जब मैं खुद को ठीक कर रही थी

रात का अंधेरा घना था, लेकिन अंदर का अंधेरा उससे भी ज्यादा। मैं आईने के सामने खड़ी थी, अपनी ही आँखों में झाँकने की कोशिश कर रही थी। वहाँ एक थकी हुई स्त्री खड़ी थी—जिसने दूसरों को खुश रखने में खुद को खो दिया था।

लेकिन उस रात, कुछ बदल गया। मैं अपने भीतर उठती आवाज़ों को सुनने लगी—वे आवाज़ें जो अक्सर दब जाती थीं, दूसरों की अपेक्षाओं के शोर में। मैंने अपने आप से पूछा—”क्यों?”
क्यों मैं हमेशा खुद को आखिरी कतार में रखती आई हूँ? क्यों मैं वही बनना चाहती थी, जो दुनिया को पसंद हो?

परिवर्तन की शुरुआत
मैंने फैसला किया—अब मैं खुद को ठीक करूँगी। छोटे-छोटे कदम उठाऊँगी, खुद से प्यार करना सीखूँगी। मैंने अपनी कमजोरियों को स्वीकार किया, अपने आँसुओं को गले लगाया और अपनी हँसी को फिर से जिंदा किया। मैंने आईने में देखकर मुस्कुराना शुरू किया, भले ही वह हँसी थोड़ी झिझकभरी थी।

धीरे-धीरे, मैंने उन चीज़ों को करना शुरू किया, जो मुझे सुकून देती थीं। किताबों में खो जाना, अधूरी कहानियों को पूरा करना, पुरानी साड़ियों को पहनकर खुद को आईने में निहारना—सब कुछ!

लोग कहते, “तुम बदल गई हो।”
मैं मुस्कुराकर कहती, “हाँ, मैं खुद को ठीक कर रही हूँ।”

एक नई सुबह
आज जब मैं आईने में देखती हूँ, तो वहाँ एक नई स्त्री खड़ी होती है—जो कमजोर नहीं, बल्कि अपनी कमियों को अपनाकर उनसे सीखने वाली है। जो अब दुनिया के हिसाब से नहीं, बल्कि अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर चलती है।
क्योंकि जब मैं खुद को ठीक कर रही थी, तब मैंने जाना कि सबसे सुंदर परिवर्तन वह होता है, जो अंदर से शुरू होता है।

( सीख: हम सभी को कभी न कभी खुद से मिलना चाहिए, अपनी कमजोरियों को अपनाना चाहिए और खुद को बेहतर बनाने की ओर कदम बढ़ाना चाहिए। आँसू बहने दें, हँसी खिलने दें, और खुद को वही बनने दें, जो आप वास्तव में हैं!)

श्रीमती बसन्ती “दीपशिखा”

हैदराबाद – वाराणसी, भारत।

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