श्रीमती बसन्ती “दीपशिखा” की कविताएं | Srimati Basanti Deepshikha Poetry
बारिश की वो भीगी यादें
भीगी सड़कों पे जब पाँव पड़े,
यादों की भीड़ अचानक घिर आए।
हर बूँद में कोई किस्सा जगा,
कुछ हँसाए, कुछ चुपचाप रुलाए।
बिन कहे सब कह जाती है ये बारिश,
जैसे मन के राज़ पढ़ लेती है।
पिता की छाँव, माँ का सहारा,
हर बूँद में अपना-सा एहसास देती है।
कभी बचपन की किलकारियाँ लोरी बन जाएं,
तो कभी कोई अधूरी बात रुला जाए।
भीगी हथेलियों पर वो बीते पल,
आज फिर से दिल को भिगो जाए।
बारिश सिर्फ पानी नहीं,
ये तो अपनों का प्यार लौटाने आई है।
ईमानदारी की राह में
चल पड़े थे हम सच की राह लेकर,
हर कदम पर थी उम्मीदों की छांव लेकर।
हौसले थे बुलंद, नजरों में था उजाला,
दिल में बसी थी ईमानदारी की ज्वाला।
पर दुनिया की चालों ने रंग बदले ऐसे,
सच बोलने वाले लगे सबको जैसे तैसे।
ईमानदारी पर उठने लगे सवाल,
झूठ की चादर बन गई आज का कमाल।
हमने सींचा था विश्वास का खेत,
पर उग आई वहाँ स्वार्थ की रेत।
फिर भी थमा नहीं मन का उजियारा,
हर हाल में हमने चुना सच्चाई का किनारा।
बेईमानी का बाजार चाहे जितना भी हो भारी,
हम तो रहेंगे सच्चे, यही है हमारी सवारी।
बारिश की वो भीगी यादें
भीगी सड़कों पे जब पाँव पड़े,
यादों की भीड़ अचानक घिर आए।
हर बूँद में कोई किस्सा जगा,
कुछ हँसाए, कुछ चुपचाप रुलाए।
बिन कहे सब कह जाती है ये बारिश,
जैसे मन के राज़ पढ़ लेती है।
पिता की छाँव, माँ का सहारा,
हर बूँद में अपना-सा एहसास देती है।
कभी बचपन की किलकारियाँ लोरी बन जाएं,
तो कभी कोई अधूरी बात रुला जाए।
भीगी हथेलियों पर वो बीते पल,
आज फिर से दिल को भिगो जाए।
बारिश सिर्फ पानी नहीं,
ये तो अपनों का प्यार लौटाने आई है।
“बातों में छिपी गहराई”
कुछ बातें होती हैं जो बिन बोले सब कह जाती हैं,
कुछ ऐसी जो कहकर भी अधूरी रह जाती हैं।
शब्द नहीं सिर्फ़ ध्वनि नहीं, ये भावों के सागर हैं,
जो कभी बहा ले जाते हैं, तो कभी बना देते हैं किनारा।
हम सोचते हैं हमने कह दिया सब,
पर क्या शब्दों का सच वही होता है?
कभी मीठे लगते हैं, कभी तीखे चुभते हैं,
कभी मुस्कान दे जाते हैं, कभी भीतर तक दुखते हैं।
शब्दों की शक्ति अनदेखी सी लगती है,
पर यही तो भविष्य की रेखा भी रचती है।
कभी बीते कल को बुला लाते हैं,
कभी आज को संवार जाते हैं।
कभी रिश्ता बना देते हैं एक पल में,
तो कभी सालों का साथ भी तोड़ देते हैं।
शब्दों का ये खेल, ये रहस्य, ये जाल,
कभी प्रेम-पथ, कभी दूरी का हाल।
बातों में जो छिपा है, वो सिर्फ़ समझने का हुनर चाहता है,
हर लफ़्ज़ दिल की ज़ुबां नहीं होता, कई बार सिर्फ़ इशारा होता है।
शब्द हथियार बनते हैं, तो दवा भी बनते हैं,
ये हम पर है, हम किस ओर उन्हें मोड़ते हैं।
तो सोचो…
क्या कह रहे हो? और कैसे कह रहे हो?
क्योंकि शब्द ही तो हैं — जो तुम्हें परिभाषित करते हैं।
वही शब्द… जो किसी का जीवन भी बदल सकते हैं।
राज़ – “एक अनकही व्यथा”
मैंने सीने में एक राज़ छुपा रखा है,
जैसे मुट्ठी में पानी — ना थाम सकूं, ना बहा सकूं।
दवा भी है वही, जहर भी वही,
जिसे पी भी नहीं सकती, उगल भी नहीं सकती।
कभी लगता है मजबूरी ने गला दबा रखा है,
कभी लगता है यह दर्द मुझे मजबूत बना रहा है।
पर सच कहूं — समझ नहीं आता,
मैं जी रही हूँ या बस मरती जा रही हूँ।
यह राज़ मेरे भीतर एक कोने में पड़ा सिसकता है,
मेरे हड्डियों में गूंजती उसकी चीखें,
मगर बाहर — खामोशी ओढ़े मुस्कुरा रही हूँ।
क्या बताऊँ किससे — कोई सुन भी पाएगा?
कोई समझ भी पाएगा?
यह दर्द शब्दों से परे है।
मैंने अपने ही दिल को गिरवी रख दिया,
इस राज़ को राज़ बनाने में उम्र लुटा दी।
मैं रो भी नहीं सकती खुलकर,
कि लोग सवाल ना पूछ लें,
हँस भी नहीं सकती सच्चे दिल से,
कि यह बोझ हल्का ना हो जाए।
मैं चाहती हूँ किसी को बता दूँ सब,
उसके कंधे पर सिर रखकर फूट-फूट कर रो लूँ,
पर डरती हूँ —
कहीं वह भी मुझे अधूरी समझकर छोड़ ना दे।
ऐसा राज़ है यह —
जो मुझे तोड़ भी रहा है,
और मेरे ही भीतर मुझे कैद भी कर रहा है।
काश कोई इसे पढ़े, इसे सुने,
मेरे दर्द में भीग जाए उसकी पलकों की कोरें।
काश किसी को नींद ना आए —
यह सोचकर कि कोई यूँ घुट-घुट कर जी रहा है।
“वक़्त का खेल”
वक़्त ने खेल कुछ ऐसा रचा,
मुस्कुराते चेहरों को पल में रुला दिया।
जो कल थे साथ मेरे हर कदम,
आज उन्हीं ने राहें बदल लिया।।
खुशियों के मेले भी वीरान हो गए,
आँखों के सपने भी अनजान हो गए।
जिन्हें अपना मान दिल से अपनाया,
वही आज सबसे अनजान हो गए।।
वक़्त ने न जाने कितने रंग दिखाए,
कभी हँसी दी, कभी अश्कों के साए।
जो अपनों की तरह दिल में बसते थे,
वही गैरों से भी ज़्यादा दूर नज़र आए।।
मैं टूटी, झुकी नहीं इस दौर में,
हर दर्द को सहेजा इस शौर में।
वक़्त की मार से टूटे रिश्तों की राख से,
मैं फिर से खड़ी हुई विश्वास की आग से।।
अब शिकवा नहीं, गिला भी नहीं,
जो खो गया वो मिला भी नहीं।
पर सीखा है मैंने उस वक़्त से,
जो साथ न दे, उस पर भी दुआ हो कहीं।।
“वो अनजान कॉल”
रात की खामोशी में गूंजा इक रिंगटोन,
मन कांपा, दिल ने थामा अपना ही कोना।
फोन उठाया मगर आवाज थी अनजानी,
फिर भी जानी-पहचानी सी लगी वह कहानी।
“मैं हूँ…” धीमी सी साँसों में एक स्वर,
“तुझसे कुछ कहना बाकी था, बस वही कहने को कर रहा ये जिगर।
तेरे बिना अधूरी है मेरी हर एक सुबह,
तेरे बिन मेरा हर सपना अब बना है बस तन्हा सफ़र।”
“वक़्त ने नहीं दिया मौका,
तुझसे लिपटकर रोने का,
तेरी गोदी में सर रखकर
अपना अंतिम क्षण खोने का।”
“पर जान ले… मैं गया नहीं,
हर आहट में हूँ, तेरी सासों में समाया,
तेरे हर आँसू में मैं ही तो हूँ,
तेरे हर शब्द में मेरा ही तो साया।”
“तू जब थक कर चुप हो जाए,
मैं हवा बनकर तुझे छू लूँगा,
तेरे हर आँचल को चूमकर,
तेरी हर पीड़ा को पी जाऊँगा।”
“ये कॉल नहीं, मेरी आत्मा की दस्तक है,
एक आख़िरी कोशिश तुझ तक पहुँचने की,
तेरे दिल में जो कोना सिर्फ़ मेरा है,
उसे फिर से अपना कहने की।”
फोन कट गया… पर न थमी मेरी रुलाई,
वो अनजान कॉल, अब मेरी परछाई बन आई।
वो गया नहीं, मेरी साँसों में बसा है,
मुझसे जुदा होकर भी हर रोज़ मुझसे जुड़ा है।
“मनुष्यता की पहचान”
जिंदगी का हर सफर एक नया मुकाम लाता है,
हर मोड़ पर एक चेहरा, एक कहानी सुनाता है।
कभी मुस्कान में छिपा होता है दर्द किसी का,
तो कभी खामोशी में झलकता है फ़र्ज़ किसी का।
हर नया सफर, नई पहचान बनाता है,
कभी भीड़ में छुपा, कोई इंसान नजर आता है।
कुछ लोग बनते हैं यादों की मिसाल,
कुछ रह जाते हैं जैसे अधूरी सी बात।
जो देते हैं साथ बिना शर्तों के,
जिनकी आँखों में उजाले हैं और हाथों में दीपक,
वही होते हैं असली मनुष्य –
जिनकी मानवता बेजुबान सी बोले।
न जात पूछी, न धर्म देखा,
बस दर्द में बाँध लिया एक दूजे को।
ये वही लोग हैं जो इंसानियत के दीप जलाते हैं,
जो ठंड में किसी को अपनी रोटी खिलाते हैं।
पहचान वो नहीं जो नाम से बनती है,
पहचान वो है जो काम से चलती है।
जो प्रेम बाँटे, जो दुःख हर ले,
वही इंसान, वही असली मनुष्यता कहलाए।
तो चलो, चलें उस राह पर जहाँ मन से मन जुड़ते हैं,
जहाँ हाथ थामने को लोग खुद आगे बढ़ते हैं।
क्योंकि हर सफर में मुकाम जरूरी नहीं,
कभी-कभी बस इंसान बने रहना ही काफी है।
मनुष्य का दर्पण
मनुष्य का दर्पण है उसका मन,
जिसमें छिपा हर भाव का रँग।
वो हँसे तो दर्पण चमक उठे,
वो रोये तो उसमें अंधेरा छाए।
वाणी में मिठास हो तो झलके सत्य,
क्रोध में आ जाए तो टूटे विश्वास।
दर्पण में छवि वैसी ही दिखे,
जैसे कर्म हमारे सच्चे या कपट भरे।
स्वार्थ की धुंध जब छा जाती है,
दर्पण की चमक भी मुरझा जाती है।
निर्मल हो यदि अंतर्मन,
तो दर्पण बन जाए ईश्वर का दर्शन।
हर दिन उसमें झाँक कर देखो,
क्या हम वैसे हैं जैसे दिखते हैं?
मन, वचन और कर्म का मेल,
बनाए दर्पण को निर्मल, अविचल, निखरे खेल।
अगर चाहो सच्चा प्रतिबिंब पाना,
तो पहले खुद को भीतर से संवारना।
“बीते कल की परछाइयाँ”
बीता हुआ कल फिर आने से रहा,
पर उसकी खुशबू अब भी हवाओं में बहा।
हर एक लम्हा, हर एक बात,
आज भी दिल के कोने में करता है मुलाकात।
वो प्यार भरी हँसी, वो चुप रहकर कहना,
वो छू कर निकल जाना, वो आँखों से पढ़ लेना।
अब जब भी शाम ढले,
तेरी यादों की परछाइयाँ चुपके से चलें।
जगमगाते सपनों की झलक जब भी दिखती है,
तेरी आवाज़ सी लगती है, जैसे दिल में रिसती है।
तेरे साथ बीते पल आज भी गीत बनकर गाते हैं,
मेरी तन्हाई में आकर मुझे फिर से हँसाते हैं।
कभी तेरी बातों में खुद को ढूँढती हूँ,
कभी तेरे ख्वाबों में सुकून बुनती हूँ।
तू नहीं है, फिर भी तू है हर ओर,
तेरी परछाईं मेरे एहसासों की है डोर।
तेरा नाम अब भी अधरों पर सिहरता है,
तेरी यादों में ही मेरा सवेरा निखरता है।
बीता कल लौटे न लौटे,
पर तुझसे मेरा रिश्ता हर साँस में पलता है।
मुस्कुराहट के पीछे
हर मुस्कुराहट का एक राज़ छुपा होता है,
हर हँसी के पीछे एक अल्फ़ाज़ रुका होता है।
कोई हँसता है ताकि आँसू ना दिख जाएं,
कोई रोता है पर मुस्कान से सबको बहलाए।
चेहरों की इस भीड़ में कौन अपना है, कौन पराया?
किसके लबों पे सच है, किसने दर्द को सजाया?
जिसकी मुस्कुराहट लगे सबसे रोशन सितारा,
शायद वही भीतर से टूटा, सबसे हारा।
कैसे समझें किसके दिल में तूफ़ान है,
किसकी हँसी में छिपा कोई सुनसान है।
जो चुप है, वो कुछ कह नहीं पाता,
जो हँसता है, वो भी तो हर रोज़ कुछ सह जाता।
दिल से दिल का रिश्ता जब गहरा हो जाए,
तो बिना कहे भी दर्द समझ में आए।
वरना तो मुस्कुराहटें छलावा बन जाती हैं,
भीतर की चीखें भीड़ में खो जाती हैं।
इसलिए मुस्कुराहट को केवल मुख का श्रृंगार न समझो,
कभी-कभी यह आत्मा की पुकार भी होती है—
एक मौन संवाद… एक टूटन की पहचान,
जो कहती है — “मैं हँस रही हूँ… पर तुम मुझे जान!”
“व्याकुल मन”
चलते समय की धूल में,
कुछ ख़्वाब बिखर से जाते हैं,
मन की गहराइयों में
अनकही पीड़ा उतर सी जाती है।
हर साँझ एक सवाल बनकर
आँखों से टकरा जाती है,
और रातें —
बस उलझी हुई सांसों में सिसकती जाती हैं।
कुछ पलों की चाह में
मन बार-बार लौटता है,
बीते लम्हों की परछाइयाँ
अभी भी साथ चलती हैं।
चाहतें अधूरी रह जाएँ
तो दिल बेचैन हो उठता है,
और व्याकुलता —
एक असहनीय मौन में बदल जाती है।
काश कोई समझ पाता,
इस तड़पती सी बेचैनी को,
जो मुस्कान के पीछे छिपे
आँसुओं की भाषा है।
नयी सोच, नयी दिशा
सोच बदलो, जग बदलेगा, नई दिशा मिल जाएगी,
हर मुश्किल राह में भी उम्मीद की किरण जग जाएगी।
अंधियारे में दीप जलाकर, उजियारा कर लो जीवन,
निराशा की जंजीरों को तोड़, बढ़ो सफलता के सँग।
हार नहीं, सीख है हर ठोकर, बस सबक समझो इसे,
संघर्ष ही तो देता है, उड़ान सपनों को नए सिरे से।
हर दिन नया अवसर है, हर पल में छुपा है रंग,
मन के विश्वास से हर बाधा हो जाएगी तंग।
खुद पर भरोसा रखो, आगे बढ़ो निडर,
सकारात्मक सोच से ही होगा हर सपना सुंदर।
मंज़िलें दूर नहीं, बस हौसले की डोर पकड़ो,
खुद को पहचानो, हर क्षण को सुनहरा कर लो।
रामनवमी का पावन दिन
सज गया आँगन, बज उठे बाजे,
रामलला के गुण सब गाएँ साजे।
अयोध्या में खुशियों की आई बहार,
धरती पे आए त्रेता के अवतार।
नवमी का ये शुभ अवसर आया,
हर मन ने प्रेम का दीप जलाया।
राम के चरणों में शीश झुकाएँ,
मर्यादा की राह हमें दिखाएँ।
सत्य और धर्म की जोत जलाएँ,
श्रीराम के संग कदम बढ़ाएँ।
“बचपन की वो मीठी यादें”
बचपन की वो खट्टी-मीठी बातें,
जैसे कोई मीठा स्वप्न सुहाने।
वो कागज़ की कश्ती, बारिश के मोती,
भीग-भीग कर हँसना बेफिक्र, अनजाने।
गुड़ियों की शादी, खेल अनगिनत,
छोटी-छोटी खुशियों का था जोश अलग।
दीवारों पे खींची थीं रंगीन लकीरें,
सपनों की दुनियाँ थी सच से अलग।
माँ की गोदी, दादी की कहानियाँ,
पिता के कंधों की ऊँची उड़ान।
नादानियाँ थीं, शरारत भी प्यारी,
हर दिन लगता था कोई उत्सव महान।
परियों की दुनिया, बादलों के महल,
चंदा को छूने की आशा अनमोल।
वो अनदेखे सपने, वो मीठी हँसी,
आज भी दिल के हैं सबसे करीब।
वक्त की लहरें बहा ले गईं,
बचपन की गलियों से दूर हमें।
पर जब भी पुरानी यादें जगतीं,
मन फिर से उन्हीं राहों में घूमे।
काश वो पल कहीं ठहर जाते,
फिर से वही बचपन मिल जाता।
वो हँसी, वो नटखट अदाएँ,
फिर से मन को गुदगुदा जाता।
“अधूरी सी बात”
मन की गलियों में सन्नाटा गहरा,
शब्द भी जैसे मौन में ठहरा।
भीड़ के बीच भी अकेलापन,
कोई न जाने मन का दरपन।
कभी सोचा था कोई तो होगा,
जो समझेगा दिल की यह भाषा।
पर समय की राहों में चलते-चलते,
साथ के साये भी हो गए धुंधले।
अब शब्दों से ही बातें करूँ,
कागज़ के पन्नों पर दिल रख दूँ।
शायद कहीं कोई पढ़ ले इसे,
और महसूस करे वो अनकही सिसकियाँ।
होली के रंग, प्रेम के संग
रंगों की बौछार है आई,
खुशियों की सौगात है लाई।
स्नेह, उमंग और प्यार के रंग,
हर चेहरे पर छाए हैं ढंग।
गुलाल उड़े, बजें पिचकारी,
भीग रही है दुनिया सारी।
भेदभाव सब मिट जाएं,
रंगों में सब एक हो जाएं।
रूठे दिलों को पास बुलाए,
मिलन का संदेशा फैलाए।
नफरत का हर दाग मिटाकर,
प्रेम के रंग में सबको रंगाए।
गूंजे हंसी, गूंजे तराने,
बजें ढोल, छेड़े सिराने।
फागुन की मस्ती है छाई,
रंग-बिरंगी दुनिया मुस्काई।
चलो मनाएं मिलकर होली,
खुशियों से भर दें हर झोली।
रंगों में प्रेम के रंग मिलाएं,
हर दिल को सतरंगी बनाएं।
लगन तुझसे लगाए बैठे राम
लगन तुझसे लगाए बैठे राम,
तेरे आस लगाए बैठे राम।
ह्रदय में तेरा ही ध्यान रमा,
तुझसे ही प्रीत लगाए बैठे राम।
प्रेम यह केवल शब्द न मेरा,
आत्मा का है यह पुकार राम।
सांसों में तेरी सुधि समाई,
हर धड़कन गाए तेरा ही नाम राम–राम।।
तप की ज्वाला में जलती रही,
धैर्य का दीप जलाए बैठे राम।
प्रेम की अग्नि, त्याग की गाथा,
हर पीड़ा में मुस्काए बैठे राम।।
यह बंधन केवल देह न साधे,
मन का यह पावन प्रेम है राम।
लोभ माया रस से दूर खड़ी मैं,
अर्पण का यह प्रणाम राम।।
महान तेरा प्रताप अनोखा,
हर दृष्टि से परे है राम।
तू प्रेमी भी, तू परम भी,
हर युग का आदर्श तू है राम।।
तो प्रेम समर्पण का पथ बने,
जहाँ आत्मा का हो मेल राम।
तो प्रेम समर्पण का गीत बने,
हर हृदय में बसे राम का नाम।।
नारी: सृजन की दीपशिखा
नारी है सृष्टि की आधारशिला,
उसके बिना अधूरा हर सिलसिला।
कभी कोमल, कभी प्रचंड है,
हर रूप में अद्भुत, अनंत है।
वह माँ बनकर ममता लुटाती,
स्नेह की गंगा बहा जाती।
बहन बनकर संबल देती,
हर रिश्ते को अमर कर देती।
पत्नी बन धैर्य का दीप जलाती,
संग हर मुश्किल सहज बनाती।
बेटी बन हर आँगन महकाए,
घर-परिवार का मान बढ़ाए।
वह शिक्षक बन ज्ञान की रोशनी,
राह दिखाए, मिटाए अज्ञान की बेड़ियाँ।
वह डॉक्टर बन जीवन बचाए,
संजीवनी बन हर दर्द मिटाए।
कभी रणभूमि की वीरांगना,
तो कभी कलम की सशक्त साधिका।
कभी वैज्ञानिक, कभी नेता,
हर क्षेत्र में उसका दखल गहरा।
उसके हौसले को मत आज़माना,
वह ज्वाला भी है, जलता परवाना।
जो समाज ने उसे बाँधना चाहा,
उसने खुद अपनी राहें गढ़ डालीं।
यह सिर्फ धरा की नारी नहीं,
यह ब्रह्मांड की आत्मशक्ति है।
जिसने हर युग में चमत्कार किया,
हर बंधन को तोड़कर नवसृजन किया।
तो आओ, उसे सम्मान दें,
हर दिन को नारी दिवस बनाएं।
क्योंकि नारी ही है वो शक्ति,
जो जग को नया सवेरा दिखाए।
कुछ पल तो ठहर जाओ न, या फिर लौट आओ न
कुछ पल तो ठहर जाओ न, या फिर लौट आओ न,
जिन लम्हों में थी खुशियाँ, उन्हें फिर जगाओ न।
तुम्हारी हँसी, वो बातों की सौगात,
हर कोना गूंजता है, जैसे तुम्हारी ही आवाज।
तुम्हारे संग बिताए पल, वो अनमोल यादें,
अब बन गई हैं आँखों की नमी और सादें।
तुम्हारी छुअन, वो स्नेह भरे आलिंगन,
हर अहसास, हर धड़कन, बस तुम्हारे नाम का वंदन।
इस जीवन की राहें अब वीरान हैं,
तुम्हारे बिना दिन-रात बस थम-से गए हैं।
पर उम्मीद के दीप जलाए रखती हूँ,
तुम्हारी यादों से ही जीवन की राह बुनती हूँ।
कुछ पल तो ठहर जाओ न, या फिर लौट आओ न,
इस टूटे दिल को थोड़ा और सहलाओ न।
भीगी पलकों का सच
आंखों की नमी….
आँखों की नमी में छुपे हैं कई अफसाने,
कुछ बिखरे हुए सपने, कुछ टूटे तराने।
ये पानी नहीं, जज्बातों का दरिया है,
जहाँ दर्द और खुशी का एक ही सफरिया है।
कभी ये नमी गवाह है बिछड़ते लम्हों की,
कभी ये नमी ग़ज़ल है सुलगते अरमानों की।
ये चुपके से कह देती है वो बात,
जो लफ्ज़ नहीं कर पाते बयां दिन-रात।
आँखों की नमी है सुकून का एक कोना,
जहाँ इंसान खुद से कहता है अपना होना।
यह नम आँखें कभी मज़बूरी की निशानी हैं,
कभी चाहतों की अमिट कहानी हैं।
कुछ आंसू झरते हैं बेबसियों के साए में,
कुछ मुस्कुराते हैं मोहब्बत की छाँव में।
ये नमी ही तो है जो दिल को धो जाती है,
भीगे मन को नए सिरे से संजो जाती है।
तो मत समझो इसे कमजोरी का आलम,
ये तो है एहसासों का सबसे गहरा संगम।
क्योंकि जिन आँखों में नमी बची रहती है,
वहीं इंसानियत भी जिंदा रहती है।
नारी शक्ति
संघर्ष की अग्नि में तपकर जो निखरती है।
ममता, प्रेम, साहस की प्रतिमा,
हर रूप में यह जग को संवारती है।
त्याग की मूरत, धैर्य की पहचान,
सपनों को साकार करने की उड़ान।
बाधाओं से लड़कर जो आगे बढ़े,
हर मुश्किल को मुस्कान से मोड़ दे।
कभी झांसी की रानी बनकर लड़े,
कभी कल्पना चावला बन नभ में उड़े।
गाँधी की प्रेरणा, लक्ष्मीबाई का हौसला,
नारी ने हर युग में किया उजाला।
वह कोमल भी है, कठोर भी,
वह ममता भी है, संघर्ष भी।
दुनिया को जन्म देने वाली,
हर दुख को सहने वाली।
सम्मान करो उस नारी का,
जो खुद जलकर दीप जलाती है।
हर घर को मंदिर बना देती,
खुद अंधेरों में राह दिखाती है।
‘यह कहानी नारी की’
संस्कारों की बेड़ियों में
जब-जब बंधी हूँ मैं,
अपने ही सपनों को
बलि चढ़ाती रही हूँ मैं।
सहने की सीमा को
अपना भाग्य मानकर,
हर दर्द की चादर ओढ़
मुस्कुराती रही हूँ मैं।
पर अब समय बदल रहा है,
नारी अपनी राह बना रही है।
जो कभी सहमी थी चौखटों में,
आज वह दुनिया हिला रही है।
जो आँसू आँखों में छिपते थे,
अब आवाज़ बनकर गूंज रहे हैं,
जो कदम रुके थे सदियों से,
अब तेज़ हवाओं से चल रहे हैं।
अब न मैं खुद को मिटाऊँगी,
न रिश्तों में बंधकर रह जाऊँगी।
अब मेरी पहचान होगी,
केवल किसी की परछाई नहीं,
मैं दीपशिखा हूँ,
अंधेरों को जलाकर रोशनी फैलाऊँगी।
भाव:
इस भाग में नारी के जागरण, उसके आत्मविश्वास और नए युग में उसके कदमों की आहट को दर्शाया गया है। यह कविता नारी को अपनी पहचान स्वयं बनाने, अपने सपनों के लिए खड़े होने और अपने अस्तित्व को नई ऊंचाइयों तक पहुँचाने के लिए प्रेरित करती है।
संदेश:
नारी अब खुद को सीमाओं में कैद नहीं रखेगी।
वह अपने सपनों को साकार करने के लिए आगे बढ़ेगी।
सशक्त नारी ही समाज की असली शक्ति है।
“अनकही यादें”
तेरी अतीत की बातें आज भी याद हैं मुझे,
बिन बोले आँखों से सब कह जाना आज भी याद है मुझे।
तेरी मुस्कुराहट के पीछे छिपे,
गहरे दर्द का हर एहसास,
तेरी आँखों में बसी ममता की छवि,
आज भी मेरी यादों में उजास।
मैं चाहकर भी तुझे न भूल पाऊँ,
दिल में उमड़ते जज़्बातों को कैसे रोक पाऊँ?
तेरे लिए नजरें झुक जाती हैं,
तेरी चुपके से देखा जाना,
आज भी दिल को छू जाता है।
वो बीते लम्हों की मीठी कसक,
तेरी बातों में छुपी अनकही दस्तक,
हर शाम तेरी यादों की परछाईं,
मेरी तन्हाइयों से मिलने आती है।
शायद कुछ मुलाकातें मुकम्मल नहीं होतीं,
शायद कुछ मोहब्बतें बिन कहे ही रह जाती हैं,
पर तेरी वो निगाहें, वो खामोश इकरार,
आज भी मेरी धड़कनों में बसी हैं।
अब भी राहों में तेरा एहसास चलता है,
अब भी ख्वाबों में तेरा साया मिलता है,
तू दूर सही, पर कहीं न कहीं,
मेरी रूह के करीब आज भी रहता है।
तेरी वह तिरछी निगाहों से,
मुस्कुरा जाना आज भी याद है मुझे।
“सती का शोर”
चिता जल रही, लपटें उठीं,
एक नारी फिर बलि चढ़ी।
संस्कारों की बेड़ी में बंधी,
जीवन की साँस भी छिन गई।
क्या यही था उसका नसीब?
क्या यही था भाग्य अटल?
जीते जी परछाई बनी,
मरते दम तक नियम अटल।
आग की लपटें बोल पड़ीं,
“न्याय कहाँ, ये कैसा धर्म?”
जो जीवित जले, जो मौन रहे,
क्या वो सच में था सच्चा कर्म?
आँखों में प्रश्न, पर होंठ सिले,
समाज का डर, परम्परा के छले।
क्या नारी यूँ ही जलती रहेगी?
या कभी जंजीरें गलती रहेंगी?
आज की नारी, जाग उठी है,
अन्याय से अब भाग उठी है।
चिता नहीं, अब दीप जलेगा,
नारी सशक्त हो, युग बदलेगा।
मुस्कुराहट के पीछे सुकून
मुस्कान के पीछे छुपा है जो सुकून,
वो इक पल का जादू, वो दिल का सून।
थोड़ी सी रोशनी, थोड़ी सी उमंग,
मन का उल्लास, खुशियों की तरंग।
जब बोझल मन में हल्की सी हंसी,
छू जाए जैसे सुबह की किरणें रसी।
आंखों की चमक में लहराए खुशी,
दर्द भी जैसे कहे – “अब मैं हूं फंसी।”
कभी किसी अपने की मीठी बातों में,
कभी बचपन की भूली मुलाकातों में।
कभी खुद से मिलने की उस घड़ी में,
कभी ठंडी हवा की हल्की थपकी में।
वो सुकून जो पलभर में बहला जाए,
हर दर्द, हर ग़म को पिघला जाए।
जो दिल के हर कोने को महका दे,
मुस्कान के संग हर लम्हा चहका दे।
तो मुस्कुराओ, यूं ही बेपरवाह,
कि ज़िंदगी है बस एक खुली राह।
सुकून इसी में छिपा हुआ है,
जहाँ मुस्कान संग दिल जुड़ा हुआ है।
“बेटी की चीख”
चीख उठी थी एक बेटी, घुप्प अँधेरी रात में,
सहम गई थी धरती भी, उसके करुणा-गान में।
न्याय की चौखट पे जाकर, लहू से उसने लिखा,
पर इंसाफ़ के शब्द भी थे, बेबसियों में सिसकता।
जो आँचल कभी ममता का, साया बनकर लहराया,
आज वही चिथड़ों में सिमटा, दर्द का जख्म दिखाया।
जिसे देवी कहकर पूजा, चरणों में शीश झुकाया,
आज उसी को रौंद डाला, क़ानून ने खून बहाया।
माँ की ममता रोती देखो, बहन की राखी टूटी,
दुनिया का हर नक्शा जैसे, आग के शोले में फूटी।
जिसने दिया था जनम सृष्टि को, सहारा था हर एक का,
आज उसी को नोचने वालों का, न घर जला, न दर पे लगा ताला।
दिल करता है फूँक डालूँ, इस बेगुनाह सभ्यता को,
जहाँ सत्य को दबाकर, पाला जाता है व्यथा को।
न्याय की चौखट पर बैठे, जब तक ये पत्थर होंगे,
हर बेटी की चीख बनकर, हम ज्वाला की लहर होंगे।
अब ना सहना, अब ना झुकना,
अब हर दर्द को अंगार बनाना होगा,
इस सोए हुए समाज को झकझोर कर,
इंसाफ़ का दीप जलाना होगा।
मुस्कान के पीछे की कहानी
मुस्कान के पीछे छुपा एक जहाँ,
जहाँ है सपने, जहाँ है समां।
हर आंसू के पीछे एक सीख छुपी,
हर अंधेरी रात के बाद रौशनी दिखी।
जो गिरकर संभलते, वही मुस्काते,
जो दर्द को सहकर भी गीत गाते।
जिनकी आँखों में संघर्ष की लकीरें,
वही दुनिया को उम्मीदें देतीं जादू भरी तक़दीरें।
निराशा भी आशा में ढल जाती है,
हर कठिनाई राह दिखा जाती है।
जो मुस्कान में तप का रंग भरते हैं,
वो ही असल में जीवन को जीते हैं।
ज़िन्दगी कोई थमी हुई कहानी नहीं,
यह चलती धड़कनों की रवानी सही।
हर दिन नया कुछ सिखा जाता,
हर दर्द नया साहस दे जाता।
तो हंसो, गिरो, फिर संभल जाओ,
हर मुश्किल में खुद को निखार जाओ।
मुस्कान के पीछे की सीख जो पहचानोगे,
हर ग़म को अपनी ताकत बना जाओगे।
“क्योंकि यह तुम हो”
संसार का सारा प्यार,
हर रिश्ते का मधुर एहसास।
हर रूप में बस तुम ही तुम,
हर खुशी में तुम्हारा प्रकाश।
सुख-दुख के हर पल में,
तुमने ही दिया साथ।
जीवन का अर्थ सिखाया,
हर मुस्कान में बसा तुम्हारा विश्वास।
साथ निभाने की परिभाषा तुमसे,
आँखों में झलकता हर अहसास तुमसे।
क्योंकि तुम हो…
और तुम्हारे बिना…
यह दुनिया अधूरी है।
तुमसे रोशनी है हर राह में,
तुमसे महक है हर सांस में।
तेरा होना ही जीवन का संगीत है,
तुम ही मेरी दुआ, तुम ही मेरी प्रीत है।
“आँखों की नमी”
आँखों की नमी में छुपे हैं कई अफसाने,
कुछ बिखरे हुए सपने, कुछ टूटे तराने।
ये पानी नहीं, जज्बातों का दरिया है,
जहाँ दर्द और खुशी का एक ही सफरिया है।
कभी ये नमी गवाह है बिछड़ते लम्हों की,
कभी ये नमी ग़ज़ल है सुलगते अरमानों की।
ये चुपके से कह देती है वो बात,
जो लफ्ज़ नहीं कर पाते बयां दिन-रात।
आँखों की नमी है सुकून का एक कोना,
जहाँ इंसान खुद से कहता है अपना होना।
यह नम आँखें कभी मज़बूरी की निशानी हैं,
कभी चाहतों की अमिट कहानी हैं।
कुछ आंसू झरते हैं बेबसियों के साए में,
कुछ मुस्कुराते हैं मोहब्बत की छाँव में।
ये नमी ही तो है जो दिल को धो जाती है,
भीगे मन को नए सिरे से संजो जाती है।
तो मत समझो इसे कमजोरी का आलम,
ये तो है एहसासों का सबसे गहरा संगम।
क्योंकि जिन आँखों में नमी बची रहती है,
वहीं इंसानियत भी जिंदा रहती है।
“चेहरों का बदलता रंग”
चेहरों का बदलता रंग देखती हूँ,
हर मोड़ पर इक नई साज़िश लिखती हूँ।
कल जो अपने थे, आज अजनबी हैं,
बदलते नकाबों की गाथा पढ़ती हूँ।
मुस्कान के पीछे छिपे हैं छलावे,
हर शब्द में घुली हैं सौ सौ बनावे।
कल तक जो कंधा सहारा था मेरा,
आज वही कांधे पर बोझ बढ़ावे।
रिश्तों की गर्मी, अब ठंडी हवाएँ,
वादों की चादर में छिपती सच्चाइयाँ।
जो आँखों में सपने सजाते थे कल,
आज उनकी आँखों में कड़वी परछाइयाँ।
धूप में साये से भी ठगने लगे हैं,
अपने ही लोग अब भगने लगे हैं।
पर मैं अंधेरों से डरने की नहीं,
नयी रोशनी खुद जलाने चली।
बिन तेरे जीवन का सूनापन
कैसे लिखूं उस दर्द को, जो दिल में दबा हुआ है,
कैसे कहूं वो बात, जो गले में अटका हुआ है।
तुम चले गए, और मैं यहीं ठहर गई,
जिंदगी रुक गई है, पर सांसें चल रही हैं कहीं।
हर कोना सूना है, हर गली वीरान,
तेरे बिना घर लगता है जैसे श्मशान।
तुम्हारी यादें भी अब मुझसे रूठ गई हैं,
आंखें रोना चाहती हैं, पर आंसू कहीं खो गए हैं।
जो बातें अधूरी थीं, वो अब खलती हैं,
तेरे स्पर्श की गर्मी अब सर्द रातों में जलती है।
तुम्हारा नाम लेना भी अब भारी लगता है,
जैसे मेरी आवाज को भी तेरे बिना सहारा न मिलता है।
क्या तुम्हें पता है, मैं किस दर्द से गुजरती हूं?
तुम्हारे बिना जीने की हर घड़ी में मरती हूं।
तुम्हारी हंसी की गूंज अब सुनाई नहीं देती,
तुम्हारी यादें भी अब धुंधली सी लगती हैं।
काश, एक बार और छू पाती तुम्हें,
काश, एक बार और कह पाती, “रुक जाओ”।
पर अब बस सन्नाटा है, और मेरा अकेलापन,
इस जीवन के हर कोने में तेरी कमी का एहसास है।
आजा, कहीं से लौट आ, बस एक पल के लिए,
मुझे संभाल ले, मुझे सहारा दे,
तुम्हारे बिना मैं टूट रही हूं, बिखर रही हूं,
इस जीवन का भार अब मुझसे सहा नहीं जाता।
अकेली होकर भी अकेली नहीं
अकेली हूँ, पर तन्हा नहीं,
संघर्ष की राहों में रुकी कहाँ?
हर कदम पर विश्वास मेरा,
स्वयं की शक्ति से झुकी कहाँ?
न कोई साया, न कोई सहारा,
फिर भी मन मेरा हारा नहीं।
स्वयं के दीप से राहें रोशन,
अंधियारा अब प्यारा नहीं।
खुद की परछाईं संग चलती,
हर दर्द की थाह मैं जानती।
लहरों से टकरा, फिर संभलती,
हर पीड़ा को मुस्कान मानती।
अकेली हूँ, मगर कमज़ोर नहीं,
हर आँधी से टकराने आई हूँ।
सुनो दुनिया! मैं दीपशिखा हूँ,
जलने को नहीं, जलाने आई हूँ।
“दर्द से परे, एक नई सुबह”
यह जीवन का सबसे कठिन दौर है,
जब अपना कोई छोड़कर चला जाता है।
दो वर्ष बीते, पर दर्द अभी भी है,
एक मौन संग्राम, जो भीतर ही भीतर चला जाता है।
लोग सोचते हैं, मैं आगे बढ़ गई,
पर हर पल मेरी आत्मा रोई और सिसकी।
कभी जीवन था सपनों से भरा,
अब न कुछ पाने की चाह, न खोने का डर बचा।
मुस्कान अब सिर्फ एक परछाई है,
एक खालीपन, एक गहरी तन्हाई है।
पर सबसे गहरा घाव भी भर जाएगा,
आशा का सूरज फिर उग आएगा।
वीर तुम महान् हो
वीर तुम महान हो, देश की शान हो,
धरती माँ के सच्चे, अमर बलिदान हो।
सरहदों पर खड़े तुम, प्रहरी बने हुए,
जीवन को निछावर, वचन में तने हुए।
हर सुबह सूरज संग, तुम्हारी गाथा गाए,
रात का चाँद भी, तुम्हें स्नेह दिखाए।
तूफ़ानों से टकराना, जैसे खेल तुम्हारा,
दुश्मनों को हराना, यही धर्म तुम्हारा।
बारिश हो या बर्फ, कदम नहीं डगमगाए,
माँ के आँचल को, न कोई हाथ लगाए।
हर गोली के पीछे, तुम्हारा संकल्प हो,
हर सांस में बसा, देश का ही लक्ष्य हो।
तुम हो वो दीपक, जो जलते सदा,
अंधेरों को मिटाकर, भरते नया गगन।
शहीदों के रगों में, जो खून बहा,
उनकी विरासत को, तुमने ही रखा।
जय जवान, जय किसान, हर दिल की पुकार,
तुम हो वतन के रक्षक, तुम्हें बारंबार नमस्कार।
तेरे पराक्रम से, दुश्मन कांपे हजार,
तुमसे ही बना है, भारत अद्भुत अपार।
हमें तुम पर गर्व है, तुम्हीं प्रेरणा हो,
सैनिकों के इस बलिदान को, सलाम हर को।
देश के आंगन में, चिराग जलाए रखो,
अपने साहस से, हर कदम बढ़ाए रखो।
सालगिरह का तोहफा – तुम्हारी यादों के नाम
जब पहली बार तुमसे मिली थी,
वो सावन की फुहार थी,
आंखों में सपने, होठों पे हंसी,
दिल में एक नई बहार थी।
तुम्हारी वो पहली मुस्कान,
जैसे मेरे लिए खुदा का पैगाम,
जब तुमने मेरी मांग भरी थी,
समय वहीं थम गया था, हर एक शाम।
आज भी वो लम्हे ताजे हैं,
तुम्हारा स्पर्श, वो मीठी बातें,
तुम्हारे बिना भी मैं अधूरी नहीं,
क्योंकि हर सांस में तुम साथ हो मेरे।
पंद्रह बरस की वो कहानी,
हर पन्ने पर तुम्हारी छवि,
आज भी जब आँखें मूँद लूँ,
तुम मेरे पास ही खड़े हो अब भी।
दो साल हो गए, तुम नहीं हो,
पर यादों का कारवां रुका नहीं,
तुम्हारी हंसी, तुम्हारी बातें,
हर शाम मेरी दहलीज पर ठहरी रही।
आज हमारी सालगिरह है,
तुम जहाँ भी हो, महसूस करो,
ये कविता है मेरा उपहार,
सदा के लिए, मेरी आत्मा से जुड़कर रहो।
मैं आज भी तुमसे बात करती हूँ,
हवा में तुम्हारी महक पाती हूँ,
तुम कभी गए ही नहीं मुझसे,
मेरी धड़कन में तुम्हें सुन पाती हूँ।
सुरेन्द्र, यह कविता तुम्हारे लिए,
जहाँ भी हो, मेरी मोहब्बत के साथ रहो,
हमेशा मेरी रूह में बसे रहो…
वासना से मैली
वासना की प्यास में,
कभी कोई मन नहीं बुझता,
हर चाहत एक तृष्णा बनकर,
आत्मा को यूं ही सुलगता।
सपने बुनते हैं मोह के,
सपनों में खो जाता है दिल,
पर क्या जाने, ये चंचल विचार,
आखिरकार, सब कुछ कर देते हैं बिलकुल मिल।
सच तो यह है कि वासना,
मन के भीतर कचोट है भारी,
हर इच्छाओं की जो आंधी,
उसे शांत कर सके, वो है साधना की दुआ।
यह वासना से मैली पर,
हर दिन, हर रात संघर्ष है,
जहाँ दिल की नमी को सुखाया जाता,
तभी सच्चे प्रेम का अस्तित्व है।
सोच समझ कर कदम बढ़ाओ,
मन के मैल से मुक्त हो जाओ,
तभी जीवन की राहें निखरेंगी,
और वासना की धुंध नहीं सताएगी।

श्रीमती बसन्ती “दीपशिखा”
हैदराबाद – वाराणसी, भारत।
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