उम्मीद

“उम्मीद”

सर्दियों की एक धुंधभरी सुबह थी। कोहरे में लिपटा स्टेशन ठंड से सिहर रहा था। प्लेटफ़ॉर्म नंबर तीन पर एक वृद्धा बैठी थी—बिलकुल चुप, जैसे किसी ने जीवन की आवाज़ छीन ली हो। सिर पर जर्जर ऊनी चादर, गोद में पुराना टिफिन डिब्बा, और आँखों में एक जमी हुई प्रतीक्षा।

पास ही खड़े एक युवक ने दया-भाव से पूछा—
“माई, कहाँ जाना है आपको?”

वृद्धा ने धीरे-से उत्तर दिया, मानो अपनी ही आवाज़ से डरती हो—
“बेटा, दिल्ली… वहीं मेरा बेटा नौकरी करता है… दो साल से आया नहीं… इस बार बोला है, खुद लेने आएगा… शायद इस बार सच में आ जाए।”

युवक कुछ क्षण चुप रहा, फिर झिझकते हुए बोला—
“अगर न आए तो?”

वृद्धा की आँखों में नमी तैर गई, पर होंठों पर फीकी मुस्कान थी—
“तो अगली गाड़ी का इंतज़ार करूँगी… माँ कभी उम्मीद से हारती है क्या?”

इतने में अनाउंसमेंट हुआ—
“गाड़ी संख्या 12429, नई दिल्ली जाने वाली ट्रेन, प्लेटफ़ॉर्म नंबर तीन पर आ रही है।”

वह धीरे-धीरे खड़ी हो गई। आँखें गाड़ी के हर डिब्बे को निहारने लगीं… जैसे हर उतरने वाला उसके आँचल में आकर छुप जाएगा।

गाड़ी रुकी… भीड़ उतरी… फिर छँट गई…
पर उसका बेटा नहीं आया।

वृद्धा फिर वहीं बैठ गई। चादर और कसकर लपेट ली। टिफिन डिब्बा अब भी बंद था। पर उसकी आँखों में अब भी एक रोशनी थी—बुझी नहीं थी…
वह उम्मीद की रोशनी थी।

दार्शनिक निहितार्थ—

यह कथा केवल एक माँ की प्रतीक्षा नहीं, बल्कि उस भावना का प्रतिबिंब है जो रिश्तों को समय और दूरी के परे जीवित रखती है।

उम्मीद, माँ के आँचल में पले उस प्रेम की तरह होती है, जो बार-बार ठुकराए जाने पर भी मुरझाता नहीं।
यह सिर्फ एक वृद्ध महिला की कहानी नहीं—यह हर उस दिल की कहानी है जो रिश्तों के लौट आने का इंतज़ार करता है।
जहाँ दुनिया तर्क से चलती है, वहाँ माँ जैसे लोग प्रेम और विश्वास से जीते हैं।

और सच तो यह है कि
उम्मीद कभी वृद्ध नहीं होती।
वह हर धड़कन में, हर साँस में, हर आँसू में
एक नई सुबह की प्रतीक्षा करती रहती है।

अमरेश सिंह भदौरिया
प्रवक्ता हिंदी
त्रिवेणी काशी इ० कॉ० बिहार, उन्नाव

यह भी पढ़ें :-

Similar Posts

  • मलाल

    “गुरुजी, आप नीतू को स्कूल की साफ सफाई के काम से हटा दीजिए।” ग्रामीण जितेंद्र ने प्राथमिक विद्यालय के हेड मास्टर कृष्ण सर को स्कूल जाते देखकर रास्ते में ही उन्हें रोककर कहा। “भैया जी, शायद आपको पता नहीं.. उसको तो मैंनें छात्रहित में स्कूल की साफ-सफाई हेतु पिछले 1 साल से रख रखा है।…

  • एक आस अब भी | Kahani Ek Aas Ab Bhi

    सुदेश जी का अपना बसा बसाया कारोबार हो चुका है जिंदगी एक प्रकार से सेटल हो गई इसके लिए उन्होंने बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। जिंदगी के चार दशक कैसे बीत गए पता ही नहीं चला। अपने व्यवसाय को ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए उन्होंने दिन को दिन नहीं समझा और रात को रात।…

  • प्रामाणिकता | Laghu Katha Pramanikta

    रेल छोटे से रेलवे स्टेशन पर ठहरी. रामू ने चायवाले से चाय ली. चायवाले को २०० ₹ की नोट दी। चायवाला बाकी रकम गिनकर वापस करे। उस से पहले ट्रेन रवाना हो गयी। ट्रेन के रवाना होते ही पास बैठी मेरी पत्नी मेरे पर झल्लाने लगी की आप से एक काम ढंग से नहीं होता।…

  • उच्चता

    उच्चता कितना आकर्षक शब्दकिन्तु जितना आकर्षकउतना ही दूर यह हैपुरुषार्थ और लगन सेकोई भी कार्य बेहतर होता हैसंकल्प और प्रतिबद्धतासे होता बेहतरीनकार्य को श्रेष्ठता काजामा पहनाने के लिएरहना पड़ता है सदैवउसमें तन-मन से लीनप्रतिभा और क्षमता केयोग से वो उच्चता पाता हैअपनी अलग पहचान बनाता हैचाहे जीवन विकास काकार्य हो याचाहे हो किसी मेंयोग्यता प्रदर्शन…

  • ‘छेड़खानी और समझदारी’

    तीन व्यक्ति चौपाल पर खड़े होकर महिलाओं पर बढ़ती छेड़खानी की घटनाओं पर चर्चा कर रहे थे। तीनों व्यवसायी हैं। उनमें से पहला व्यक्ति बोला:- “कल यहीं मेरी दुकान के सामने एक लड़के ने एक लड़की को छेड़ा और उसके साथ बदतमीजी की। आसपास के सभी लोगों ने इस घटना को अपनी आंखों से देखा,…

  • काम होते गए ख़ुशी मिलती गई

    एक कस्बें में एक ग़रीब परिवार अपने इकलौते बेटे के साथ रहता था, उनकी पंसारी की एक छोटी सी दुकान थी.बेटा उनकी शादी के १५ साल बाद हुआ । बेटा बचपन से ही बड़ा होशियार था,१० वी और १२ वी कक्षा में अच्छे अंकों से पास हुआ, छात्र वृत्ति प्राप्त करने वाला छात्र था.प्रथम श्रेणी…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *