निशाना
तीव्र बुद्धि की सानिया एक गरीब लड़की थी। वह कक्षा 5 में पढ़ती थी। उसको जो भी सिखाओ या पढ़ाओ वह तुरंत सीख जाती थी और याद कर लेती थी। उसकी मैडम संध्या उसको बहुत प्यार करती थी। सानिया के पिता मजदूरी करते थे। पिछले 6 माह से सानिया विद्यालय बेहद कम आने लगी थी और पढ़ाई में पिछड़ने लगी थी। आखिरकार एक दिन संध्या मैडम ने सानिया से पूछ लिया-
“बेटा, तुम स्कूल इतना कम क्यों आ रहे हो? घर में सब ठीक है? कोई दिक्कत है तो बताओ। लेकिन स्कूल नियमित आना बंद मत करो। तुम पढ़ाई में बहुत अच्छी हो।
इस समय कक्षा 6 में प्रवेश हेतु नवोदय एवं विद्या ज्ञान के परीक्षा फॉर्म निकले हुए हैं। अगर तुम यह परीक्षा पास कर लोगी तो कक्षा 12 तक की पढ़ाई-लिखाई, रहना-खाना-पीना बिल्कुल फ्री होगा।
तुम्हारे घरवालों पर भी किसी तरह का.. तुम्हारी पढ़ाई को लेकर कोई दबाव नहीं रहेगा। मुझे पूरा यकीन है कि तुम एग्जाम पास कर लोगी। तुम्हारी जिंदगी बन सकती है, लेकिन इसके लिए तुम्हें रोज विद्यालय आना पड़ेगा।
बोलो? क्या कहती हो? तुम्हारा फॉर्म भरूं या नहीं? एग्जाम की तैयारी मैं खुद करवाऊंगी और परीक्षा की तैयारी के लिए तुम्हें बुक्स लाकर भी दूंगी?”
यह सुनकर सानिया बोली- “मैडम जी, हम तो पढ़ना चाहते हैं। हमारा स्कूल आने का रोज मन भी होता है लेकिन मम्मी-पापा आने नहीं देते। स्कूल जाने को बोलती हूँ तो चिल्लाते हैं, मारने को दौड़ते हैं।
कहते हैं कि स्कूल जाकर क्या DM बन जाएगी। चुपचाप पड़ी रह और अपने छोटे भैया को सम्भाल, उसको खिला और अपनी मम्मी की काम में मदद कर, घर का काम सीख, शादी के बाद यही काम आएगा। पापा कह रहे हैं कि मैं बड़ी हो रही हूँ और अगले 5 सालों में वे मेरी शादी कर देंगे।
मैं पढ़ना चाहती हूँ पर….” यह बोलते-बोलते सानिया की आँखों से आँसू बहने लगे। संध्या ने उसको प्यार से सहला कर चुप कराया। मां बाप की अपनी बेटी को लेकर इतनी गंदी सोच है, यह जानकर संध्या को बड़ा धक्का लगा।
वे सोचने लगीं…एक तरफ जहां पूरे देश में “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” के नारे लग रहे हैं.. लड़कियां हर क्षेत्र में लड़कों को पीछे छोड़कर सफलता के नित नये कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं, वहीं इस तरह की दकियानूसी सोच निंदनीय है।
संध्या मैडम ने सानिया से कहा- “बेटा तुम परेशान ना हो। मैं तुम्हारे परिवार से बात करती हूँ। मैं तुम्हारी प्रतिभा बेकार नहीं जाने दूंगी। मुझे पूरा यकीन है कि एक दिन तुम अपने मां-बाप का और हमारे विद्यालय का नाम रोशन जरूर करोगी।” उन्होंने सानिया को आश्वस्त किया।
अगले दिन संध्या ने सानिया के पिता को फोन करके सानिया के विषय में बात करनी चाही, लेकिन उन्होंने काम का बहाना बनाकर मैडम से बात करनी पसंद ना की। इसके बाद संध्या मैडम ने सानिया की मम्मी को विद्यालय बुलाया और उनसे कहा- “आप सानिया को नियमित स्कूल क्यों नहीं भेज रहीं हो?
मैं सानिया को कक्षा 6 में प्रवेश हेतु नवोदय एवं विद्याज्ञान प्रवेश परीक्षा फार्म भरवाना चाहती हूँ। इस मामले में आपकी मदद चाहिए।” लेकिन सानिया की मां ने सानिया को स्कूल भेजने को लेकर कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया। कहने लगी- “घर पर बहुत काम रहता है।
सानिया बच्चों का ध्यान रखती हैं तो मुझे घर का काम करने में आसानी हो जाती है। सानिया से छोटे चार भाई बहन और हैं। मैं कहां तक सबका ध्यान रखूं? अब यह समझदार और बड़ी हो गई है तो इसी को रोक लेती हूँ। तुम ही बताओ मैं क्या करूं?”
“यह तो बड़ी गलत बात है कि एक मासूम, छोटी बच्ची पर आप काम का इतना बोझ डाल रहे हो। यह इसके पढ़ने की उम्र है। क्यों तुम सानिया के सपनों का गला घोट रही हो, पढ़ने नहीं दे रही हो? इतनी महंगाई वाले दौर में इतने सारे बच्चे पैदा करने की क्या जरूरत थी?”
मैडम ने उनपर तंज कसा, फिर स्थिति संभालते हुए बोली- “क्या आप नहीं जानती कि आपकी बेटी पढ़ाई में कितनी अच्छी है? अगर आप सानिया को पढ़ने का मौका देंगी तो निश्चित ही एक दिन सानिया बड़ी अधिकारी बनकर तुम्हारी सब गरीबी हर लेगी। तुम्हारा मान बढ़ाएगी। हम सबको सानिया पर नाज होगा।” मैडम ने समझाने का प्रयास किया।
“बस मैडम, यह सब कहने की बातें हैं। हम गरीबों को कौन नौकरी दे रहा है। अमीर और अमीर होते जा रहे हैं, गरीब और गरीब। अच्छा तो अब चलती हूँ। घर पर बच्चे अपनी दादी को परेशान कर रहे होंगे।” अपने दुधमुंहे बच्चे को संभालते हुए सानिया की मम्मी बोली और स्कूल से निकल गई। बेचारी संध्या मैडम उनको जाते देखती रही।
सानिया के मम्मी पापा से उन्हें निराशा हाथ लगी। उस रात संध्या मैडम को नींद नहीं आई। उन्हें रह रहकर सानिया का ख्याल आ रहा था। वे उसके लिए कुछ करना चाहती थी लेकिन क्या करें? कुछ सूझ नहीं रहा था। अगले दिन से सानिया स्कूल नहीं आई। इस तरह 7 दिन और बीत गए, उधर प्रवेश परीक्षा फॉर्म भरने की अंतिम तिथि नजदीक आ रही थी।
एक सुबह, संध्या मैडम ने अपने विद्यालय की दो मैडमों (पूनम और रजनी) के साथ सानिया के घर पर धावा बोल दिया। उस समय सानिया अपने भाई को गोद में लेकर, बोतल से दूध पिला रही थी, सानिया की मम्मी बर्तन धो रही थी, सानिया की दादी चारपाई पर बैठी थी और उनकी बगल में सानिया के पापा लेटे हुए सुस्ता रहे थे।
संध्या ने दोनों मैडमों से कहा- “आप दोनों जल्दी से अपना मोबाइल निकालो और कैमरा ऑन करके वीडियो बनानी शुरू करो। मैं आज इनको देखती हूँ कि कैसे, यह अपनी बेटी को स्कूल नहीं भेजेंगे?”
साथ आयीं दोनों मैडम मोबाइल निकाल कर वीडियो बनाने लगीं। वीडियो बनता देखकर सानिया के मम्मी-पापा सकपका गए और चिल्लाते हुए बोले- “यह सब बंद करो। यह क्या बदतमीजी है? इस तरह हमारे घर में आकर वीडियो बनाने का क्या मतलब?”
“बदतमीजी हम कर रहे हैं या आप? आप अपनी बेटी को स्कूल क्यों नहीं भेज रहे? जवाब दो।” संध्या ने गुस्से से कहा।
“जवाब हम दे देंगे, लेकिन पहले वीडियो बनाना बंद करो।” सानिया के पिता बोले।
“वीडियो बननी बंद नहीं होगी। जो भी कहना है.. कैमरे के सामने बोलो, ताकि सबको पता चल सके आखिर दिक्कत कहाँ है? सरकार भी तुम्हारी समस्या सुन सके और उसे दूर कर सके?”
ऐसा सवाल सुनकर उनसे कोई जवाब नहीं बना। उसके बाद संध्या ने बोलना शुरू किया-
“क्या तुम नहीं जानते कि आरटीई (शिक्षा के बाल अधिकार कानून) के तहत 6 से 14 वर्ष के बच्चों को पढ़ाई से रोकना एक गम्भीर अपराध है।
बच्चों को पढ़ने न देने पर, उनसे जबर्दस्ती काम करवाने पर, उनकी आज़ादी छीनने पर, बच्चों का हक मारने पर माता-पिता को सजा हो सकती है। हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी भी “बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ” का नारा दे रहे हैं और तुम बेटी को पढ़ने नहीं दे रहे। कितनी शर्मनाक बात है? तुम्हें तो डूब मरना चाहिए।”
दोनों मैडम की तरफ मुखातिब होते हुए संध्या बोली- “मैडम जी, पूरे घर की, बच्चों की, सानिया की और इनके मम्मी पापा की बातों की वीडियो अच्छे से बना लो। वीडियो बनने के बाद, आप वीडियो मेरे नंबर पर भेज देना।
जब सबूत के साथ इनकी शिकायत होगी कि किस तरह ये लोग बच्चियों का हक मार रहे हैं, उन्हें स्कूल नहीं भेज रहे, घर के कामों में लगा रहे हैं, इनकी मासूमियत छीन रहे हैं तो इन्हें सब सरकारी योजनाओं का लाभ मिलना बंद हो जाएगा जैसे राशन मिलना, वृद्धावस्था/विधवा पेंशन मिलना, कन्या सुमंगला योजना के अंतर्गत लाभ मिलना, आयुष्मान कार्ड के द्वारा इलाज करना इत्यादि।
तब इनकी अकल ठिकाने आएगी। तब इन्हें पता चलेगा कि बेटियों को ना पढ़ने देने की सजा सरकार ने क्या तय कर रखी है? प्यार की भाषा तो किसी को समझ में ही नहीं आती। हम लोगों पर कितना दबाव है, स्कूल में नामांकन, उपस्थिति, व ठहराव बढ़ाने के लिए।
हम इनसे कह-कहकर मर गए, अपने बच्चों को स्कूल भेजो, स्कूल भेजो। परंतु इन्हें शर्म कहाँ आएगी? आओ मैडम, अगर वीडियो बन गई है तो चलते हैं। अब सानिया को स्कूल भिजवाने का काम और इनको सजा दिलवाने का काम सरकार करेगी।” इतनी सारी बातें सुनकर सानिया के मां-बाप के मुंह से एक शब्द ना निकला।
वे चुपचाप सुनते रहे। जैसे ही तीनों मैडम उनके घर से निकलने लगी तो सानिया की मम्मी और पापा ने गिड़गिड़ाकर उनको रोकते हुए कहा-
“मैडम जी, हमें माफ कर दो। आप हमारी शिकायत मत करना, नहीं तो हमारा राशन पानी रुक जाएगा। हमारे सामने बड़ी दिक्कत हो जाएगी। हम गरीब मजदूर आदमीं हैं। हम पर तरस खाओ।
सानिया कल से स्कूल आ जाएगी और रोज आएगी। अब हम उसको नहीं रोकेंगे। उसकी पूरी पढ़ाई करवाएंगे। हमसे अनजाने में गलती हो गई। हमें नहीं पता था कि बच्चा ना पढ़ाने पर सरकार सभी योजनाओं का लाभ देना बंद कर देती है। अब गलती नहीं होगी, सानिया रोज स्कूल आएगी।”
तीनों मैडम ने उनकी इस बात का कोई जवाब देना उचित न समझा और वहां से निकल गईं। संध्या मैडम ने यह सोचकर हवा में एक तीर मारा था, शायद निशाने पर लग जाए। कहते भी हैं कि अगर सीधी उंगली से घी ना निकले तो उंगली टेढ़ी कर लेनी चाहिए। इसका रिजल्ट सकारात्मक रहा।
अगले दिन सानिया तैयार होकर सबसे पहले विद्यालय के गेट पर खड़ी मिली और हर रोज नियमित स्कूल आने लगी। मेहनत से पढ़ने लगी। पढ़ाई में वह तेज थी ही। आखिरकार अपनी मेहनत और संध्या मैडम की कोशिश से.. प्रवेश परीक्षा पास करके सानिया ने नवोदय विद्यालय में प्रवेश पा लिया। अब यहां से सानिया अफसर बनकर अपने सब सपने पूरे कर सकती है।
देखा जाए तो संध्या मैडम का उसके माता-पिता से इस तरह का व्यवहार करना, वीडियो बनाना नियम के विरुद्ध था। अभिभावक अगर शिकायत कर देता तो उनकी नौकरी पर भी गाज गिर सकती थी।
अभिभावक से इस तरह का दुर्व्यवहार नहीं करना चाहिए मगर मजबूरीवश एक बच्ची को पढ़ाने और उसके सपने पूरा करने के लिए उन्हें यह सब झूठा नाटक करना पड़ा।
संध्या को यकीन है कि एक दिन सानिया जरूर कुछ बनेगी और उनको याद रखेगी। सानिया के मां-बाप को सबक सिखाने के लिए संध्या को यही जरूरी लगा। संध्या मैडम ने सही किया या गलत? नहीं पता? लेकिन उन्हें जो सही लगा, वह उन्होंने किया। इस बात का उन्हें रत्ती भर अफसोस नहीं है।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा
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