

लेकिन यहां पर भी हेनरी लेखन कार्य किया करते थे, जब इनकी रचना सविता इंडिया गजट में छप रही थी तब इंडिया गजट के संपादक जॉन ग्रांट का ध्यान इनकी तरफ खींचा।

डिरोजियो की कविता को छापने के लिए उन्हें वापस कोलकाता बुला लिए और यहां पर 1827 में इनका पहला कविता संग्रह ‘पोएम्स’ प्रकाशित हुआ।

1828 में डिरोजिओ वापस कलकत्ता आ गये और इनकी कविता ‘द फकीर ऑफ जँघीरा’ और ‘ए मेट्रिकल टेल’ प्रकाशित हुई।

उस समय अंग्रेजी बोलने वाली समुदाय के बीच बंगाल में इनकी पहचान बनने लगी और 18 साल की उम्र में यह बंगाल में साहित्य की एक उभरते हुए सितारे के रूप में जाने जाने लगे ।

इन्हें भारतीय माना जाता है क्योंकि इन्होंने कई सारी पार्टी विषय पर कविताएं लिखी है जैसे ‘द हार्प ऑफ इंडिया’, ‘टू इंडिया माय नेटिव लैंड’ में उन्होंने भारत की प्रतिष्ठा को दर्शाया है ।

द फकीरा जंजीरा 2050 लाइन की एक दर्दनाक अंतर धार्मिक प्रेम कहानी है जिसमें हिंदू मुस्लिम ईसाई के प्रति का मिश्रण देखने को मिलता है।

भारतीय चेतना के जड़ से जुड़े हुए कविता भी इन्होंने लिखी है और यहीं पर हिंग्लिश का पहला उदाहरण सामने आया।

Without the dreams, dear opium

Without a single hope I am,

Spicy scent, delusive joy,

Chillum hither lao, my boy (italics mine)

From ‘ode_ from the Persian of Half’ Queez’

डोरिजिओ ने सौंदर्यशास्त्र से लेकर सामाजिक परिवर्तन तक की विभिन्न विषयों पर बरी सावधानी से चुने हुए शोध के साथ खूबसूरत निबंध लिखे हैं ।

इनका महत्वपूर्ण योगदान हिंदू कॉलेज में बतौर एक शिक्षक के रूप में रहा है । उन्होंने छात्रों को  पाठ्यक्रम से हटकर साहित्य को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया करते थे ।

इनके छात्र अपने शिक्षक के घर विभिन्न मसलों पर चर्चा करते थे उनका सबसे ज्यादा असर हिंदू रूढ़िवादी समाज  का विरोध साथ ही वह मांस का समर्थन करने वाले के रूप में होने लगा और लोग इनकी निंदा करने लगे ।

और जब भैया बात कलकत्ता के बाहर लोगों तक पहुंची तब इन्हें आरोपी बनाया जाने लगा । जल्दी लोग इनके खिलाफ खड़े होने लगे और 3 साल के कार्यकाल के अंदर ही नहीं को इनको हिंदू कॉलेज से निकाल दिया गया ।

इसके बाद ही पत्रकारिता के क्षेत्र में आ गए और ईस्टइंडियन  समाचार पत्र की शुरुआत की । यही एंग्लो इंडियन की आवाज बंद कर बाद में उभरी ।  23 वर्ष की अल्पायु से पहले ही 1831 में  इनकी मौत हो गई।

इनको बंगाली समाज को आकार देने, सांस्कृतिक, सामाजिक और बौद्धिक आंदोलन को ही बंगाल का नवजागरण मना गया, जिसमे डिरोजिओ के मार्ग पर चलने वालों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

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