अमृत स्नान

सच्चा अमृत स्नान

स्नानर्थियों का रेला चला आ रहा था। श्रद्धा का सैलाब था कि रुकने का नाम नहीं ले रहा था। 144 वर्ष बाद लगने वाले अमृत कुंभ की अमृत बूंद पाने के चक्कर में लोगों का उत्साह देखते ही बन रहा था।

सबको यही लग रहा था कि गंगा मैया बुलाए हैं तो जरूर शरण देंगी। सुधीर इस प्रकार के जन सैलाब को देखकर दंग था। उसने अपना नया कमरा गंगा के किनारे लिया हुआ था। उसने देखा कि कुछ लोग उसके घर के सामने ही खुले में लेटे हुए हैं।

वे सभी गायत्री परिवार के परिजन थे। वह गायत्री मंदिर भी था। लेकिन उनके बहुत अनुनय-विनय के बाद भी उन्हें कमरा नहीं मिल सका। उसमें से लोग कह रहे थे कि हम परिवाजक हैं मुझे कमरा दे दो बाबूजी। लेकिन वहां के पुजारी ने एक ना सुनी। वह छह लोग थे और वो लोग आकाश के नीचे सोने को मजबूर थे।

सुधीर भी मजबूर था क्योंकि वह कोई निर्णय नहीं स्वयं से ले सकता था। उसके कमरे में भी पहले से ही पांच लोग आ चुके थे।

स्नार्थियों में भी एक बूढ़ी अम्मा को भयानक खांसी आ रही थीं । खांसते-खांसते उठकर बैठ जाती थी। सुधीर परेशान था कि उनकी कैसे सहायता करें ?

उसके पास एक मोटी रजाई थी उसने सोचा कि यदि रजाई को दे दिया जाए तो सभी लोग मिलकर ओढ़ सकते हैं । उसे क्या था वह तो बंद कमरे में था किसी प्रकार रात बीत जाएगी।

उसने अपनी एक मात्र रजाई उन्हें दे दिया इससे उसे बहुत आनन्द की अनुभूति हुई। रात्रि में उसे नींद नहीं आ रही थी। वहीं पर भंडारा शुरू होने वाला था तो देर रात्रि तक उसने भंडारे में जन सेवा किया। इस प्रकार देर रात्रि के 2:00 बज गए। फिर लेटने गया तो उसे नींद नहीं आए।

सुबह उसके पेट में हल्का सा दर्द होने लगा। लग रहा था उसे ठंड लग गए। रात्रि विश्राम करने वालों में एक होमियोपैथी डॉक्टर भी थे। उनसे सुधीर ने पूर्व में कुछ दवाई ठंड के लिए हुई थी उन्होंने इसी दवा को खाने के लिए कहा। उसे दवा को खाने के बाद ठंड का असर धीरे-धीरे समाप्त हो गया और पेट का दर्द भी मिट गया।

सुधीर को ऐसा लग रहा था कि उसने सच्चा अमृत स्नान कर लिया। उसमें से एक पंडित जी ने कहा कि आपको आज तो गंगा मैया में स्नान करना ही चाहिए था। सुधीर ने उनसे कहा कि कोई बात नहीं गंगा मैया कहीं चली नहीं जा रही हैं । हम तो गंगा के घाट पर ही हैं जब फुर्सत होगा तो स्नान कभी कर लेंगे ।

पहले हमें दूर दराज से आने वाले क्षेत्र वासियों की सेवा करनी चाहिए। फिर पेट दर्द में आराम होने के बाद वह पुनः सेवा में जुट गया।

इसी बीच उसे कहीं से यह खबर मिली कि संगम तट पर भगदड़ मच गई थी रात में जिसमें कई लोग हताहत हुए। यह सुनकर उसका मन बड़ा दुखित हुआ। उसके आंखों से सहज में आंसू झर झर बहने लगे।

उसने जब सुना के यह सब मात्र अमृत बूंद पाने के चक्कर में ऐसी घटना हुई तो वह सोचने लगा -“इस आधुनिक युग में उन्हें जन्मो जन्मो से कौन यह विश्वास मन में भर रहा है कि यदि तुम अमृत बूंद नहीं पियोगे तो प्यास ही रह जाओगे । इसलिए चाहे मरो या जियो लेकिन अमृत बूंद पी करके ही रहो।”

वह सोचने लगा कि कौन है जो हजारों वर्षों से जनता को मूढ़ बनाए हुए हैं। झूठ पाप पुण्य स्वर्ग नरक में उलझाए हुए हैं। क्यों अपनों का गम भी उन्हें इस प्रकार के पाखंडों से मुक्ति नहीं दिला पा रहा है।

उसने जब यह सुना कि अमृत बूंद पाने की घड़ी के इंतजार में सब टकटकी लगाए हुए हैं तो उसे बड़ा दुःख हुआ। वह समझ नहीं पा रहा था कि कौन है जो जनता को इस प्रकार मूढ़ बनाते ही जा रही है।

वह सोचने लगा कि क्यों कोई मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, या फिर राष्ट्राध्यक्ष किसी के क्यों ना बह सकें आंखों में आंसू सब पुण्य की डुबकी लगाते रहे अमृत बूंद पानी के चक्कर में क्योंकि वहां आम जनता मरी थी।

उस दिन उसे नींद नहीं आई। कुंभ मेला में जो वह रोज जाया करता था उसके बाद से उसकी कुंभ में जाना के लिए जैसे टूट सा गया।

वह सोचने लगा कि – ” क्या सामान्य जनता के मरने की कोई कीमत नहीं होती है। क्या कोई वीआईपी, धर्माध्यक्ष या नेता मंत्री आदि मरता तो इसी प्रकार से अमृत स्नान लोग करते रहते। क्या ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय शोक न घोषित कर दिया जाता। फिर आखिर क्यों लोग अमृत स्नान आम जनता की लाशों पर करते रहे।”

प्रश्न बड़ा पेचीदा था। कई दिनों से उसका मन उलझन में रहा। वह समझ नहीं पा रहा था कि लोग क्यों इतने अंधविश्वासों से आज भी ग्रसित हैं। क्यों लोग इतने अंधविश्वासों में खोए हुए हैं। आखिर थोड़ी सी अमृत बूंद नहीं पियेंगे तो क्या हो जाएगा।

उसे किसी ने बताया कि एक बाबा कह रहा था कि जो अमृत बूंद नहीं पियोगे तो सच्चे हिन्दू नहीं कहलाओगे। उसे लगा कि यह सब बाबा लोग जनता को मूढताओं से ग्रस्त कर रहे हैं। जब तक जनता मूढ़ मान्यताओं एवं अंधविश्वासों से ग्रसित रहेंगे तभी तक इन बाबाओं की बाबागिरी भी चलती रहेगी।

किसी बात को यदि वह झूठ भी हो तो हजारों लोग हजारों बार कहें तो वह सत्य मान लिया जाता है। धार्मिक किस्से कहानियों कथाओं के साथ भी ऐसा ही होता है।

इन कथाओं को कहने वाला भी यह जानता है कि इसमें कोई रस नहीं है। यह सभी झूठी हैं लेकिन फिर भी वह सुनाया जा रहा है, सुनाया जा रहा है। जिसके कारण जनता भी इस प्रकार के झूठ को सत्य मानने लगती है। यही कारण है कि संपूर्ण हिंदू समाज दिग्भ्रमित हो चुका है। हिंदू समाज में यही कारण है कि रोज नए-नए भगवान एवं एवं देवी देवताओं की बाढ़ आई हुई है।

सुधीर ने संकल्प लिया कि आगे से समाज में व्याप्त अंधविश्वासों एवं मूढ़ मान्यताओं से मुक्त होकर वैदिक धर्म की ओर लाने का वह प्रयास करेगा।

योगाचार्य धर्मचंद्र जी
नरई फूलपुर ( प्रयागराज )

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