कर्म का फल
प्राचीन काल में एक छोटे से गाँव में एक युवक रहता था जिसका नाम आर्यन था। आर्यन एक बहुत ही धार्मिक और नेक दिल व्यक्ति था। वह हमेशा अपने आस पास के लोगों की मदद करने के लिए तैयार रहता था।
आर्यन के पिता का नाम विक्रांत था और वह एक बहुत ही मेहनती और ईमानदार व्यक्ति थे। विक्रांत ने अपने जीवन में बहुत मेहनत की थी और उसने अपने परिवार के लिए एक अच्छा जीवन बनाया था। उसके पास 50 बीघे जमीन थी, जिस पर वह अपने बेटे के साथ खेती करता था।
लेकिन एक दिन, गाँव के एक अमीर, दबंग व्यक्ति विशाल ने विक्रांत की धोखे से 20 बीघे जमीन हड़प ली, उस पर कब्जा कर लिया। विशाल बहुत ही दुष्ट और लालची प्रवृत्ति का व्यक्ति था। विक्रांत को यह बात बहुत बुरी लगी, उसने विशाल का विरोध किया लेकिन उस दुष्ट व्यक्ति के आगे उनकी एक न चली। थक हारकर उन्होंने उससे झगड़ना ठीक नहीं समझा और सब कुछ ईश्वर पर छोड़ दिया। उन्हें यकीन था कि देर सवेर ईश्वर जरूर इंसाफ करेंगे।
आर्यन को अपने पिता द्वारा विशाल को चुपचाप जमीन छोड़ देना, खामोश रहना… उसे अच्छा नहीं लगा। अब उसने विशाल से बदला लेने का फैसला किया। लेकिन विक्रांत ने उसे रोक लिया और कहा, “बेटा, बदला लेने की जरूरत नहीं है, बस धैर्य रखो। जो जैसा कर्म करेगा, उसको वैसा ही फल मिलेगा… बस वक़्त आने दो, वक़्त का इंतजार करो।
खुद भगवान मत बनो। ‘जैसे को तैसा’ या ‘ईंट का जवाब पत्थर से देना’ जैसा व्यवहार मत करो। ईश्वर का इंसाफ हमारे इंसाफ से लाख गुना बेहतर होता है। हमारे पास अब भी काफी जमीन है। हम उसी में संतोष करेंगे और उसी जमीन पर मेहनत करके आगे बढ़ेंगे।”
आर्यन ने अपने पिता की बात मान ली और धैर्य रखा। उसने विशाल से बदला लेने का ख्याल निकाल दिया।
इस तरह 20 वर्ष बीत गए। विशाल को अपने किए का फल मिला जो कि ईश्वर ने दिया। उसके बच्चे नकारा निकले। उम्र के साथ साथ उनमें दुर्व्यसन पैदा हो गए। धीरे धीरे उन्होंने सब जमीन, सम्पत्ति बेच खाई। उसकी पत्नी उसे छोड़कर चली गई। बूढ़ा होने के कारण पत्नी, बच्चों पर उसका जोर न चला। उसकी सारी जमीन और संपत्ति नीलाम हो गई और वह सड़क पर आ गया। उसको खाने के लाले पड़ गए।
एक दिन विशाल आर्यन के घर पहुँचा। उसको बहुत जोर की भूख लगी थी। उसने घर के बाहर खड़े होकर आवाज लगाई, “क्या मुझे कुछ खाने को मिल जायेगा?”
आर्यन और उसकी पत्नी ने उसको आदरपूर्वक भोजन करवाया। जब विदा लेने का नम्बर आया तब उसकी नज़र बरामदे में बैठे विक्रांत पर पड़ी। जबसे विशाल ने घर मे कदम रखा था, तबसे विक्रांत उसको देख रहे थे लेकिन विशाल की नज़र उन पर नहीं पड़ी। उन्हे भी विशाल द्वारा भोजन करते समय.. उसके सामने जाना उचित न जान पड़ा।
विशाल विक्रांत को देखकर झेंप गया। उसको नहीं पता था कि आर्यन विक्रांत का बेटा है। विशाल ने विक्रांत के आगे हाथ जोड़कर कहा-
“मैं तुमसे माफी मांगता हूँ। मैंने तुम्हारी जमीन हड़प ली थी, तुम्हारे साथ बदतमीजी भी की थी। लेकिन न तो तुमने और न ही तुम्हारे बेटे ने मुझसे बदला लिया। इससे पता चलता है कि तुम कितने दयालु हो। एक समय गाँव में सबसे ज्यादा जमीन होने के बावजूद आज मेरे पास कुछ नहीं है।
आज मैं अपने किए का फल भुगत रहा हूँ। मेरा सब कुछ बर्बाद हो गया है। चार चार बेटों के होते हुए, आज खाने पीने के लिए दूसरे लोगों पर आश्रित हो गया हूँ, सड़क पर आ गया हूँ। सच तो यह है कि कर्मो की सजा पा रहा हूँ। तुम संतोषी व्यक्ति हो। यही संतोष तुम्हारा सबसे बड़ा धन है।
इसी संतोष की बदौलत तुम कामयाब हो, दौलत, जमीन, जायदाद भरपूर है। सबसे बड़ी बात तुम्हारे बच्चे संस्कारी हैं, माँ बाप का ख्याल रखने वाले हैं। आज मेरी नज़र में सबसे अमीर तुम हो और मुझसे गरीब कोई नहीं। हो सके तो मुझे माफ़ कर देना।”
यह कहकर विशाल विक्रांत के घर से निकलने लगा तो विक्रांत ने उनको माफ करते हुए, सम्मान सहित अपने घर में जगह दी। अपने अंतिम समय तक विशाल उनकी दयादृष्टि पर जीवित रहा और विक्रांत के परिजनों को हर पल दुआएं देता रहा।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा
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