पुरस्कार मिले या तिरस्कार
पुरस्कार मिले या तिरस्कार

पुरस्कार मिले या तिरस्कार

 

यथार्थ की धरातल पर

खड़े होकर ,

सच को कर लूँगा स्वीकार

पुरस्कार मिले या तिरस्कार |

 

ना कभी डगमगाऊंगा ,

कभी नहीं घबराऊंगा ,

झंझावातों से टकराऊंगा ,

मजधारों से हाथ मिलाऊँगा ,

हिम्मत नहीं मैं हारूँगा |

सब कुछ कर लूँगा स्वीकार ,

पुरस्कार मिले या तिरस्कार |

 

अन्याय नहीं सह पाऊँगा

चाहे मैं टूट जाऊँगा |

करके कुछ मिशाल बनूँगा

दुनिया के लिए मशाल बनूँगा |

धरती मेरी अपनी माँ है

माँ के लिए मैं ढाल बनूँगा |

दुश्मन खातिर तलवार बनूँगा |

सब कुछ कर लूँगा स्वीकार |

पुरस्कार मिले या तिरस्कार |

 

जाति पाति के झगड़ों से

मजहबी  रगड़ो  से ,

अपने आपको दूर करूँगा

सबके दिल में प्यार भरूँगा |

मानव बनकर जीऊँगा

मानव बनकर मर जाऊँगा |

सब कुछ कर लूँगा स्वीकार |

पुरस्कार मिले या तिरस्कार  !

 

गीत प्रेम के गाऊँगा

जागूँगा और जगाऊँगा |

द्वार द्वार मैं जाऊँगा

सबको यही बताऊँगा |

ईश्वर है सबका एक

ईश्वर है सबका एक |

फिर , सब कुछ कर लूँगा स्वीकार |

पुरस्कार मिले या तिरस्कार |

 

🖋

लेखक :– एम. एस. अंसारी (शिक्षक)

गार्डन रीच रोड़
कोलकाता -24 ( पश्चिम बंगाल )

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