• देख लिया | Geet Dekh Liya

    देख लिया ( Dekh Liya ) अन्तस लहरों में ज्वार उमड़ता देख लिया। उनकी आँखों में प्यार छलकता देख लिया ।। कैसी सुगंध यह फैल रही उर-उपवन में। जब खिला सरोवर में कोई जलजात नहीं। किसने इस मन को बाँध लिया सम्मोहन में। साँसें महकीं या प्राण जले कुछ ज्ञात नहीं । अब डोल रहा…

  • सावन आया तू भी आ जा | Geet Sawan Aaya

    सावन आया तू भी आ जा ( Sawan aaya tu bhi aaja ) सावन आया तू भी आ जा। मेरे मन की प्यास बुझा जा। कैसी ह़ालत है क्या बोलूं। तू जो बोले तो लब खोलूं। पल भर मेरे पास में आ कर। मेरी सुन जा अपनी सुना जा। सावन आया तू भी आ जा।…

  • नया भारत | Kavita Naya Bharat

    नया भारत ( Naya Bharat ) पतझड़ का पदार्पण हुआ है हर ओर एक दुःख छाया है उजड़ गया जो उपवन उसे फिर बारिश से हमें खिलाना है अमावस की स्याह रात है एक-दूसरे के हम साथ है अंधियारा मिटाने के लिये मिलकर दीप जलाना है मझधार में फंसी है नाव हमारी फिर भी हिम्मत…

  • स्वयं को बदले और

    स्वयं को बदले और ज़माने में आये हो तो जीने की कला को सीखो। अगर दुश्मनों से खतरा है तो अपनो पे भी नजर रखो।। दु:ख के दस्तावेज़ हो या सुख की वसीयत। ध्यान से देखोगें तो नीचे मिलेंगे स्वयं के ही हस्ताक्षर।। बिना प्रयास के मात्र हम नीचे गिर सकते है। ऊपर उठ नहीं…

  • मूल पंजाबी कविता- अमरजीत कौंके | अनुवादक- डॉ. जसप्रीत कौर फ़लक

    डॉ.अमरजीत कौंके पंजाबी साहित्य के आकाश पर ध्रुव तारे की तरह चमकता हुआ नाम है जिसकी रोशनी में पंजाबी साहित्य मालामाल हुआ है। उनकी रचनाएँ प्रेम के सरोकारों को नए दृष्टिकोण से परिभाषित करती हैं। उनकी कविता की विशेषता है कि यह पाठक से बड़ी ख़ामोशी से हम – कलाम होते हुए उस की रूह…

  • रक्षा बंधन ये कहे | Raksha Bandhan ye Kahe

    रक्षा बंधन ये कहे ( Raksha Bandhan ye Kahe ) रक्षा बंधन प्रेम का, मनभावन त्यौहार। जिससे भाई बहन में, नित बढ़े है प्यार। बहनें मांगे ये वचन, कभी न जाना भूल। भाई-बहना प्रेम के, महके हरदम फूल।। रेशम की डोरी सजी, बहना की मनुहार। रक्षा बंधन प्यार का, सुंदर है त्योहार।। रक्षा बंधन प्यार…

  • ह़ाजत तुम्हारी | Ghazal Hajat Tumhari

    ह़ाजत तुम्हारी ( Hajat Tumhari ) मयस्सर हो गर हमको उल्फ़त तुम्हारी। करेंं हर घड़ी दिल से मिदह़त तुम्हारी। न छूटेगी अब हमसे संगत तुम्हारी। हमें हर क़दम पर है ह़ाजत तुम्हारी। हमारी शिकस्ता सी इस अन्जुमन में। मसर्रत की बाइ़स है शिरकत तुम्हारी। जहां भर की दौलत का हम क्या करें,जब। ख़ुशी दिल को…

  • आवाज मन की | Kavita Awaz Man Ki

    आवाज मन की ( Awaz Man Ki ) ताना-बाना दिमाग का मन से, छुआ-छूत जाति-धर्म मन से । मिटाते भूख नजर पट्टी बांध-, बाद नहाते तृप्त हो तन से। क्या गजब खेल मन का भईया , दुश्मन भी कुछ पल का सईया। उद्घाटित उद्वेलित उन्नत उन्नाव -, उद्विग्न हो नियम की मरोड़ता कलईया। फिर दलित…

  • जो मुमकिन हो | Ghazal Jo Mumkin ho

    जो मुमकिन हो ( Jo Mumkin ho ) मिलो जिनसे कभी, लहजा नरम रखना, जमीं पर तुम सदा अपने कदम रखना ।। बहक जाए नहीं इकदाम इशरत मे, अदावत में ज़रा अपना करम रखना ।। मुलाक़ातों का होगा सिलसिला कायम, मिलें नजरें तो आँखो मे शरम रखना।। बनाकर दूरिया चलना मुहब्बत में, फसाने मे हकीकत…

  • अपनापन | Laghu Katha Apnapan

    निशा जी को परिचारिका बड़े प्यार से उनके कमरे में बिठाकर उन्हें सब कुछ समझाकर बाहर निकल गई। निशा जी गौर से कमरे को चारों तरफ से देखने लगीं। कुर्सी से उठकर खिड़की के पास आ गई और बाहर देखने लगीं। बाहर बहुत सुंदर फूलों से सजा बगीचा देख उनके होंठों पर मुस्कान तैर गई।…