निवेश

निवेश

एक था धनीराम और एक था सुखीराम। दोनों में गाढ़ी मित्रता थी। दोनों ही शुगर के मरीज थे। दोनों की माली हालत अच्छी नहीं थी। उन्होंने साथ में बहुत काम किये लेकिन सफलता नहीं मिली। फिर उनके किसी मित्र ने उन्हें प्रॉपर्टी(जमीन) खरीदने-बेचने के काम की सलाह दी और बताया कि जमीन के रेट दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहे हैं।

शहरों में प्लॉट खरीदने को लेकर बहुत मारा मारी है। गाँव के लोग गाँव छोड़कर शहर में आकर बस रहे हैं इसलिए जमीन के रेट बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं। अपने मित्र की सलाह पर अमल करते हुए धनीराम और सुखीराम ने साझे में प्रॉपर्टी खरीदने बेचने का व्यवसाय शुरू किया।

उनका यह व्यवसाय चल निकला। साझे में दोनों शहर से सटे हुए बागों/खेतों की जमीन सस्ते दामों पर खरीद कर… उनके प्लॉट काटकर ग्राहकों को ऊंची कीमत पर बेचने लगे। इससे उन्हें अच्छी आमदनी होने लगी। देखते-देखते जमीन के व्यवसाय से उन्होंने अपना घर पक्का कर लिया व रहन-सहन का स्तर उठा लिया। अपने व्यवसाय को बढ़ाने के लिए वे लोगों से रुपए मोटे ब्याज पर उधार लेकर अपने व्यवसाय में निवेश कर देते थे।

सुखीराम को धनीराम पर अटूट विश्वास था। प्रॉपर्टी खरीदने बेचने से संबंधित सभी रकम धनीराम अपने घर पर एक मजबूत लॉकर में रखता था। सुखीराम भी अपने पास नकद रुपये न रखकर धनीराम को रुपये रखने को दे देता था। जब भी उसको जरूरत होती तो वह धनीराम से रुपया ले लेता था। कई बार सुखीराम की पत्नी और उसके एकलौते बेटे मनीष ने सुखीराम को टोका और कहा-

“सारा रुपया धनीराम के पास रखना कहाँ की समझदारी है? अपने पास भी तो कुछ रुपया इकट्ठा करके रखो। अपने रुपयों के लिए भी धनीराम के पास जाकर हाथ फैलाने पड़ते हैं। यह कोई अच्छी बात थोड़ी है।”

लेकिन उल्टा सुखीराम उनको समझा देता और कहता-

“तुम्हें किस चीज की कमी है? जब भी जितने भी रुपए की जरूरत होती है वह मैं धनीराम से ले तो आता हूँ। घर पर हम रुपया कहाँ रखेंगे? हमारे पास तो कोई तिजोरी भी नहीं है। बैंक में मैं ज्यादा रुपया रख नहीं सकता।

बैंक में रुपया रखूंगा तो उस पर टैक्स देना पड़ेगा। जब हमारा सब काम बढ़िया चल रहा है तो क्या दिक्कत है? रुपए उसके पास रहें या मेरे पास.. बात तो एक ही है। तुम लोग बेकार में डरते हो। मेरा मित्र धोखेबाज नहीं है। तुम रुपयों की ओर से निश्चिंत रहो।”

“वह तो सब ठीक है लेकिन तुम्हारे मित्र धनीराम ने अभी हाल ही में अपना आलीशान तीन मंजिला घर बनवाया है और तो और वह अपने बच्चों को भी एमबीबीएस जैसे बड़े-बड़े कोर्स करवा रहा है। लेकिन तुम अपने बच्चे और हमारे बारे में कुछ नहीं सोच रहे। यह गलत बात है आपकी।

धनीराम यह सब इसी बिजनेस के रुपए से ही तो कर रहा है। आपके लाभ के रुपए भी वे अपने काम में ले रहा है। मैं चाहती हूँ कि तुम अपने प्रॉफिट का हिस्सा अपने पास मतलब घर पर लाकर रखो। कल को धनीराम की नीयत में खोट आ गया तो क्या होगा?” सुखीराम की पत्नी ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा।

“आज तक कभी ऐसा हुआ है कि तुम्हें रुपये पैसों की वजह से दिक्कत उठानी पड़ी हो। नहीं न..? धनीराम तुम्हें कितना मानता है। आधी रात को भी वह हमारे परिवार के लिए तन मन धन से खड़ा है। अरी भाग्यवान, तुम इस बारे में ज्यादा मत सोचो। मैं बहुत जल्द ही मौका देखकर धनीराम से किसी रोज अपने लाभ के सारे रुपए मांग लूंगा। अब ठीक है।” यह कहकर सुखीराम ने बात खत्म की।

अब धनीराम और सुखीराम की नज़र शहर से सटे आमों के एक बाग को खरीदकर प्लाटिंग करने की थी। इसके लिए 4 करोड़ रुपयों की जरूरत थी। दस लाख बयाना देकर सौदा पक्का हो गया था। अगले तीन महीनों में 4 करोड़ रुपये बाग वाले को देने थे।

4 करोड़ रुपयों को जुटाने के लिए उन्होंने अपने दोस्तों, रिश्तेदारों व परिचितों को भी अपने साथ प्रॉपर्टी में रुपया लगाने को उकसाया। उन्हें ब्याज के रूप में एक मोटी रकम देने का ऑफर दिया। उन्होंने ₹100000 इन्वेस्ट करने पर साल में 30% ब्याज के साथ 130000 रुपए देना सुनिश्चित किया।

1 साल में 1 लाख पर ₹30000 बहुत बड़ी रकम थी। अतः देखते-देखते उन दोनों के पास दो करोड रुपए इकट्ठा हो गए जो उन्हें प्रॉपर्टी में निवेश करने थे। यह सभी रुपया धनीराम की तिजोरी में रखा हुआ था। इन दो करोड रुपए में लगभग 90 लाख रुपया सुखीराम ने अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से लेकर धनीराम को दिया था। वे बाग खरीदने के लिए 4 करोड़ रुपये इकट्ठा होने का इंतज़ार कर रहे थे।

इसी दौरान…एक दिन धनीराम को नहाते समय अचानक दिल का दौरा पड़ गया। उनकी चीख निकल ना पाई और वे वही बाथरूम में खत्म हो गए। तसल्ली के लिए उनके परिजन उन्हें डॉक्टर के पास लेकर गए। डॉक्टर ने बताया- “धनीराम शुगर के मरीज थे।

शुगर वाले मरीज को अचानक ही सही सलामत हालत में.. कभी भी अटैक पड़ जाता है। इस अटैक के लक्षण नजर नहीं आते। यह औचक ही होता है। जब तक व्यक्ति कुछ समझ पाता है, प्राण पखेरू हो जाते हैं। धनीराम के साथ भी यही हुआ। इसलिए शुगर के मरीज को शुगर कंट्रोल रखना बहुत जरूरी है।”

धनीराम के बड़े बेटे रजनीश ने फोन करके सुखीराम को धनीराम की मौत की खबर दी। यह सुनकर सुखीराम के पैरों के नीचे से जमीन निकल गई। उन्हें तुरंत उन रुपयों का ध्यान आया जो उन्होंने अपने दोस्तों, रिश्तेदारों से निवेश के लिए उधार लिए थे तथा वे रुपए धनीराम के पास उनकी तिजोरी में रखवा दिए थे।

वे सिर पकड़ कर बैठ गए। उनकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। वे सोचने लगे -‘अगर धनीराम के बच्चे बेईमान हो गए.. उन्होंने वे रुपए न दिए, हड़प कर गए तो क्या होगा? वे तो सड़क पर आ जाएंगे। अपना घर जमीन बेचकर भी वे एक करोड़ रूपया जुटा ना सकेंगे।’ यह सोच-सोच कर उनके हाथ पांव कांपने लगे।

जब धनीराम का अंतिम संस्कार हो गया तब उन्होंने धनीराम के बड़े बेटे रजनीश से इस बारे में बात की और धनीराम के पास तिजोरी में रखें रुपए मांगे। रजनीश ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा- “अंकल जी, मुझे इस बारे में पता है। पिताजी ने मुझे इस बारे में बताया था कि आप दोनों एक बाग खरीद कर उसकी प्लाटिंग करके बेचना चाहते हैं। मैं घर जाकर उनकी तिजोरी चेक करता हूँ और फिर आपको बुलाकर वे रुपए दे दूँगा।

आप परेशान ना होइए।” यह सुनकर सुखीराम की जान में जान आई। दो दिन बाद रजनीश ने फोन करके सुखीराम को बताया कि उसने पिताजी की तिजोरी खोल कर देखी थी, लेकिन उसमें रुपए नहीं मिले। पता नहीं.. पिताजी ने रुपए कहाँ रख दिए या किसको रुपए दे दिए? मैं नहीं जानता कि रुपयें आखिर किधर गए? यह राज तो उनके साथ ही चला गया। जैसे ही रूपयों के बारे में मुझे कोई जानकारी मिलेगी, मैं आपको फोन करके बता दूंगा।” यह कहकर रजनीश ने फोन कट कर दिया।

सुखीराम समझ गए कि रजनीश की नीयत में खोट आ गया है। रुपयों को देखकर उसका दिमाग खराब हो गया है इसलिए वह रुपए ना लौटाने के लिए बहाने बना रहा है। उन्हें रह रहकर अपनी पत्नी और बेटे मनीष की नसीहत याद आ रही थी। वे सोच रहे थे कि काश उन्होंने अपने परिवार की बातों पर अमल करके अपने पास अपने प्रॉफिट के, रिश्तेदारों के रुपयों को रखा होता तो कितना अच्छा होता?

उनका आज तक का सारा प्रॉफिट जो लगभग 50 लाख रुपए था। वह तो डूब ही गया था, साथ ही साथ अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से निवेश के लिए लगभग एक करोड़ की जो रकम उन्होंने ली थी, वह भी डूब गई थी। अपना नुकसान तो वे सह लेते लेकिन अब वे अपने रिश्तेदारों से कैसे नजर मिला पाएंगे? और कैसे उन्हें उनके रुपए 30% ब्याज पर चुका पाएंगे? इस बात ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया।

वे बुरी तरह टूट गए। धनीराम की मृत्यु का उन्हें बहुत सदमा लगा। उनकी भूख प्यास सब छिन गई। वे कमजोर होते चले गए। उन्होंने घर से बाहर निकलना बंद कर दिया। खुद को घर में कैद रखने लगे, लोगों से मिलने से बचने लगे। सुखीराम की पत्नी और बेटे ने उन्हें खूब समझाने की कोशिश की और कहा- “आप अपना ध्यान रखो। जो हो गया, सो हो गया।

अब अपने शरीर का क्यों नाश कर रहे हो? चिंता करने से कुछ नहीं होगा।”
लेकिन न चाहते हुए भी उनका ध्यान बार-बार धनीराम और निवेश हेतु लिए गए उधार के रुपयों व उनके चुकाने पर जाता रहा। उनका खाना पीना सब बंद हो गया। धनीराम की मौत के 2 महीने बाद, एक दिन ज्यादा सोचने की वजह से सुखीराम को भी अटैक पड़ गया और उनकी मौत हो गई।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

यह भी पढ़ें :-

Similar Posts

  • सकारात्मक सोच

    सर्द अंधेरी रात थी। रात के दस बज रहे थे। सुनसान सड़क पर…घर पहुंचने की जल्दी में नितिन तेजी से बाइक चलाकर सरपट चला जा रहा था। रास्ते में एक पुल के ऊपर चढ़ते समय अचानक उसकी बाइक सड़क पड़े हुए एक बड़े से पत्थर से टकरा गयी। नितिन अपना संतुलन खो बैठा और बाइक…

  • एक डॉक्टर ऐसा भी

    डॉक्टर को भगवान का दर्जा यूं ही नहीं दिया जाता। इस पृथ्वी पर एक वही है जो इंसान को मौत के मुंह से बचाकर उसको जीवनदान देता है। यह और बात है कि आज के समय में डॉक्टरीपेशा सिर्फ रुपए कमाने का धंधा बन गया है, व्यवसाय बन गया है। लोग लाखों-करोड़ों रुपए खर्च करके…

  • लाल मिट्टी | Lal Mitti

    ठाकुर श्याम सिंह के पूछने पर कि हरिया तेरे घर में लड़का पैदा हुआ है कि लड़की, तो उसने अपनी छाती खुशी से ठोकते हुए कहा था-“बेटी हुई है लल्ला बेटी, हम बेटा-बेटी में कोई फर्क नहीं मानते और दहेज से भी नहीं कांपते कि कहाँ से लाएंगे देंगे दहेज। और ,,,, और जो दहेज…

  • किसी नजर को तेरा इंतजार आज भी है

           दुल्हेराजा घोड़ी पर सवार थे.. बाराती नाच रहे थे.. डीजे का शोर सुस्त कदमो को भी थिरकने के लिए मजबूर कर रहा था.. महिलाएं पुरुष पसीने से लथपथ हो रहे थे.. धीरे धीरे बारात आगे बढ रही थी तभी किसी ने मेरा हाथ पकड़ा ओर बारातीयो की भीड़ से मुझे बाहर खींच लिया.. मैं चौका…..

  • रोशनी | Kahani Roshni

    मनुष्य को गरीबी क्या ना कराएं । रोशनी के पिता इतने गरीब थे कि दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हो सके इसलिए उसे एवं उसकी बहन को अनाथालय छोड़ दिया। इसी बीच उसकी छोटी बहन इतनी बीमार हुई कि उसके पिता छोटी बहन को उठा ले गए लेकिन वह वहीं रह गई। एक-एक दिन…

  • बरगद | Bargad laghu katha

    बरगद ( Bargad ) डॉ अलका अरोडा जी की मानवीय मूल्यों को जीवन्त करती लघुकथा   सुबह सुबह प्रेम की एसी झडी मैं पतिदेव से पूछ ही बैठी – प्रेम की यह छुअन स्वाभाविक नहीं जी !! स्त्री का मन प्रेम के बनावटीपन को पहचानने की शक्ति रखता है । बताओ क्या बात है क्यूं…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *