सोच
अविवाहित विभोर के लिए आज एक करोड़पति घर से रिश्ता आया है। विभोर एक शहर में एसडीएम के पद पर तैनात है। विभोर 15 दिन की छुट्टी लेकर घर आया हुआ है। हर रोज उसको देखने के लिए कोई ना कोई आ रहा था। विभोर घर पर अकेला है। परिवार के सदस्य बाहर गए हुए हैं।
लड़की के माता-पिता और भाई विभोर के सामने अपनी नाक पर रूमाल रखकर बैठे हुए हैं। टेबल पर खाने पीने के सामान(चाय, नमकीन, बिस्किट्स, फल, मिठाई आदि) रखे हुए हैं लेकिन वे कुछ खाना पसंद नहीं कर रहे हैं।
“अरे सर, आप कुछ लेते क्यों नहीं?” विभोर ने उनकी तरफ फलों की प्लेट बढ़ाते हुए कहा।
“बेटा, आप परेशान मत होइए। हम घर से खा पी कर चले हैं। पेट बिल्कुल फुल है। कुछ खाने का बिल्कुल भी मन नहीं है।” लड़की की माँ बोली।
“क्यों क्या हुआ? थोड़ा सा तो आप ले ही सकते हैं?” विभोर के पुनः बोलने पर ना चाहते हुए भी उन्होंने एक-एक टुकड़ा सेब का उठा लिया और बेमन से खाने लगे।
“अगर आपको ठीक नहीं लग रहा तो रख दीजिए। आप इत्मीनान से बैठिये। कुछ ही देर में मम्मी पापा आने ही वाले होंगे। आपने नाक पर ही रुमाल क्यों लगा रखा है?” विभोर ने पूछा।
“बेटा, आपके बारे में हमने काफी जानकारी ली है तब आपके यहाँ अपनी बेटी का रिश्ता करने आएं हैं। आपका घर, परिवार, मकान सब बढ़िया है। लेकिन हमें यहां घोड़े की शौच की दुर्गंध(बदबू) आ रही है। क्या आपने घर में घोड़े पाल रखे हैं?” लड़की के पिताजी बोले।
“हाँ जी, पिताजी घोड़े पालते हैं। बचपन से मैंनें अपने पिताजी को घोड़े खरीदने और बेचने का काम करते हुए देखा है। इसी काम को करके उन्होंने हम चार भाई बहनों को पढ़ाया-लिखाया और काबिल बनाया है। हमें तो बचपन से ही इसकी आदत है इसलिए दुर्गंध(बदबू) महसूस नहीं होती।” विभोर ने जवाब दिया।
“अच्छी बात है बेटा, शादी के बाद का क्या प्लान है? अपनी होने वाली वाइफ को साथ रखोगे या वह यहीं इस घर में रहेगी?” लड़की के पिता ने सवाल किया।
“सर, मेरी ड्यूटी तो आप जानते ही हैं। हमारे आए दिन इधर-उधर तबादले होते रहते हैं। शादी के तुरंत बाद तो वाइफ को अपने साथ रखना संभव न होगा। परिवार में मैं सबसे बड़ा हूँ। मेरी मां-बहन भी मेरी शादी को लेकर बहुत उत्साहित है।
मैं चाहूँगा कि मेरी होने वाली पत्नी अपना शुरुआती समय मेरे परिवार को दे, उन्हें समझे। माँ-बाप को भी बहू का सुख मिलना चाहिए। अगर सब कुछ ठीक रहा तो 6 माह के बाद.. व्यवस्था होने पर पत्नी को साथ रखने के बारे में सोचूंगा…लेकिन फिलहाल तो वह इसी घर में सबके साथ रहेगी।” विभोर ने स्पष्ट रूप से जवाब दिया।
“आपकी सोच अच्छी है। लेकिन बेटा… अब तो आप सब भाई-बहन संपन्न हैं, कामयाब हैं… रुपए-पैसों की भी कोई कमी नहीं है। आप सब भाई-बहन मिलकर अपने पिता का घोड़े पालने का यह गंदा और बेकार काम बंद कराकर उनको कोई कपड़ों की बड़ी-सी दुकान खुलवा दो या कोई और व्यवसाय करवा दो।
देख रहे हो तुम? यहाँ कितनी गंदी बदबू आ रही है? जगह-जगह घोड़े की शौच पड़ी हुई है। हमसे यहाँ सांस तक नहीं लिया जा रहा है, जबकि हम यहाँ कुछ समय के लिए ही आए हैं। हम सोच रहे हैं कि हमारी बेटी यहाँ कैसे रहेगी? मुझे तुम पसंद हो? तुममें कोई कमी नहीं। दान दहेज की चिंता मत करो।” लड़की के पिता ने अपनी बात स्पष्ट रूप से रखी।
“आप कैसी बात कर रहे हो सर? दान दहेज वाली तो कोई बात ही नहीं है। हम भाई-बहन में इतनी हिम्मत नहीं है कि हम उनसे ये कहें कि ये काम बंद करके दूसरा काम कर लो। वैसे भी हममें से किसी को उनके इस काम पर कोई ऐतराज नहीं है।”
“बेटा, एक शर्त पर हम तुमसे अपनी बेटी की शादी करने को तैयार है… मेरी बेटी यहाँ इस नर्क में नहीं रहेगी। तुम उसे अपने साथ रखोगे या फिर अपने पिताजी का घोड़ों का यह काम तुम्हें बंद करवाना होगा?” लड़की के पिता ने शर्त रखी।
“कैसी बातें कर रहे हो? मुझे तो कहीं कोई बदबू नहीं आ रही। जो भी मुझसे शादी करेगी उसको भी मेरी तरह रहना आना चाहिए। आपने सोच भी कैसे लिया कि आप मुझे खरीद लोगे? अगर आप मुझे एक करोड रुपए भी दोगे तो भी मैं कोई ऐसा वैसा काम ना करूँगा जिससे परिवार में, समाज में मेरे माता-पिता का सर नीचा हो, उन्हें अपमानित होना पड़े। मुझे अपने पिता के काम पर गर्व है।
मैं अपने पिताजी से कैसे कह सकता हूँ कि आप इस काम को छोड़कर कोई दूसरा काम कर लो जबकि मैंने अभी आपको बताया है कि मेरे पिता ने हम सब भाई-बहनों को यही काम करके हमें कामयाबी की राह दिखाई है। मैं तो आपको संभ्रांत परिवार का समझ रहा था लेकिन आपकी सोच तो बड़ी घटिया निकली। मैंने तो यही सुना था कि कोई भी काम छोटा-बड़ा नहीं होता। काम का प्रसार छोटा-बड़ा होता है।
काम नहीं… इंसान की सोच ही काम को छोटा या बड़ा बनाती है। बेहतर है कि आप अब यहाँ ठहरकर न तो अपना समय व्यर्थ करें और न मेरा। आपके लिए लड़के बहुत हैं और मेरी लिये भी लड़कियों की कोई कमी नहीं है। आपका बहुत बहुत धन्यवाद, जो आप अपना कीमती समय लेकर यहाँ पधारे। अब आप जा सकते हैं।” अपने माता-पिता के आने से पहले ही विभोर ने उनको घर से विदा कर दिया।
विचारणीय बिंदु:-
कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता। लोग काम को पैसे में तोलते हुए देखते हैं तब वहाँ काम बड़ा या छोटा हो जाता है। काम का प्रसार छोटा-बड़ा हो सकता है लेकिन काम नहीं। मायने यह रखता है कि हमारा चीजों को देखने का, समझने का, परखने का नजरिया और सोच कैसी है? क्या एक इंसान की बड़ी बातों से, उसकी बड़ी सोच से हम उसको सभ्य करार दे सकते हैं?? नहीं, बिल्कुल नहीं।
हम मनुष्यों का मापदंड, हमारा लेखा-जोखा, हमारे कर्मों से, हमारे व्यवहार से होता है क्योंकि, यदि हमारे कर्म एक आईना है तो हमारा व्यवहार हमारा प्रतिबिंब है। जब तक हमारे कर्म और हमारे व्यवहार, हमारी सोच के साथ मेल नहीं खातें तो फिर उस सोच का क्या अर्थ?

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा
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