मैंने उसी दिन सोच लिया था

मैंने उसी दिन सोच लिया था

एक छोटे से कस्बें में, कस्बें से दूर एक धार्मिक परिवार रहता था, परिवार में सिर्फ चार लोग थे,माँ, पत्नी, बेटी और ख़ुद,एक छोटी सी कच्ची झोपड़ी में रहते थे, चारों ओर जंगल ही जंगल था।

माता जी भगवान शंकर की पूजा किया करती थी,पास में ही एक कुआं और एक शिवलिंग स्थापित किया हुआ था.
सुबह ४ बजे उठकर पूजा किया करती थी,वैसे तो सभी लोग पूजा करते थे, माता जी ज़्यादा ही धार्मिक थी.बेटा ५-६ किलोमीटर दूर नौकरी करने जाया करता था, सुबह जाना और शाम को वापसी आना यही दिनचर्या थी।

समय गुजरता रहा, ज़िम्मेदारियाँ बढ़ती गई,माँ की उम्र हो रही थी, माँ की दवाइयों का खर्चा और बिटिया भी बड़ी हो रही थी।

बिटिया पढ़ाई में बहुत होशियार थी, बिटिया ने गाँव में ट्यूशन पढ़ाने शुरू कर दिए, बिटिया जब १२ कक्षा में थी उसके पास करीब २५-३० बच्चे ट्यूशन पढ़ते थे.कस्बे के एक स्कूल के मालिक ने बिटिया की मेहनत को देखते हुए अपने स्कूल में रख लिया.बाप को भी सहारा हो गया।

एक दिन जब बेटा शाम को वापसी घर की और आ रहा था, रास्ते में एक छोटी सी अटैची दिखाई पड़ी.मन में बड़ी शंका उठाऊँ या ना उठाऊँ….
उसनें नहीं उठाईं,ग़ज़ब की बात जब सुबह को जाए तब दिखाई ना दें,वापस आये तो
रास्ते में उस स्थान पर ना होकर घर की और दिखाई पड़े।

कई दिनों तक सोचता रहा, एक दिन जब वापस आ रहा था वो अटैची झौपड़ी से कुछ दूरी पर ही पड़ी थीं.
मन में बड़ी शंका, जब नौकरी पर जाऊँ तो दिखाई ना दें, जब वापस आऊँ दिखाई पड़े और आज तो बिलकुल मेरी झौपड़ी के पास हीं हैं.और एक बात औरो को भी तो दिखाई दी होगी ….

आज यह सोच कर ये सारी बात अपनी पत्नी को बता ही दी, पत्नी भी सोच में पड़ गई, दोनों बहुत सोच समझ कर चल दिए बिना बतायें अपनी माँ और बेटी को, जाते हुए दोनों ने शिवलिंग के दर्शन किए।
उस स्थान पर पहुँच कर उस अटैची को उठाया, बहुत ही भारी पता नहीं क्या होगा, जैसे तैसे घर ले आए रात भी बहुत हो चुकी थी।

घर ले जाते हुए रास्ते में कोई भी नहीं मिला था,सभी के सामने उस अटैची को खोला गया, सबसे ऊपर भगवान शंकर का बहुत सुंदर फोटो, जैसे ही भगवान शंकर के फोटो को उठाया पूरी अटैची सोने से भरी थी.सभी की आंखे खुली की खुली रह हैं किसी को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था।

सोच में पढ़ गए अचानक ये क्या, ख़ुशी का ठिकाना ना रहा, चिंता भी रहने लगी कैसे होगा.माँ सभी से बोली इस बारे में कोई भी किसी को कुछ नहीं बताएगा।

समय अपनी रफ़्तार से गुजरता रहा, शहर में एक मकान भी ले लिया, बेटे ने माँ को शहर ले जाने की बहुत ही कोशिश की पर माँ ने मना कर दिया,बेटे में झौपड़ी के पास ही भगवान शंकर का एक मंदिर बनवा दिया.हर सोमवार को भंडारे का आयोजन होना शुरू हो गया।

कस्बें में जो स्कूल था जिसमे उसकी बेटी पढ़ाती थीं उस स्कूल को भी खरीद लिया.
खुशियों का ठिकाना न रहा,कस्बें के आस पास कई कंपनियाँ भी लगा दी.उस ही कस्बें के नौजवानों को रोजगार भी दिया , पक्की सड़क, बिजली, पानी की टंकी आदि सब अच्छे से हो गया.
कस्बें में चारों तरफ़ ख़ुशी का माहौल
बेटी की शादी भी बहुत धूम धाम से की, कस्बें के सबसे रहीस व्यक्तियों में गिनती होनी शुरू हो गई, आस पास के स्कूल विद्यालयों में मुख्य अतिथि बनाये जाने लगे।

एक दिन एक आयोजन में किसी विद्यार्थी में पूछ ही लिया, अचानक ये सब कुछ कैसे हुआ
सब कुछ बताते हुए बोले ये सब भगवान शंकर का आशीर्वाद हैं और जिस दिन ये हुआ मैंने उसी दिन सोच लिया था कि मैं सबसे पहले अपने कस्बें के लिए करूँगा .
पूरे कस्बें ने उनका बहुत मान सम्मान किया.
आज भी कस्बें में उनके नाम से कई आयोजन किए जाते हैं और सब कुछ सुचारू रूप से चल रहा हैं।

पीयूष गोयल

( ग्रेटर नोएडा )

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