सकारात्मक सोच

सकारात्मक सोच

सर्द अंधेरी रात थी। रात के दस बज रहे थे। सुनसान सड़क पर…घर पहुंचने की जल्दी में नितिन तेजी से बाइक चलाकर सरपट चला जा रहा था। रास्ते में एक पुल के ऊपर चढ़ते समय अचानक उसकी बाइक सड़क पड़े हुए एक बड़े से पत्थर से टकरा गयी। नितिन अपना संतुलन खो बैठा और बाइक सहित नीचे की ओर गिर गया।

जब नितिन तेजी से टकराकर… नीचे की ओर गिर रहा था, उस समय उसे लगने लगा था कि वह आज नहीं बचेगा। उसकी मौत हो जाएगी। उसे अपना काल नजर आने लगा था। नीचे गिरने के कुछ सेकंडों बाद अचानक उसकी आंख खुल गयी। उसे अपनी आंखों पर यकीन ना हुआ कि वह जिंदा है?? वह मरा नहीं है, इस बात की पुष्टि करने के लिए उसने लेटे-लेटे अपने हाथ-पैरों को हिला कर देखा। फिर उसकी नज़र अपने शरीर पर गयी।

उसने आप को खून से लथपथ पाया। उसका पूरा शरीर बेहद दर्द कर रहा था। इतनी चोट लगने के बाद भी वह इस बात को सोचकर खुश था कि वह जिंदा है। उसने खुद को जिंदा पाकर ईश्वर का धन्यवाद अदा किया।

तभी उसकी नजर उससे कुछ दूरी पर पड़ी बाइक पर गई। इतनी ऊंचाई से गिरने के बाद भी बाइक की हालत ठीक लग रही थी। बाइक को ठीक हालत में देखकर नितिन को और अधिक खुशी महसूस हुई। इस खुशी के पीछे एक कारण यह था कि वह बाइक उसकी नहीं थी, बल्कि उसके दोस्त अभिनव की थी।

समय से घर पहुंचने की वजह से वह अभिनव से बाइक मांग कर ले लाया था। उसको अपनी चोट से ज्यादा बाइक के ठीक होने की खुशी थी। खुद के बच जाने व बाइक ठीक होने की वजह से उसने खुद के अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार महसूस किया। सकारात्मक बातें सोचकर, हिम्मत करके नितिन ने खुद को खड़ा किया और जैसे-तैसे बाइक को खींचकर ऊपर सड़क तक ले आया। ऊपर तक पहुंचते-पहुंचते उसके अंदर इतनी ताकत नहीं बची थी कि वह खुद बाइक को चला कर अस्पताल या घर पहुंच सके। उसका पूरा शरीर खून से लथपथ था।

चोट ताजी होने व शरीर में गर्म खून की वजह से ही.. शायद वह बाइक ऊपर तक खींचकर लाने में कामयाब हो सका था। अब उसकी हिम्मत जवाब देने लगी थी। वह सड़क किनारे बैठ कर ऐसे, किसी व्यक्ति या सवारी के आने का इंतजार करने लगा, जो उसे अस्पताल में भर्ती करवा दें।

उसे इंतजार करते-करते लगभग 15 मिनट बीत गए, लेकिन कोई नहीं आया। एक-एक पल उसे भारी लगने लगा था। अचानक उसे सामने से एक कार आती दिखाई दी। वह हिम्मत करके सड़क के बीचोबीच जाकर खड़ा हो गया। उसने कार में बैठे लोगों से, कार रोकने व मदद करने की अपील की। बीच सड़क में उसको लहूलुहान देखकर तथा साइड में पड़ी हुई बाइक देखकर, उस में बैठे लोग समझ गए कि मामला एक्सीडेंट का है।

उन्होंने जल्दी से कार साइड में लगाई। कार से दो व्यक्ति उतरे और उन्होंने नितिन से दुर्घटना की वजह पूछी। नितिन ने उनको सब कुछ बता दिया कि कैसे वह पत्थर से टकराकर नीचे गिर गया था। नितिन ने उनसे प्रार्थना की कि वह उसको अस्पताल में भर्ती करवां दें।

उनकी बड़ी मेहरबानी होगी। वह उनका जिंदगीभर एहसानमंद रहेगा। वे दोनों व्यक्ति दयालु प्रतीत हो रहे थे। उन्होंने नितिन को मदद करने का आश्वासन दिया और उसको सहारा देकर गाड़ी की तरफ ले जाने की कोशिश करने लगे। तभी अचानक, गाड़ी से एक बुजुर्ग सज्जन निकले। शायद वे उन दोनों व्यक्तियों के पिता थे।

उन्होंने गाड़ी के अंदर बैठे-बैठे ही, नितिन की सब बातें सुन ली थी जो उसने उन दोनों व्यक्तियों को बताई थी। नितिन की गम्भीर हालत देखकर वे अपने दोनों बच्चों को डांट लगाते हुए कहने लगे,

“तुम दोनों को कब अक्ल आएगी?? देख नहीं रहे, इसकी कितनी बुरी हालत है.. तुम्हें क्या लगता है कि यह अस्पताल तक जिंदा पहुंच जाएगा?? अस्पताल यहां से लगभग 25 किलोमीटर दूर है। यह रास्ते में ही दम तोड़ देगा। फिर क्या करोगे, जब पुलिस हम लोगों को ही इसका इसकी मौत का जिम्मेदार ठहरा कर जेल में डाल देगी??

पुलिस हमारी एक न सुनेगी। पुलिस हमें ही जिम्मेदार ठहराएगी और कहेगी कि हमने ही इस को टक्कर मारी है। अब अपने बचाव के लिए ही हम इसका इलाज करवाने अस्पताल लेकर जा रहे थे, जबकि हकीकत कुछ और है। वे लोग हमारी बात पर विश्वास थोड़ी ना करेंगे??

यहां कोई और व्यक्ति होता या चश्मदीद गवाह होता तो अलग बात थी। मुझे भी इसकी मदद करने में कोई हर्ज ना होता। तुम दोनों मेरी बात को समझो और यहीं इसके हाल पर इसे छोड़ दो और जल्दी से यहां से निकलो। कहीं ऐसा ना हो कि लेने के देने पड़ जायें।”

अपनी मौत की बात, उस बुजुर्ग के मुंह से सुनकर नितिन की आंखों के आगे फिर से अंधेरा छा गया। उसे सच में लगने लगा कि वह अब सच में मरने वाला है। उसे चक्कर आने लगे। उसके हाथ-पांव ठंडे पड़ गए। उसके अंदर जिंदा रहने की जो उम्मीद जगी थी, एकाएक धुंधली पड़ गई।

उसे सब कुछ खत्म नजर आने लगा। उसे लगने लगा कि वह बुजुर्ग ठीक कह रहे हैं कि मैं जिंदा नहीं बचूंगा। अस्पताल तक नहीं पहुंच पाऊंगा। ज्यादा सोचने व दिमाग पर ज्यादा जोर डालने की वजह से नितिन वहीं बेहोश होकर गिर पड़ा। नितिन को मरा जानकर वे तीनों तेजी से गाड़ी लेकर निकल गए।

करीब आधे घंटे तक नितिन वहींबीच सड़क पर पड़ा रहा। उसे होश तब आया, जब एक बुजुर्ग सज्जन ने उसके मुंह पर पानी डालकर उसे जगाने की कोशिश की। आंख खुलते ही नितिन की आंखों से आंसू बहने लगे। वह रोते हुए उनसे कहने लगा,
“दादा जी, मैं मरना नहीं चाहता। मुझे बचा लीजिए। मैं मरने वाला हूं। प्लीज मुझे बचा लीजिए। मुझे अस्पताल में भर्ती करवा दीजिए।”

“सबसे पहले तो तुम यह रोना बंद करो। तुम पागल हो गए हो क्या?? क्या मरने-मरने की रट लगा रखी है?? परेशान क्यों हो रहे हो?? तुम बिल्कुल ठीक हो। बस अभी डॉक्टर के पास तुम्हें लेकर चलते हैं, फिर डॉक्टर साहब तुम्हारे दर्द व जख्मों की दवा दे देंगे।”

उन्होंने आगे बोलना जारी रखा… “अभी तुमने एक्सीडेंट देखे ही कहां है?? हम रोज इस रास्ते से गुजरते हैं। हमने इस रास्ते पर एक से एक भयंकर एक्सीडेंट देखें हैं। उन एक्सीडेंट के सामने तो तुम्हें बिल्कुल भी चोट नहीं लगी। अब रोना बंद करो और खड़े होकर गाड़ी में बैठो। हम अस्पताल चल रहे हैं।”

उनकी सकारात्मक और अपनेपन जैसी बातें सुनकर नितिन में फिर से सकारात्मक ऊर्जा का संचार हुआ। फिर से नितिन को अपने अंदर जीने की.. उम्मीद की किरण नजर आने लगी थी। उन बुजुर्ग सज्जन ने नितिन को सहारा देकर उठाया और अपनी गाड़ी में डालकर अस्पताल पहुंचाया।

अस्पताल में नितिन के पूरे शरीर की जाँच व एक्स रे आदि करवाने पर पता चला कि उसके हाथ-पैरों में व पसलियों में जगह-जगह फ्रैक्चर आए थे। इसके अलावा जगह-जगह से मांस फट गया था। नितिन काफी दिन अस्पताल में ही भर्ती रहा। नितिन को ठीक होने में लगभग 3 महीने लग गए।

जब नितिन ने खुद को ठीक महसूस किया तो उसने उन सज्जन के बारे में पता किया जिन्होंने उसको अस्पताल में भर्ती करवाया था। उनका नाम रामकुंवर था। नितिन उनके घर मिठाई का डिब्बा लेकर, धन्यवाद अदा करने पहुंचा। नितिन ने डोरबेल बजायी। रामकुंवर जी ने दरवाजा खोला और नितिन से उसका परिचय पूछा।

वे नितिन को पहचान ना पाए थे। नितिन ने उनको अपना परिचय देकर…अबसे तीन माह पहले अपने साथ हुई दुर्घटना की याद दिलाई और कहा कि आपने उस रात मेरी जान बचा कर मुझ पर व मेरे परिवार पर बड़ा उपकार किया है। मैं आपका बहुत आभारी हूं।

उस दिन आप से पहले भी 3 सज्जन गाड़ी से उतरकर मेरे पास आये थे। उनमें से एक सज्जन ने मेरी गम्भीर हालत देखकर कहा था कि मैं बच नहीं पाऊंगा और कुछ ही देर में दम तोड़ दूंगा। वे तीनों मुझे सड़क पर ही अकेला छोड़ कर चले गए थे, परंतु आप उन जैसे नहीं निकले, आपने मुझे मरने के लिए नहीं छोड़ा। आपने मेरी मदद की और मुझे बचा लिया। मेरे मन में एक सवाल है कि मेरी इतनी गम्भीर हालत देखने के बावजूद भी… आप 100% कैसे श्योर थे कि मैं बच जाऊंगा??

नितिन, इसमें मेरा कोई रोल नहीं है। यह सब तो ईश्वर का चमत्कार है। ईश्वर की मर्जी से ही यह सब कुछ संभव हुआ है। आप स्वस्थ हो और ठीक हो, यह जानकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हो रही है। मेरी कोशिश रंग लाई, मुझे इस बात से सन्तुष्टि है। जबकि सच्चाई तो यह है कि तुम्हारी हालत देखकर मुझे भी यही लग रहा था कि तुम नहीं बच पाओगे।

रास्ते में ही दम तोड़ दोगे, परंतु किसी इंसान से ऐसा बोलना क्या ठीक होता?? मैंने एक जुआ खेला और तुमसे यह कहा कि तुम्हारी चोट गंभीर नहीं है। शायद मेरी बात सुनकर ही तुम्हारे अंदर आत्मविश्वास पैदा हुआ, जिजीविषा पैदा हुई और तुमने उठने की हिम्मत की। जिसका परिणाम यह हुआ कि तुम बच गए।

अगर मैं उन लोगों की तरह ही तुमसे पेश आता और कहता.. कि तुम मरने वाले हो… तो सोचो… तुम पर क्या बीतती?? समय से पहले ही शायद तुम दम तोड़ देते?? जीने की कोशिश ही ना करते?? उनके मुंह से यह सब बातें सुनकर, नितिन का मुंह खुला का खुला रह गया।

शिक्षा:-
“अगर पॉजिटिव बातें करने से किसी इंसान की दिक्कतें/परेशानियां दूर होती हैं… उस में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है… उसमें जीने की ललक पैदा होती है…. उसका मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहता है…. वह अपने हर काम को और बेहतर तरीके से अंजाम देता है/लगन से काम करता है… या वह अपने हर काम में अपना बेस्ट दे पा रहा है….तो हमें पॉजिटिव सोच के साथ लोगों की मदद जरूर करनी चाहिए, उनको राह दिखानी चाहिए। शायद आप सकारात्मक सोच के साथ किसी की जिंदगी बचा सकते हैं… उसमें जीने की आरजू पैदा कर सकते हैं… जीने के प्रति उसका नजरिया बदल सकते हैं। यह एक अच्छी आदत है। इसको हम सबको अपने जीवन में जरूर अपनाना चाहिए।”

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

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