गुरु

श्रीगुरु चरण सरोज रज

गुरु चरणों की रज यदि मिल जाए तो यह जीवन धन्य हो जाता है। कबीर दास जी महाराज कहते हैं —
यह तन विष की बेलरी ,
गुरु अमृत की खान ।
शीश दिए जो गुरु मिले,
तो भी सस्ता जान।
मनुष्य जीवन ही मिलना एक तो बहुत दुर्लभ माना गया है। उससे भी अधिक दुर्लभ है मनुष्य जीवन में गुरु की प्राप्ति होना। बड़े-बड़भागी वह लोग हैं जिनको अपने जीवन में गुरु मिल जाते हैं।
गुरु ही होता है जो मनुष्य जीवन के कर्तव्य का बोध कराता है। जीवन में व्याप्त अंधकार को मिटाता है। जन्मो जन्मो की प्यास बुझाता है।

सामान्य जन्म तों प्रत्येक जीव का होता है। मनुष्य जीवन में ही गुरु की आवश्यकता होती है। मनुष्य यदि सीखना चाहे तो प्रत्येक घटना कुछ ना कुछ सिखा जाती है। कहते हैं दत्तात्रेय भगवान ने 24 गुरु बनाएं। उन्होंने कुत्ता जैसे जीव ही नहीं बल्कि वेश्या समझी जाने वाले समाज से बहिष्कृत नारी से भी सीख लेने की बात की।
मनुष्य यदि जागृत हो तो वह हर किसी से कुछ न कुछ सीख सकता है।

गुरु के प्रति एक तड़प भी होनी चाहिए। स्वामी विवेकानंद की गुरु के प्रति तड़प देखी जा सकती है। वे जब भगवान रामकृष्ण परमहंस से मिले तो ऐसा लगा कि जैसे वर्षों वर्षों की प्यास बुझ गई हो। रामकृष्ण की एक नजर पड़ते ही उनके जीवन के समस्त द्वंद अंधकार मिट गया।

स्वामी जी बचपन में तार्किक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे परंतु जब वे रामकृष्ण परमहंस से मिले तो समस्त तर्क जैसे भूल से गए क्योंकि जिस सत्य की अनुभूति रामकृष्ण परमहंस जी ने कराई थी । वह आज तक कोई नहीं करा सका था।
वह मानव जीवन के परम लक्ष्य को जानना चाहते थे । उन्हें लगता था कि यदि ईश्वर नाम की कोई वस्तु है तो उसका साक्षात्कार करना चाहिए । वह जिससे भी मिलते यही प्रश्न करते कि -” क्या आपने ईश्वर को देखा है ?”

यही प्रश्न ब्रह्म समाज के अध्यक्ष महर्षि देवेंद्र नाथ ठाकुर के पास जाकर पूछा -” क्या आपने ब्रह्मा को देखा है ?”
एक छोटे लड़के के मुंह से ऐसा प्रश्न सुनकर महर्षि चौंक पड़े ।नरेंद्र को इस प्रकार ईश्वर की खोज में परेशान देखकर उनके काका ने स्वामी रामकृष्ण परमहंस से मिलने के लिए कहा।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस से जब उन्होंने यही प्रश्न पूछा तो उन्होंने कहा-” हां देखा है ! जिस प्रकार मैं तुम सबको देखता हूं । बात करता हूं । उसी प्रकार ईश्वर को भी देखा जा सकता है । लोग स्त्री पुत्र संपत्ति के लिए हाय हाय करते फिरते हैं उनके वियोग में रोते हैं परंतु ईश्वर नहीं मिल पाया इसके लिए कौन रोता है।”

परमहंस जी के उत्तर को सुनकर नरेंद्र को लगा कि यह मात्र कोरी बकवास नहीं कर रहे हैं बल्कि ईश्वर की अनुभूति की है।
बचपन में मुझे भी लगता था कि दुनिया भर के पुस्तकों के पढ़ने के बाद भी कुछ ऐसा ज्ञान है जो अभी अधूरा हैं। जिसके लिए तड़पा करता था। इसी तड़प में एक बार मैं भयानक बीमार हो गया। लेकिन जब गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के साहित्य का अध्ययन किया तो लगा कि जैसे जीवन की आस पूरी हो गई हो।

क्योंकि उस समय उन्होंने शरीर छोड़ चुके थे। गुरु का शरीर रहे या ना रहे इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है। मुख्य बात है शिष्य का गुरु के प्रति समर्पण। यदि समर्पण सच्चा हो तो सहज में गुरु कृपा बरसने लगती है । जिसको केवल अनुभव किया जा सकता है बताया नहीं जा सकता।

यही कारण है कि तुलसीदास जी महाराज ने हनुमान चालीसा की शुरुआत में गुरु चरणों की रज को नमन किया है। गुरु ही वह माध्यम है जो परमात्मा से साक्षात्कार कराने में एक कड़ी बनता है।
कबीर दास जी महाराज कहते हैं –
गुरु गोविंद दोउ खड़े ,
काके लागू पाय ।
बलिहारी गुरु आपने,
गोविंद दियो बताएं ।
अर्थात परमात्मा का साक्षात्कार बिना गुरु की कृपा से मिलना असंभव है। गुरु ही है जो परमात्मा से साक्षात्कार करवा सकता है।

योगाचार्य धर्मचंद्र जी
नरई फूलपुर ( प्रयागराज )

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