ऐसा क्यों

ऐसा क्यों?

बदहवास हालत में, पसीने से तरबतर, घबराया हुआ श्याम तेजी से घर में घुसा और दोगुनी तेजी से घर का दरवाजा बंद कर लिया… और भाग कर अपने आप को एक कमरे में छुपा लिया।

विधवा मां धर्मवती यह सब अपनी आंखों से देख रही थी। उन्हें बड़ा आश्चर्य हो रहा था कि अचानक श्याम को यह सब क्या हो गया है? इस तरह की हरकत श्याम ने पहले कभी नहीं की थी। वह श्याम के पास कमरे में गई और उससे इस तरह दरवाजा बंद करने और खुद को कमरे में छुपाने की वजह जानना चाही।

“मां, कोई भी आ जाए, दरवाजा मत खोलना।”

“क्या हुआ बेटे? तू इतना घबरा क्यों रहा है?”

“मां, भाभी जी मुझे मरवा देंगी। वे मुझे छोड़ेंगी नहीं। उन्होंने मुझे धमकी दी है कि मैं अब बचूंगा नहीं। अगर मैं कहीं भी बाहर घूमता नजर आया तो वह मेरी जिंदगी का आखिरी दिन होगा। उन्होंने मेरे पीछे लोग लगा रखे हैं।”

“क्या बक रहा है? कल्पना भला ऐसा क्यों करेगी? वह तो तेरी पत्नी है। तुम दोनों तो एक साथ रह रहे थे। तुम दोनों के बीच में कोई बात हो गई क्या?”

“मम्मी तुम नहीं जानती कि वह कितनी शातिर है, निर्लज्ज है। उसके बहुत से लोगों से अवैध संबंध है। उसी की हरकतों से दुखी होकर भैया सुसाइड करने हेतु मजबूर हुए थे। अब वह मुझे जान से मारना चाहती है। मैं उसके अवैध सम्बन्धों में बाधक बन गया हूं।

आज मैंने कल्पना को किसी गैर इंसान के साथ संबंध बनाते देखा तो मुझसे रुका ना गया और मैंनें कल्पना के साथ हाथापाई की, इसका विरोध किया। तब कल्पना ने चुपके से मोबाइल पर कुछ गुंडे लोगों को बुला लिया। उन लोगों ने मुझे जान से मारने की कोशिश की है। बड़ी मुश्किल से मैं अपनी जान बचाकर, भागकर यहां आया हूँ। वे लोग मेरे पीछे लगे हुए हैं। वे मुझे छोड़ेंगे नहीं। किसी भी समय वे घर भी आ सकते हैं। मुझे बचा लो माँ।”

“तू परेशान ना हो। मैं भी देखती हूं कि मेरे रहते वे तुझे कैसे हाथ लगाएंगे।”

“तुम उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती मां। तुम नहीं जानती कि वे लोग कितने खतरनाक है। तुम्हें मेरी कसम मां, तुम कुछ मत करो। बस खामोश रहो। किसी को यह पता नहीं चलना चाहिए कि मैं यहाँ हूँ। सबको यही लगना चाहिए कि मैं पहले की तरह दिल्ली में काम कर रहा हूँ। घर नही आया हूं।”

“ठीक है। जैसा तू बोलता है, वैसा करूंगी लेकिन मुझे यह सब मुझे ठीक नहीं लग रहा है।” मजबूरन धर्मवती को उसकी हां में हां मिलनी पड़ी।

“सही गलत छोड़ो माँ, मैं खुद को इस कमरे में बंद कर रहा हूँ। तुम कमरे का बाहर से ताला लगा दो ताकि अगर कोई घर में मुझे मालूम करने आए तो मुझे पा ना सके।”

इस तरह श्याम ने धर्मवती से खुद को कमरे में बंद करवा लिया और मजबूरन धर्मवती को उसके कमरे के दरवाजे पर ताला लगाना पड़ा।

बाहर बैठी धर्मवती पुरानी यादों में खो गई। कितने मजे से जिंदगी गुजर रही थी। सब कुछ बढ़िया चल रहा था, लेकिन बड़े लड़के राम की शादी जब से कल्पना से हुई तब से परिस्थितियों बिल्कुल बदल गई थी। कल्पना किसी की बात सुनना पसंद नहीं करती थी और हमेशा अपनी चलाती थी। वह अक्सर धर्मवती से भी खूब जबान चलाती, लड़ती व गाली गलौज करती थी। उनका व अपने पति का सम्मान नही करती थी।

यह सब राम को नागवार गुजरता था। इसी बात को लेकर आए दिन राम का कल्पना से झगड़ा होता रहता था। इससे घर में क्लेश रहने लगा था। आए दिन के गृह क्लेश से तंग आकर एक दिन बात इतनी बढ़ गई कि जीवन से दुखी होकर राम ने जहर खाकर सुसाइड कर लिया और अपने पीछे दो बेटे (4 वर्ष व 2 वर्ष) छोड़ गया।

उस समय श्याम दिल्ली में रहकर एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था। राम के खत्म हो जाने के बाद घर के समस्त खर्चों के वहन करने की जिम्मेदारी श्याम पर आ गई। राम की मौत के कुछ दिनों तक कल्पना अच्छे से रही। धर्मवती के कहे अनुरूप कार्य करती रही।

कल्पना के व्यवहार में बदलाव देखकर, छोटे मासूम पोतों का ख्याल करके धर्मवती ने श्याम से कल्पना की शादी कराने की सोची। श्याम अपनी भाभी कल्पना से शादी करना नहीं चाहता था लेकिन धर्मवती व रिश्तेदारों के दबाव में आकर वह मजबूरन कल्पना को अपने साथ रखने को तैयार हो गया।

कल्पना श्याम के साथ दिल्ली में जाकर रहने लगी। कल्पना के साथ श्याम को रहते हुए लगभग 1 वर्ष हो चुका था। घर पर धर्मवती अकेली रहती थी। बीच बीच में श्याम कल्पना व बच्चों के साथ मां से मिलने आ जाया करता था।

आज अचानक श्याम अकेले, बदहवास सी हालत में घर आया। उसकी यह दुर्दशा देखकर धर्मवती को कल्पना से शादी कराने के अपने फैसले पर पश्चाताप हुआ। लेकिन वे अब क्या कर सकती थी?

श्याम के द्वारा ही घर का खर्चा पानी चलता था लेकिन अब जबकि श्याम ने खुद को कमरे में कैद कर लिया था तो धर्मवती को जीविका उपार्जन हेतु कुछ सोचना ही था। आखिरकार उन्होंने अखबार खरीदकर… उनकी थैलियां घर पर बनाकर.. बाजार में बेचने का काम शुरू कर दिया। वे जब भी अखबार की थैलियां बेचने बाजार जाती तो.. कमरे का ताला लगाने के साथ-साथ बाहर के मेन गेट का भी ताला लगाकर ही बाहर निकलती थी।

श्याम ने तो घर से बाहर निकलना ही छोड़ दिया था। रात को 9:00 बजे के बाद धर्मवती उसके कमरे का ताला खोल देती और सुबह 5 बजे तक उसके कमरे का ताला खुला रहता था। श्याम तड़के 4:00 बजे नहा धोकर, तैयार होकर खुद को अपने कमरे में कैद कर लेता था।

कमरे के दरवाजों के नीचे थोड़ी जगह थी, जिसमें से धर्मवती अपने बेटे श्याम के लिए सुबह-शाम खाना सरकाकर अंदर कर देती थी। रात को किसी समय बर्तन धुलते थे। इस तरह धर्मवती द्वारा कागज की थैली बनाकर बेचते-बेचते और श्याम द्वारा खुद को कमरे में कैद करते हुए लगभग तीन माह बीत गए थे।

एक दिन श्याम ने दोपहर 3:00 बजे के लगभग अपनी मां से कहा-

“मां, मेरी शेविंग बहुत बढ़ गई है। मैं शेविंग करने जा रहा हूं। दाढ़ी में बहुत खुजाहट होने लगी है। मैं 1 घंटे के अंदर लौट कर वापस आ जाऊंगा।” यह कहकर श्याम घर से निकल गया।

रात 9:00 बजे तक जब श्याम वापस नहीं आया तो धर्मवती को चिंता हुई। लेकिन वे श्याम के बारे में जानकारी कैसे करें और किससे करें, यह विकट समस्या थी। श्याम के घर आने का उन्होंने किसी को बता ही नहीं रखा था। वे रात में अकेली घर छोड़कर जा भी नहीं सकती थी। क्या पता वह उनके पीछे आ जाए? इसलिए उन्होंने इंतजार करना पसंद किया।

रात लगभग 10:00 बजे के लगभग (अंधेरे में जब लाइटें गई हुई थी) एक व्यक्ति मुँह पर कपड़ा लपेटकर श्याम को घर छोड़ने आया। उसने श्याम को उसके कमरे में लिटा दिया और चला गया। धर्मवती उस व्यक्ति का चेहरा मोहरा देख न सकी। धर्मवती ने बेटे से देर से आने का कारण पूछा लेकिन उसने कोई जवाब ना दिया।

वह नशे में था। शरीर से दुर्गंध आ रही थी। उसने शेविंग भी नहीं बनवाई थी। धर्मवती ने श्याम से कुछ पूछना उचित न समझा और शाम को जो खाना बनाया था, वह श्याम के आगे खाने को रखकर अपने कमरे में जाकर लेट गई।

रात को 1:00 के लगभग श्याम के कमरे से दो बार उल्टी करने जैसी आवाजें आई लेकिन फिर कुछ समय बाद आवाज आनी बंद हो गई। धर्मवती को लगा कि शराब की वजह से वह उल्टी कर रहा है। उन्होंने उठना उचित न समझा। वे लेटी रही।

अगली सुबह अखबार बेचने जाने से पहले उन्होंने खाना बना कर उसके कमरे के नीचे से सरका दिया और कमरे का ताला लगाकर चली गईं। जब वे वापस आई तो खाना ज्यों का त्यों रखा हुआ था। उन्हें अनहोनी होने की आशंका हुई। उन्होंने श्याम को आवाज लगाकर दरवाजा खुलवाने की कोशिश की, लेकिन अंदर से श्याम की कोई आवाज नहीं आई, उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

अंत मे मजबूरन उनको बाहर से लोगों को बुलाकर, उसके कमरे का दरवाजा तुड़वाना पड़ा। कमरे में श्याम मृत पाया गया। उसके शरीर पर चाकू से गोदने के निशान थे और ऐसा लग रहा था कि जैसे श्याम के बाहर निकलते ही दुष्ट लोगों ने उसको पकड़ लिया और उसको अपने साथ कहीं दूर ले गए।

उन्होंने उसको जबरन शराब पिलाई, शरीर पर कई जगह चाकू के वार किए और जहर मिला हुआ खाना खिलाकर, अधमरी हालत में उस नकाबपोश व्यक्ति द्वारा घर छुड़वा दिया। जहरीला खाना खाने के कारण, वह रात भर उल्टी करता रहा। अंततः उसने रात में ही किसी समय दम तोड़ दिया।

विधवा धर्मवती का अब सब कुछ उजड़ गया था। दो सालों के अंदर अपने दोनों जवान बेटों की मौत ने उन्हें तोड़ कर रख दिया था। उन्होंने शव का पोस्टमार्टम कराए बिना ही उसका अंतिम संस्कार कर दिया। 60 वर्ष की उम्र में धर्मवती का मुकदमा करना, उसकी पैरवी करना मुमकिन नहीं था।

इन कामों में रुपया पैसा खर्च होता है सो अलग। अतः उन्होंने चुप रहना उचित समझा। श्याम की मौत के 6 माह बाद ही कल्पना ने घर के बंटवारे करने की जिद पकड़ ली। मजबूरन धर्मवती ने जल्दबाजी में सवा चार लाख रुपए में मकान बेचकर उसके आधे रुपए कल्पना को दे दिए और घर से बेघर हो गई।

उन्होंने प्राप्त 2,12,500 में से ₹2,00,000 की बैंक में एफडी कराई। जिस पर हर माह 15 सौ रुपए ब्याज के प्राप्त होते रहे। इन ₹1500 से वह अपना खर्चा जैसे तैसे चलाती। किराए के ₹500 देकर 1000 रुपये में गुजारा करने की कोशिश करती। महंगाई को देखते हुए ये 1000 रुपये भी कम पड़ने लगे। अतः उन्होंने फिर से कागज की थैलियां बनाने का काम शुरू कर दिया।

करीब 5 साल तक धर्मवती किराए के मकान में रहीं। फिर उनके संपर्क में एक अधेड़ उम्र की सभ्य महिला संध्या आई। संध्या ने जब उनकी दुख भरी कहानी सुनी तो उन्हें धर्मवती के प्रति हमदर्दी पैदा हुई। वे उन्हें किराए के घर से निकालकर अपने घर ले आई और उनकी हर तरह से देखभाल की, सेवा की।

उनको किसी चीज की कभी कमी न होने दी। संध्या की माँ नहीं थी। संध्या धर्मवती को अपनी मां समझकर ध्यान रखती और उनको किसी भी तरह की दिक्कत न होने देती। इस तरह संध्या द्वारा धर्मवती की सेवा करते-करते 15 वर्ष बीत गए।

एक दिन धर्मवती का पोता मनीष उन्हें ढूंढता ढूंढता संध्या के घर आ पहुंचा। उसने धर्मवती से कहा-

“दादी जी, अब से 10 दिन बाद मेरी शादी है। आपको जरूर आना है।”

पोते को देखकर धर्मवती बहुत खुश हुई। पुरानी सब बातें भूलकर उन्होंने अपने पोते को गले लगा लिया और शादी में पक्का पक्का आने का आश्वासन दिया। 78 वर्ष की हो चुकी धर्मवती ने इस आस में कि कम से कम उसके पोते ने उसे याद तो किया… वे बहुत खुश हुई। उन्हें महसूस हुआ कि… हो सकता है कि कल्पना या उसका पोता उसे अपने साथ रखना चाहते हैं। उसका अंतिम समय जान वे उसे अपने पास बुला लेंगे और उसकी सेवा करेंगे। वह संध्या द्वारा की जा रही सेवा को भूल गई।

धर्मवती पोते की शादी के बारे में सोचकर उत्साह से भरकर किसी तरह बैंक पहुंची और अपनी एफडी तुड़वाई। उसने उन 2 लाख रुपयों से पोते और बहू के लिए सोने चांदी की ज्वैलरी खरीदकर अपनी सारी जमा पूंजी खत्म कर दी। वे अपना सब कुछ पोते की शादी में न्योछावर कर आईं।

शादी के बाद मनीष और बहू कल्पना ने उनकी कोई खैर खबर न ली। 5 वर्ष बाद धर्मवती हाथ पैरों से बिल्कुल बेकार हो गयी। चलना फिरना दूभर हो गया था। वे मलमूत्र खाट पर ही करने लगी थी। बावजूद इसके, संध्या पूरी निष्ठा से धर्मवती का ध्यान रखती, उनको नहलाती, धुलाती, उनकी सेवा करके पुण्य कमाती।

जब धर्मवती को लगने लगा कि किसी भी समय उनके प्राण पखेरू हो सकते हैं तो उन्होंने संध्या से अपने पोते मनीष से मिलने की इच्छा जताई। उनको लगता था कि पोते द्वारा दाह संस्कार करने पर उनको मुक्ति मिलेगी। लेकिन ऐसा हो ना सका। सूचना देने के बाद भी उनको देखने ना तो बहू आयी और ना ही पोता क्योंकि उनको पता था कि वहाँ जाना अपने खर्चो को ही बढ़ाना है। धर्मवती के मरने के बाद होने वाले खर्चों को कौन वहन करेगा? ये वे अच्छे से जानते थे।

धर्मवती के मरने के बाद संध्या ने ही उनका अंतिम संस्कार और आरष्टि वगैरह सभी क्रियाकर्म किये।

ऐसा क्यों होता है कि जिस पेड़ पर सबसे ज्यादा फल लगते हैं, सबसे ज्यादा पत्थर उस पर ही पड़ते हैं? जो दूसरों के लिए तन-मन-धन से समर्पित रहता है, उसी को कुछ नहीं मिलता… सिवाय गालियों के, अपमान के… क्यों अधिकांश बुजुर्गों का मन हमेशा अपने लापरवाह, बदतमीज बच्चों में पड़ा रहता है, वे उनको मिस करते रहते हैं।

जिस बच्चे के साथ वे रहते हैं, खाते पीते हैं, जो उनका ध्यान रखना है, वह उनका गुणगान ना करके अपने ऐसे बच्चों को याद करना पसंद करते हैं.. ऐसे बच्चों से मिलने को तरसते हैं जिन्हें उनकी बिल्कुल भी कदर नहीं होती.. जो मौका मिलने पर उनकी बेइज्जती करने में, अपमान करने में कोई कमी, कसर नहीं छोड़ते।

ऐसे बच्चों के पास पहुंचकर भले ही वे बुजुर्ग खूब गालियां खाएं, वे उनको घास तक ना डालें लेकिन उनका मन, दिमाग उन्हीं के लिए तरसता है। आजकल अधिकांश लोगों के साथ यही स्थिति है। जो सब कुछ करता है। उसे कुछ नहीं मिलता। औलाद चाहे कितनी ही दुष्ट क्यों ना हो, मां-बाप हमेशा अपनी औलाद के लिए ही मरते हैं। यहां भी ऐसा ही हुआ।

भले ही निस्वार्थ भाव से संध्या धर्मवती के अंतिम समय तक देखभाल करती रही, उनकी बहू/बेटी बनकर उसने अपना हर फर्ज निभाया लेकिन यह काम कल्पना को या उनको पोते को करना था। धर्मवती के लिए इतना सब कुछ करने के बाद संध्या को मिला क्या? अपना सब कुछ तो धर्मवती अपने उस पोते की शादी में दान कर आई, जिसने अंतिम समय मे अपनी दादी को देखना तक पसन्द न किया।

बेशक संध्या ने निस्वार्थ भाव से काम किया, उनकी सेवा की लेकिन धर्मवती को संध्या के बारे में कुछ सोचना चाहिए था, जोकि उन्होंने नहीं किया।

बावजूद इसके, यह सब जानते हुए कि दोनों बच्चों को मारने में बहू का हाथ है, जिस बहू ने घर बिकवाकर उन्हें घर से बेघर कर दिया, दर दर की ठोकने खाने को मजबूर कर दिया, जिसने जीते जी कभी उनकी स्थिति जानने की कोशिश नहीं की और वे पोते जिन्होंने अपनी दादी की पूरी जिंदगी में कभी खैर खबर न ली… सिर्फ एक शादी के कार्ड आने भर से दादी धर्मवती पुराने सब कांडों को भूल गई। ऐसा क्यों होता है?

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

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