पुनरावृत्ति
कक्षा 12 में पढ़ने वाली प्रियांशी अपनी सहपाठी राधा के साथ जनरल स्टोर से कुछ सामान खरीदने के लिए गई। जब प्रियांशी सामान खरीदने और दुकानदार से बातें करने में व्यस्त थी तो राधा ने चुपके से नेल पॉलिश और फेसवाश को चुराकर अपने बैग में छुपा लिया। यह सब करते प्रियांशी ने राधा को देख लिया था।
उसने इशारों से राधा को सब सामान निकाल कर पुनः अपनी जगह रखने को इशारों में कहा, लेकिन राधा ने प्रियांशी की हर बात को/हर इशारे को नजरअंदाज कर दिया। यह अच्छा हुआ कि दुकानदार की नजर राधा पर नहीं पड़ी। जनरल स्टोर से बाहर निकलकर प्रियांशी राधा पर बहुत नाराज हुई और उसको नसीहत देकर कहने लगी-
“राधा आज तो तुम मरवा देती मुझे। तुम नहीं जानती कि तुम्हें चोरी करते देखकर मेरा दिल कितनी जोरो से धड़क रहा था। क्या तुम्हें नहीं पता कि चोरी करना गलत है? सोचो, अगर वह दुकानदार तुम्हें चोरी करते देख लेता तो क्या होता? कितनी बेइज्जती और बदनामी होती हमारी?”
“अरे कुछ नहीं होता प्रियांशी। तुम बेकार में डर रही हो।” बेशर्मी से राधा बोली।
“क्या कहा? मैं बेकार में डर रही हूँ? तू क्या जाने… जब तू चोरी किया हुआ सामान अपने बैग में रख रही थी तो मेरी कैसी हालत हो गई थी? अगर दुकानदार यह सब देख लेता तो वह मुझे भी चोर समझता।” प्रियांशी बोली।
“देख प्रियांशी, मैं तो छोटेपन से चोरी करते आ रही हूँ। मैं तो चोरी करने में एक्सपर्ट हो गई हूँ। मुझे कोई आसानी से पकड़ नहीं सकता। तू तो जानती है कि मेरे घर की हालत कैसी है? पिताजी की कमाई से घर का खर्चा बमुश्किल चलता है। अब देख, मैं भी जवान हो गई हूँ।
मैं भी अन्य लड़कियों की तरह सजना संवारना चाहती हूँ, खूबसूरत दिखना चाहती हूँ। मेरे पास खूबसूरत दिखने और अपने सपनों को पूरा करने का यही एक रास्ता है- चोरी करना। मैं जिसके साथ भी दुकान पर जाती हूँ या अकेले भी कुछ सामान लेने के लिए जाती हूँ… तब दुकानदार की नज़रों से बचाकर अपने मतलब का सामान चुराकर चुपके से बैग में रख लेती हूँ या फिर अपने इनर गारमेंट्स में छुपा लेती हूँ। किसी को एहसास तक नहीं होता कि उसका कुछ सामान चोरी हुआ है। जब तक उसे पता चलता है, मैं दुकान से बाहर निकल जाती हूँ।”
“हे भगवान! तू इतनी बड़ी चोरनी बन गई है। देख राधा, जब मैं तेरे साथ थी तो बता देती कि तुझे क्या चाहिए? अपनी छोटी बहन समझकर वह सामान मैं दिला देती और रुपए भी ना लेती। लेकिन चोरी करना गलत है। किसी चीज की जरूरत हुआ करे तो बता दिया कर, लेकिन यह चोरी की गंदी आदत छोड़ दे।”
“जब चोरी करने का हुनर मेरे पास है तो मैं किसी से कुछ मांगू क्यों? क्यों किसी के आगे हाथ फैलाऊँ? मैं भिखारी नहीं हूँ।”
“इसमें भिखारी वाली बात कहाँ से आ गई? तुम न सुधरने की हो। बहुत बड़ी वाली बेशर्म हो। तुम्हें समझाना बेकार है। लेकिन राधा, एक बात याद रखना जिस दिन तुम फंसोगी, बुरा फंसोगी। तब तुम्हें मेरी नसीहत याद आएगी। तुम्हारी हरकतें देखकर मुझे भी अब सतर्क रहना पड़ेगा। ध्यान रखना पड़ेगा कि जब भी शॉपिंग पर जाऊं तो अकेले ही जाऊं… तुम साथ ना हो।” प्रियांशी की बात सुनकर राधा का मुंह बन गया।
उस दिन के बाद से प्रियांशी राधा के साथ कहीं भी आने-जाने से बचने लगी, हालांकि उनमें दोस्ती बरकरार रही। अक्सर पढ़ाई को लेकर बातचीत होती रहती थी।
इस घटना के 3 साल बाद फिर से वही घटना रिपीट हुई। आज भी प्रियांशी के साथ शॉपिंग के समय राधा मौजूद थी। प्रियांशी पुरानी बातों को भूल गई थी लेकिन राधा ने आज भी वही काम किया। राधा ने चुपके से महंगी फेस क्रीम चुराकर, दुकानदार की नज़रों से बचाकर अपनी ब्रा में रख ली। आज भी प्रियांशी ने यह सब अपनी आंखों से राधा को करते देखा। उसे 3 साल पुराना घटनाक्रम याद आ गया।
प्रियांशी के हाथ-पांव फूलने लगे। उसे लगने लगा कि उसने राधा को साथ लाकर अपनी गलती की पुनरावृत्ति कर दी है। उस दिन तो बच गए थे, आज पता नहीं क्या होगा?
सामान खरीदकर जब प्रियांशी निकलने को हुई तब… जिस बात का डर था वही बात हुई। दुकानदार ने अपनी दुकान से निकलने से पहले ही उन दोनों को आवाज लगाकर रोक लिया। प्रियांशी का दिल जोरो से धड़कने लगा। मन में डर सा बैठ गया। हुआ यह था कि दुकानदार जब अपना सामान चेक करके नियत स्थान रख रहा था तो उसे एक स्किन क्रीम गायब मिली। दुकानदार ने प्रियांशी से पूछा-
“मैडम जी, क्या आपने स्किन क्रीम भी ली थी?”
“नहीं तो…”
“अगर आपने नहीं ली तो किधर गई? अभी तो यही रखी थी। मैंने आपको दिखाई भी थी। मुझे लगता है कि गलती से आपके सामान में पैक तो नहीं हो गई। जरा सामान दिखाना।”
दुकानदार ने प्रियांशी द्वारा खरीदा हुआ सामान फिर से चेक किया, लेकिन क्रीम नहीं मिली। अब दुकानदार ने साथ में आई राधा पर शक जाते हुए प्रियांशी से कहा-
“मुझे लगता है कि आपके साथ आई मैडम ने ही वह क्रीम चुराई है। मुझे इनकी तलाशी लेनी पड़ेगी।”
“क्या हम आपको चोर लगते हैं? आप ऐसे कैसे तलाशी ले सकते हो? हम आपके सामने ही तो खड़े हैं तबसे? हम चोर नहीं है। आप ही कहीं रखकर भूल गए होंगे और चोर हमें बता रहे हो। अगर तुम्हें तलाशी लेनी है तो ये लो। यह रहा मेरा बैग। देख लो।” राधा ने गुस्सा करते हुए अपना बैग दुकानदार के आगे कर दिया।
बैग में तो क्रीम थी ही नहीं तो दुकानदार को मिलती कहाँ से? दुकानदार इस तरह की घटनाओं से परिचित था कि किस तरह महिलाएं अपने कपड़ों में छुपा कर चीजें/सामान बाहर ले जाती हैं। इसकी बहुत सी वीडियो उसने देख रखी थी। अब दुकानदार ने प्रियांशी और राधा दोनों से कहा-
“मैडम जी, वह क्रीम ₹500 की है। आपको सामान बेचकर मैंनें ₹50 भी नहीं कमाए होंगे और मेरा 500 का नुकसान हो गया। 500 बड़ी रकम है। इतना बड़ा नुकसान मैं हरगिज़ नहीं उठा सकता। मैं आप दोनों को इस तरह जाने नहीं दे सकता। मुझे आप दोनों की तलाशी लेनी पड़ेगी कपड़ों की तलाश लेनी पड़ेगी।”
“आप पुरुष होकर इस तरह हम महिलाओं की तलाशी नहीं ले सकते।” राधा गुस्से से बोली।
“मैडम, आप परेशान मत होइए। मैं आपको हाथ नहीं लगाऊंगा। अभी बगल की दुकान से दो महिलाओं को बुला रहा हूँ। आप उनके साथ वॉशरूम में जाना। वे आप लोगों के कपड़ों की तलाशी लेंगी। तलाशी में जब कपड़ो से कुछ नहीं निकलेगा, तब आप दोनों जा सकोगी। लेकिन मैं अब इस तरह आप दोनों को जाने नहीं दे सकता।”
कपड़ों की तलाशी की बात सुनकर राधा पसीने पसीने हो गई। वह सोचने लगी कि आज तो मैं बुरी फंसी। जैसे ही कपड़ों को उतार कर तलाशी ली जाएगी। चुराई क्रीम मिल जाएगी। तब क्या होगा? कहीं ऐसा ना हो कि यह दुकानदार पुलिस में हमें पड़वा दे? उधर प्रियांशी भी बहुत परेशान थी। उसे भी लगने लगा कि आज राधा की वजह से उसे भी चोर समझा जाएगा।
उसके साथ वह भी चोर/गुनहगार साबित होगी। अगर इस घटना का उसके परिवार वालों को पता चल चल गया तो उसकी कितनी बदनामी होगी? सब लोग यही समझेंगे कि दोनों सहेलियां मिलकर चोरी करती थी। एक सामान खरीदने के बहाने दुकानदार को बातों में फंसा लेती थी और दूसरी वस्तुएं चोरी/पार कर लेती थी।
पकड़े जाने के दुष्परिणामों को जानकर, प्रियांशी ने सोच लिया कि वह अपने और राधा के कपड़ों की तलाशी नहीं लेने देगी और दुकानदार के नुकसान की भरपाई कर देगी। बदनामी से बचने के लिए व चोरी के आरोप उन पर सही साबित न हों, इसके लिए बेहतर यही है कि दुकानदार के नुकसान कि भरपाई कर दे।
ऐसा सोचकर प्रियांशी ने अपने पर्स से ₹500 निकाले और दुकानदार को देते हुए, राधा का हाथ पकड़कर दुकान से बाहर आ गई।
बाहर निकल कर, कुछ दूर चलकर प्रियांशी ने राधा को खा जाने वाली नज़रों से घूरकर देखा। उसे राधा पर बहुत गुस्सा आ रहा था। मन कर रहा था कि राधा के गाल पर कसकर एक झापड़ लगा दे। लेकिन उसने खुद पर काबू किया और गुस्से से बोली-
“मैं तो समझती थी कि तीन वर्षों में तुम सुधर गई होंगी। अपनी चोरी करने की आदत छोड़ दी होगी, लेकिन तू कभी नहीं सुधरने की है। बेशर्म, अगर तुझे अपनी इज्जत का ख्याल नहीं है तो अपने साथ वालों की इज्जत का तो ख्याल किया कर। अगर मैं उस दुकानदार को उसकी क्रीम का पेमेंट ना करती तो आज हम दोनों के कपड़े उतरते। क्रीम मिलने पर दोनों ही चोर साबित होते, जबकि तेरे चोरी करने में मेरा कोई हाथ नहीं था, मेरी कोई गलती नहीं थी… लेकिन फिर भी मैं चोर मानी जाती। तब तुझे अच्छा लगता क्या?”
आगे बोलते हुए प्रियांशी बोली-
“तुझे दोस्त कहते हुए भी मुझे शर्म आती है। 3 साल पहले भी तुझे समझाया था, लेकिन तेरे ऊपर जूं न रेंगने की है। ‘ढाक के वही तीन पात’ वाली कहावत तेरे पर चरितार्थ होती हैं। आज से तेरा मेरा रिश्ता खत्म। तू अकेली खूब चोरी कर पर मुझे बख्श दे मेरी मां। याद रखना, मुझे दोस्ती से ज्यादा अपनी इज्जत प्यारी है।”
प्रियांशी की डाँट राधा चुपचाप खड़ी सुनती रही। आज उसकी आंखों में पश्चाताप के आंसू थे। आज सच में उसकी जान हलक में आ गई थी। आज उसे दिन में तारे नजर आ गए थे।
“ऐसा मत कहो राधा। तुम बहुत अच्छी इंसान हो। मैं तुम्हारे जैसे दोस्त को खोना नहीं चाहूंगी। मैं वादा करती हूं कि मैं आज के बाद कभी चोरी नहीं करूंगी। मुझे माफ कर दो।”
प्रियांशी राधा को माफी मांगते देखकर खामोश हो गयी। कुछ देर बाद बोली-
“अब माफी मत मांग। बस आगे से यह गलती न हो। कहते हैं कि सुबह का भूला, अगर शाम को घर वापिस लौट आये तो उसे भूला नहीं कहते।” यह कहकर प्रियांशी ने राधा को गले से लगा लिया।
इसके बाद वह राधा से विदा लेकर घर के लिए ऑटो में बैठ गई। ऑटो में बैठकर घर जाते समय प्रियांशी सोच रही थी कि इस घटनाक्रम के बाद अगर राधा सुधर गई तो यह बहुत अच्छी बात होगी… लेकिन प्रियांशी जानती थी कि राधा की यह आदत छूटने वाली नहीं है। बहुत लंबे समय से वह इस कार्य में संलिप्त रही है।
आज का यह ताजा ताजा मामला है, इसलिए वह माफी मांग रही है, अपनी चोरी करने की आदत पर शर्मिंदा है। लेकिन एक-दो दिन बाद वह फिर से चोरी करने की सोचेगी। बेशर्म कहीं की। वैसे भी अब मुझे किसी भी तरह का वास्ता राधा से रखना ही नहीं है। मैं अपनी गलती की पुनरावृत्ति बार बार नहीं कर सकती।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा
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