Khat par Kavita

वो फिर खत लिखने का जमाना आ जाए | Khat par Kavita

वो फिर खत लिखने का जमाना आ जाए

( Wo phir khat likhne ka zamana aa jaye ) 

 

वो फिर खत लिखने का
जमाना आ जाए

तुम्हारी याद मुझको
फिर तरोताजा करा जाए,

दिल की धड़कन ना पूछो
कितनी तेज हो जाए

पैगाम में तेरी खुशबू का
एहसास वो करा जाए

शब्दों को पढ़ते पढ़ते ही
यादों में तेरी खो जाए

खयालों में तेरे खोते ही
चेहरा गुलाबी हो जाए

खत में लिखे लफ्जों से
मदहोशी सी छा जाए

बेकरार इस दिल को
थोड़ा सुकून मिल जाए

खत को पढू मैं जब यहां
तुमको करार आ जाए

हां फिर खत लिखने का
वो दौर आ जाए

 

डॉ प्रीति सुरेंद्र सिंह परमार
टीकमगढ़ ( मध्य प्रदेश )

यह भी पढ़ें :-

सिंदूरी सूरज | Poem Sindoori Suraj

 

 

 

 

Similar Posts

  • शब्द | Shabd

    शब्द ( Shabd )  ( 2 )  शब्द से अधिक शब्द के भाव महत्व के होते हैं प्रसंग के अनुरूप शब्द बोध का होना जरूरी है ना व्यक्ति महत्वपूर्ण है न शब्द महत्वपूर्ण है महत्वपूर्ण तो उद्गम स्रोत होता है एक ही बात को कब ,किसने, किसके लिए कहा शाब्दिक अर्थ वही महत्व का होता…

  • सृजन का दीप जले दिन रात | Srijan ka Deep

    सृजन का दीप जले दिन रात (  Srijan ka deep jale din raat )   लिखें लेखनी सोच समझ कर,देख नए हालात। विषय सामयिक सृजन का,दीप जले दिन रात।।   चार स्तंभ अटल खड़े हैं,राष्ट्र का मान बढ़ाने को । कलम की ताकत बनी हमेशा,उच्च शिखर पहुंचाने को। सोया देश जगाने को, ना करें कोई…

  • शौर्य | Kavita

    शौर्य ( Shaurya )   बढ़ चले मतवाले रण में पराक्रम दिखलाने को अरि दल से लोहा लेने को वंदे मातरम गाने को   वीर वसुंधरा जननी वीरों की शौर्य साहस से भरपूर बारूद की भाषा में करते मंसूबे दुश्मन के चूर   डटकर रहते सीमा पर समर के वो सेनानी तलवारों की पूजा होती…

  • शहर में बढ़ते हुक्का बार | Hookah bar par kavita

    शहर में बढ़ते हुक्का बार ( Shahar mein badhte hookah bar )   थोड़ा समझो मेरे यार शहर में बढ़ते हुक्का बार। नशे ने घेर लिया है सबको डूबते जा रहे परिवार।   तंबाकू तबाही का घर तोड़ दो सारे बीयर बार। बिगड़े बच्चे आचार बचाओ संस्कृति संस्कार।   रगों में उतर रहा है जहर…

  • किशोर वय लड़कियों को प्यार से समझाएं | Kavita

    किशोर वय लड़कियों को प्यार से समझाएं! ************ किशोर वय लड़के-लड़कियां हार्मोनल दबाव में होते हैं, शारीरिक बदलाव और मानसिक चुनौतियों का सामना कर रहे होते हैं; लड़कियों में कुछ ज्यादा ही होते हैं। अल्पायु में ऐसे बदलाव उन्हें चिड़चिड़ा बनाती है, अपनी समस्याएं बताने के बजाए छुपाती हैं। किसी से नहीं बतातीं है, गुमसुम…

  • रात पूस की!

    रात पूस की! **** पवन पछुआ है बौराया, बढ़ी ठंड अति- हाड़ मांस है गलाया! नहीं है कोई कंबल रजाई, बिस्तर बर्फ हुई है भाई। किट किट किट किट दांत किटकिटा रहे हैं, कांपते शरीर में नींद कहां? निशा जैसे तैसे बिता रहे हैं। चुन बिन कर लाए हैं कुछ लकड़ियां- वहीं सुनगा रहे हैं,…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *