पूर्णमदः के फ्लैप पर
प्रेम की न कोई भाषा होती है,न परिभाषा,न सीमाएँ उसे सीमित करती हैं , न दूरियाँ उसे ओझल करती है, वह दूरी जीवन और मृत्यु भी क्यों न हो!
“पूर्णमिदम् ” के बाद सरोज कौशिक का यह उपन्यास ” पूर्णमदः”; अलग-अलग होते हुए भी ये दोंनो उपन्यास एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।वह अध्यात्म के आलोक में प्रकाशमान,तो यह जीवन के संघर्षों के बीच के पवित्र दीप को अपने सचेत आत्मबोध की ओट में बचाते हुए एक सघन यात्रा।
‘पूर्णमदः’ में पीड़ा है, अतीत के दुखते घाव हैं,स्मृति में कोंधती विविधवर्णी छविया हैं , चहुँ ओर व्याप्त कालिमा में अपने अंतस की पवित्रता को निष्कलंक रखते अपने मूल्यों को बचाने का संघर्ष है और जीवन तथा समाज में मनुष्य को बचाने का संघर्ष है और जीवन तथा समाज में मनुष्य की आत्मा को कचोटती, खोखला करती अपूर्णताओं के बरक्स पूर्ण को बचाने और अगली पीढ़ियों के लिए संरक्षित रखने की कामना है।
भावनाओं के सघन चित्रों से परिपूर्ण एक पठनीय औपन्यासिक कृति।
अतीत से ही जन्म लेता है एक नया भविष्य। अतीत के भीतर जलती मशालें और उसी ज्वलंत मशाल से प्रज्ञा का एक नया भविष्य निर्मित होने जा रहा है।प्रज्ञा ,ऋचा की आत्मजा है जो अग्निकन्या, अग्निवर्णा हो सकती है और कुछ नहीं।सच,हर जीवन का,हर सम्बन्ध का अपना एक इतिहास होता है अगर वह जीवन कहलाए जाने लायक हो तो?
प्रज्ञा का इतिहास, गर्भ से आज तक का इतिहास, उदाहरण है कि ऋचा के साथ बिटिया प्रज्ञा का जीवन अंगारों पर चला है।अभी तो जंग शुरू हुई है,उसके और प्रज्ञा के जीवन की जंग जारी है।…ज़िन्दा हैं,ख़्वाब है तो निश्चित ही जंग जारी है,और रहेगी।
प्रज्ञा का अपनों से बिछुड़ने का दुख तो रहेगा ही।यहाँ खुला आसमान है,वहाँ खुला आसमान मिलेगा? लेकिन यह तो निश्चित है कि एक खुला आसमान ज़रूर छूटेगा। इस जंग की कोई समाप्ति नहीं।…
ऋचा ने जी -तोड़ मेहनत करके प्रज्ञा को क़ाबिल बनाया था।विरोध सहते हुए। और विरोध भी अपने-आप को आधुनिक कहे जाने वालों से।कभी-कभी विरोध की आंच प्रज्ञा तक पहुंच जाती । उसके अपने जन्म के अस्तित्व का प्रश्न अग्निबाण -सा छीजता रहता था।
प्रज्ञा में जन्मतः ही एक शक्ति थी जो हर घायल अवस्था से बाहर ला कर स्वस्थ कर देती थी।ऋचा ने मठ के हादसे का ज़िक्र प्रज्ञा से किया था और निर्णय उसी के हाथ थमा दिया था।वह अपनी माँ के प्रति आदर भाव रखती थी,एक पूजा भाव।प्रज्ञा ने भी अतीत को न छूते हु,अपनी कलाकार आत्मा को व्यक्तित्व का अंग बना लिया था।
इसी उपन्यास से।
और यह है सरोज कौशिक ,लेखिका की ओर से:
‘पूर्णमिदम् ‘के बाद अब ‘पूर्णमदः’। एक ही धूरी के दो सिरे।एक सिरा आध्यात्मिक धारणा से आलोकित तो दूसरा सिरा संसार रहकर भी संसार के बंधनों से मुक्त।’ पूर्णमिदम् शक्ति है तो “पूर्णमदः” शिव। अपनी -अपनी इकाई में पूर्ण लेकिन सम्पूर्ण नहीं।भिन्न-भिन्न लेकिन अभिन्न सम्बन्ध “पूर्णमिदम ” की ऋचा और “पूर्णमदः” का वीरेश्वर, एक -दूसरे के पूरक।एक के बिना दूसरा अधूरा। “पूर्णमिदम्” और “पूर्णमद ” अलग-अलग उपन्यास होते हुए भी एक ही श्रृंखला की कड़ियाँ हैं।

सरोज कौशिक







