कसम तोड़ दी हमने

Kahani | कसम तोड़ दी हमने

कसम तोड़ दी हमने

( Kasam Tod Di Humne )

 

आज फिर कैलेंडर में 12 तारीख देखकर ओवैस की आंखों में नमी उतर आई, उसके हाथ फिर खत लिखने को मचल उठी और वह खत लिखने बैठ गया लेकिन किसे ?

सोचते – सोचते उसका ज़हन अतीत के गहरे कुएं में उतर गया, उंगलियां तो थम गई लेकिन दिमाग में तस्वीर उभरने लगी, आशिमा यही नाम तो था उस लड़की का। ओवैस बांका सजीला अपनी दुनिया में मस्त रहने वाला हर किसी से हमदर्दी रखने वाला एक नरम दिल इंसान था।

एक दिन यूं ही बैठे बैठे मैगजीन में आशिमा नाम की लड़की का फोटो तथा शेर छपा देखा उसे शायर तथा फोटो दोनों ही अच्छे लगे। उसने कागज और कलम उठा कर उसको खत लिख दिया। उम्मीद के खिलाफ बहुत जल्द उसके पास जवाब भी आ गया।

आशिमा ने उसको खत से शुक्रिया किया एक दूसरे के खतों का शुक्रिया करते-करते दोनों के बीच खतों का सिलसिला जारी हो गया। आशिमा किसी टूरिस्ट कंपनी में नौकरी करती थी, दोनों अपने जीवन की छोटी सी छोटी बात भी एक दूसरे को लिखने लगे।

धीरे-धीरे ओवैस को लगने लगा कि वह आशिमा से मिले बगैर नहीं रह पाएगा, तो उसने आशिमा से मिलने का इजहार किया लेकिन जवाब में आशिमा ने लिखा कि वह उससे नहीं मिले, बल्कि हम दोनों इसी तरह खतों के द्वारा एक दूसरे को जानते रहेंगे ।

तुम हर महीने की 12 तारीख को खत लिखा करना क्योंकि तुमने मुझे पहला खत 12 तारीख को लिखा था। तुम वादा करो जो हो जाए तो मुझे इसी तरह खत लिखते रहोगे। तुम्हारे यह खत मेरे लिए एक सच्चे दोस्त से कम नहीं है।

मैंने खत के द्वारा तुम्हारी जो सूरत और सीरत अपने दिमाग में बनाई है उसको मैं मिटाना नहीं चाहती। मैं नहीं चाहता कि उसकी यह तस्वीर मेरे दिमाग से धुंधली हो जाए, या मिट जाए। आप चाहे जैसे भी हो मेरे तस्वीर में एक अच्छे इंसान के रूप में उभरे हो।

हो सकता है आपने भी अपने दिमाग में मेरी कोई ऐसी तस्वीर बनाई हो। जो देखते ही मिट जाए मैं आपको अपनी कसम देती हूं आप मुझसे कभी मत  मिलना हम अपने खतों और ख्वाबो ख्यालों में मिलते रहोगे हकीकत में नहीं ।

ओवैस अपने खत का जवाब देख कर बहुत उदास हो गया। आशिमा से मिलने के सारे अरमान चूर-चूर हो गए। ऑफिस में भी उसका मन नहीं लगता था,  हर समय खोया खोया रहता यह हालात देखकर उसका साथी कामिल ने उसे यह सलाह दी वह अचानक उसके घर पहुंच कर उसे  सरप्राइस दे ।

इससे  वह जरूर खुश होगी ओवैसी को अपने साथी की यह बात अच्छी लगी और और वह खुशी-खुशी आशिमा से मिलने रेलवे स्टेशन पहुंचा और उसके शहर पहुंचकर वहां से टैक्सी द्वारा आशिमा के घर की तरफ रवाना हो गया।

उसे आशिमा से मिलने की बहुत जल्दी थी, उसने टैक्सी ड्राइवर को टैक्सी तेज चलाने को कहा । अचानक कोई लड़की उसकी टैक्सी से टकराई और गिर पड़ी, ओवैस को आसमा से मिलने की बहुत जल्दी थी।

इसलिए उसने टैक्सी आगे बढ़ा दी,  उसने पीछे मुड़कर यह भी नहीं देखा कि उस लड़की का किया हुआ होगा। जब वह आशिमा के घर पहुंचा तो उसने एक लड़के से आसमां के बारे में पूछा,  तो लड़के ने जवाब दिया आशिमा तो अब इस दुनिया में नहीं रही कोई टैक्सीवाला सर में जबरदस्त चोट मार कर चला गया।

ओवैस के सामने कुछ देर पहले का मंजर घूमने लगा जब उसकी टैक्सी से एक लड़की टकराई थी, और वह उसे अनदेखा करके चला गया था। तो वह लड़की आशिमा थी जो अपनी नौकरी से वापस घर आ रही थी।

उसका जेहन साए साए करने लगा, उससे मिलने की चाह में उसकी आखरी सूरत देखे बगैर अपने बिछड़े वजूद को  समेटा, उल्टे कदम से वापस आ गया, उसने अपनी दुनिया अपने हाथों ही लुटा दी थी ।

उसने उसकी कसम तोड़ दी थी इसलिए भी आशिमा ने उसका साथ हमेशा के लिए छोड़ दिया था। हर महीने की 12 तारीख उसके दिल को चीर देने वाली तारीख होती।

वह हर महीने की 12 तारीख को पाबंदी से खत लिखता और खुद ही उसे खोल कर पढ़ लेता। न जाने कितने महीने, सालों की 12 तारीख उसके दिल पर बिजली बनकर गिरी, कितनी बार वह मर मर कर जिया, शिकवा करता भी तो किससे करता.

तुझसे ऐसे मिलने की आरजू न थी

तुझसे ऐसे  बिछड़ने की जुस्तजू ना थी

होगा एकदिन दिल का यह हाल है

ऐसी तो मेरी ख्वाबों की ताबीर भी ना थी

यही शायद उसका नसीब था.

लेखिका: रुबीना खान

देहरादून ( उत्तराखण्ड )

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