chhalawa

छलावा

छलावा

उस धरा से
इस धरा तक
उस गगन से
इस गगन तक
उस जहां से
इस जहां तक
उस परिवेश से
इस परिवेश तक
उस गांव से
इस शहर तक
का सफर…
रहा नहीं आसान
जिसने बदल दिए
सारे अरमान…
अपनों के साथ
जीने का सपना
बन कर…
रह जाएगा सपना
जो हो नहीं सकता
अब कभी अपना
अब अपनों को…
नहीं दे पाते वो सम्मान
जो थे कभी जीवन की जान

श्याम सुंदर

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