कर्म

कर्म

कर्म

राहें चाहे जितनी कठिन हों,
मैं चलना जानता हूँ,
तेरे साथ की उम्मीद में,
मैं हर मंजिल पाना जानता हूँ।

कर्म ही मेरा साथी है,
पर तेरी याद भी संजीवनी है,
हर कदम पर तुझे पाने की आशा,
मेरे सम्पूर्ण जीवन की कथनी है।

मेरे सपनों में बस तू है,
पर मेहनत से है मिलन का रास्ता,
क्योंकि कर्म के बिना अधूरा है,
जो भी है, तुझसे मेरा वास्ता।

ना समय की रुकावट,
ना ही किस्मत का खेल,
तेरे बिना ये जीवन सूना,
पर कर्म से ही बनेगा सब कुछ मेल।

तेरी यादों में डूबा,
मैं अपनी राह बनाता हूँ,
तुझे पाने की चाह में,
अपने कर्म से मैं खुद को आजमाता हूँ।

धैर्य का सहारा लेकर,
मैं आगे बढ़ता जाऊंगा,
तेरे मिलने की उम्मीद से,
हर बाधा को मिटाऊंगा।

क्योंकि कर्म ही मेरा हौंसला है,
और तेरा प्यार ही मेरी जीत,
इन दोनों के संग मैं लिखूंगा,
अपने किस्मत की नई रीत।

कवि : प्रेम ठक्कर “दिकुप्रेमी”
सुरत, गुजरात

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