sanjh suhani

देखो, आई सांझ सुहानी

देखो,आई सांझ सुहानी

गगन अंतर सिंदूरी वर्ण,
हरितिमा क्षितिज बिंदु ।
रवि मेघ क्रीडा मंचन,
धरा आंचल विश्रांत सिंधु ।
निशि दुल्हन श्रृंगार आतुर ,
श्रम मुख दिवस कहानी ।
देखो,आई सांझ सुहानी ।।

मंदिर पट संध्या आरती,
मधुर स्वर घंटी घड़ियाल ।
हार्दिक आभार परम सत्ता,
परिवेश उत्संग शुभता ढाल ।
परिवार संग हास्य किलोल ,
आभा मंडल खुशियां रवानी ।
देखो,आई सांझ सुहानी ।।

चौपाल नुक्कड़ दृश्य अनूप,
मैत्री परिध हंसी ठिठोली ।
प्रस्थान बेला निज ठोर ,
झोपड़ अंदर महल रंगोली ।
अंग प्रत्यंग यौवन अहसास ,
चाल ढाल मलंग मस्तानी ।
देखो,आई सांझ सुहानी ।।

तन मन नव आशा ज्योत ,
बेहतर कल भव्य कल्पना ।
विगत त्रुटि सुधार प्रयास,
ध्येय आरेख उमंगी अल्पना ।
विभा सह परिणय नींद ,
भोर वंदन भाग्य जगानी ।
देखो,आई सांझ सुहानी ।।

महेन्द्र कुमार

नवलगढ़ (राजस्थान)

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