कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद

कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद

कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद

(Katha samrat munshi premchand )

 

उपन्यास और कहानियों का जब भी जिक्र आता है तो सिर्फ एक नाम ही सामने नजर आता है। “सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी” उनकी कहानियां पढ़कर हम बड़े हुए हैं हिंदी उपन्यास में हिंदी में, प्रेमचंद जी का पहला उपन्यास सेवासदन था। इससे पूर्व भी उनके कई उपन्यास प्रेमा, वरदान आदि भी प्रकाशित हुए किंतु वे उर्दू में थे।

इसीलिए उनका सेवा सदन युगांत कारी सिद्ध हुआ। मुंशी प्रेमचंद जी ने सस्ते मनोरंजन के जगह पर अपने युग में समाज की ज्वलंत समस्याओं को अपनी कला का लक्ष्य बनाया यही कारण है। कि उनके प्रत्येक उपन्यास में किसी न किसी सामाजिक समस्या का चित्रण मार्मिक रूप से मिलता है।

जैसी सेवा सदन में वेश्याओं की, प्रेमाश्रय में किसानों की, निर्मला में दहेज और बेमेल विवाह की,  रंगभूमि में शासक और अधिकारियों वर्ग के अत्याचारों की कायाकल्प में पारलौकिक जीवन की, मध्यवर्ग की, आर्थिक विषमता को कर्मभूमि में अछूते व हरिजनों की और गोदान में किसान मजदूर के शोषण व त्रासदी का मार्मिक वर्णन मिलता है।

मुंशी प्रेमचंद जी का अंतिम उपन्यास मंगलसूत्र है , जो कि अपूर्ण है इस उपन्यास में मुंशी जी ने आधुनिक साहित्यकारों के जीवन की समस्याएं प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। प्रेमचंद युग की ऐसी कहानियां है जो दिल को छू जाती हैं।
प्रेमचंद जी पहले उर्दू में लिखा करते थे ।

उनका लिखा हुआ प्रसिद्ध कहानी संग्रह सोजे वतन 1960 में प्रकाशित हुआ था जो स्वतंत्रता भावनाओं से ओतप्रोत होने के कारण सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया था।

मुंशी प्रेमचंद की कहानियों की संख्या 300 से अधिक है। जो मानसरोवर के छह भागों में संग्रहित हैं। उनके कुछ संग्रह

सप्त सरोज,

नवनिधि,

प्रेम पच्चीसी,

प्रेम पूर्णिमा,

प्रेम द्वादशी,

प्रेम तीरथ,

सप्त सुमन,

आदि प्रकाशित हुए हैं।

सम्राट मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित रचित प्रथम कहानी पंच परमेश्वर प्रकाशित हुई। उनकी कहानियों में पंच परमेश्वर, के अतिरिक्त आत्माराम, बड़े घर की बेटी, शतरंज के खिलाड़ी, रानी सारंधा, ईदगाह, पूस की रात, कफन, अधिक विख्यात हुई।

प्रेमचंद जी उर्दू में नवाब राय के नाम से लिखते थे। उनकी प्रारंभिक कहानियां घटना बहुलता के कारण आकर्षक है। पाठकों को बार-बार पढ़ने के लिए एक साथी है।

दूसरी अवस्था की कहानियां कुछ छोटी हैं इस अवस्था की कहानियां मार्मिकता को समेटे हुए हैं। इस अवस्था की कहानियां में शोषण का विरोध है, आक्रोश है, सवा सेर गेहूं इनकी बहुत ही मार्मिक कहानी है।

कर्ज मैं लिए गए “सवा सेर गेहूं “को एक पीढ़ी तो चुका नहीं पाती तो दूसरी पीढ़ी क्या चुकाई कि इसमें यह दर्शाया गया है।

प्रेमचंद की कहानियों के विकास की तीसरी अवस्था में कथानांक छोटा एवं व्यंग प्रधान कहानियां लिखी गई है। इस काल की कहानियों में सद्गति ईदगाह, नशा, कफन, पूस की रात है यह कहानियां यथार्थवादी हैं। शोषण पर कठोर व्यंग करती है।

उपन्यास के दौर पर प्रेमचंद्र जी की भूमिका मील का पत्थर साबित हुई। इनके उपन्यास लेखन में दो स्पष्ट मोड़ की पहचान की जा सकती है।

सामाजिक, यथार्थवाद एवं सामाजिक, आदर्शवाद, प्रेमचंद जी ने आरंभिक उपन्यासों में सामाजिक समस्या के समाधान को सुलझाने का प्रयास किया है।

और आदर्शवाद में हृदय परिवर्तन जैसे समाधान ओं की पड़ताल करता है। समाज में नारी जीवन की बेमेल विवाह प्रदर्शन, प्रियता, सामंती, अभिजात्य, शोषण, जाती पाती, छुआछूत ,की घृणित परंपरा, आदि को इन्होंने नैतिकता वादी चश्मे से देखने का कार्य किया है।

गोदान

गोदान उपन्यास है परंतु इसकी जो बनावट है महाकाव्यात्मक की गरिमा से युक्त है। महाकाव्य सामंती समाज की विधाएं जबकि उपन्यास का जन्म मरते हुए सामंतवाद के गर्व से हुआ है। गोदान प्रेमचंद्र के यथार्थवाद को समेटने वाला उपन्यास है। इस उपन्यास का नायक होरी है। वह महाकाव्य के नायक की तरह प्रतीत नहीं होता।

प्रेमचंद जी का सामाजिक, यथार्थवाद भाव, भाषा ,चिंतन व चरित्र के उद्घाटन के स्तर पर भी मुखर दिखाई पड़ता है।गोदान का होरी परिस्थितियों से समझौता करने में विश्वास रखता है। संघर्ष को परिस्थितियों के परिवर्तन में सहयोगी नहीं मानता। होरी संयुक्त परिवार एक मर्यादा के निर्वाह में होरी पीछे नहीं रहता।

वह अपनी ही गाय को विश देने वाले हीरा के भाग जाने पर उसकी गृहस्ती का भार उठाता है, बीमार शोभा को देखने, छोटे भाई की पत्नी को रोते देख कर, हीरा के घर की तलाशी रोकने के लिए रिश्वत देने, नारी जाति का अपमान देखकर खान के वेश में मेहता को उठाकर पटक देना , झुनिया और शिलिया को घर में शरण देने, का प्रसंग में होरी उदास मूल्यों का वाहक चरित्र दिखाई पड़ता है।

होरी ग्रामीण स्वनिर्भर व्यवस्था का एक अदना सा किसान है। इसमें एक तरफ परंपराओं के प्रति मोह है तो दूसरी तरफ सामंती समाज के मूल्यों के प्रति आस्था भी।

यह आलोक मांगलिक भाव से युक्त नजर आता है। शोभा को कहता है कि क्या खा कर मोटे हुए हो, मोटे तो वे होते हैं जिन्हें नरैण की सोचो ना मरजाद‌ की चिंता।

100 को दुबला करके तब कोई एक मोटा होता है, यह मोटा होना तो बेहयाई है, सुख तो इसमें है जब सब मोटे हो, होरी किसानी व खेती की मर्यादा के भाव से युक्त है।

हजारों कष्टों के बावजूद भी खेती में जो सुख है वह मजदूरी में कहां। प्रेमचंद जी ने अवस्था वान पीढ़ी के किसानों की मर्म वेदना को टटोलना चाहा । इसी का नतीजा है कि होरी हंसते-हंसते पंचायत व बिरादरी के द्वारा लगाए गए दंड को भरने को तैयार हो जाता है।

धनिया का चरित्र चित्रण धनिया सामाजिक ग्रामीण व्यवस्था में नारी जाति की गरिमा से युक्त चरित्र है। प्रेमचंद जी ने इसे कटु यथार्थवादी चरित्र के रूप में खड़ा किया है।

मानवतावाद की इस जमीन पर धनिया भी खड़ी है। लेकिन विद्रोहियों को पछाड़ ने से पीछे नहीं हटती। सिलिया को घर में शरण देने वाली या को बहू का दर्जा देने के लिए यह जान पर खेल जाती है। धनिया होरी की तरह सामंती शोषण को मूक दर्शक बनकर सहन नहीं कर सकती।

राय साहब के यहां होरी के जाने के अवसर पर वह कहती है। जमीदार के खेत जोते हैं। वह अपना लगान ही तो लोग भला खुशामद क्यों करेगा?

कृषक परंपरा तथा गृहस्थ जीवन में नारी की भूमिका को धनिया पूरी तरह से उजागर करती है। वह सिर्फ खेतों में होरी के साथ काम नहीं करती बल्कि होली की चिंता में आर्थिक सभा की भी है। प्रेमचंद्र जी ने बहुत ही सुंदर वर्णन किया है।

उपन्यासकार ने मिस्टर खन्ना के माध्यम से निवेशक सरकार के दौरान भारतीय उद्योगों के पनपने की पृष्ठभूमि को पकड़ने की कोशिश की है।

मिस्टर खन्ना व्यवसाय वादी शुद्ध मुनाफा को प्रमुख मानते थे। प्रेमचंद जी ने मिस्टर खन्ना के चरित्र में भारतीय व्यवसायियों के मुखोटे धर्मी चरित्र को उद्घाटित किया है।

मिस्टर खन्ना एक तरफ खद्दर पहनते हैं तो दूसरी तरफ फ्रांस की शराब पीते हैं। मिस्टर मेहता व मिस मालती गोदान की शहरी कथा के मुख्य पात्रों में मिस्टर मेहता व मिस मालती की चर्चा की जा सकती है।

मिस मालती के विषय में प्रेमचंद जी ने स्वयं टिप्पणी की है वह जो दूसरी महिला है। ऊंची एड़ी का जूते पहने तथा मुख पर हंसी फूट पड़ती है।

आप मिस मालती हैं, आप इंग्लैंड से डॉक्टरी पढ़ कर लौटी हैं। प्रेमचंद जी ने मालती के माध्यम से नारी के बदलते हुए स्वरूप को उदघाटित करने की कोशिश की है। कि कहां मध्ययुगीन नारी पुरुष के एक इशारे पर नाचती हैं।

प्रेमचंद जी ने गोदान से पहले आदर्श आत्मक समाधानों की चर्चा की। गोदान में भी हृदय परिवर्तन जैसे आदर्शों की आंशिक झलक मिलती है।

मिस्टर मेहता के प्रभाव में आकर मालती नारीत्व के मूल्यों से जुड़ जाती है जो गरीबों को देखकर मुंह मोड़ लिया करती थी । वहीं अब गरीबों की बस्ती में जाकर लोगों का इलाज करती है यह मालती गोबर के बेटे मंगल को अपने पुत्र की तरह पालती है।

होरी के गांव जा कर धनिया तथा अन्य महिलाओं को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाती है प्रेमचंद जी ने मालती व मेहता के प्रसंग द्वारा भारतीय समाज में विवाह तथा परिवार जैसी संस्थाओं में आने वाली परिवर्तन की सूचना दी है।

गोदान भारतीय ग्रामीण जनता का सच्चा व युग नियामक दस्तावेज है वह यहां की 80% जनता जो गांव में रहती है के सुख-दुख की जीवन गाथा है।

गांव की कहानी किसान से भिन्न नहीं हो सकती इसीलिए गोदान की अधिकाधिक कथा भी शुरुआत होरी की दिनचर्या से होती है।

धीरे-धीरे होरी ग्रामीण जीवन के संकट में फंसता चला जाता है। और अंत में मौत ही उसे संकट से मुक्त कर पाती है गोदान उपन्यास की होरी की मृत्यु व धनिया से पछाड़ खाकर गिरने से होती है।

गोदान का आरंभ हुआ अंत ग्राम कथा के नायक से जुड़ी घटनाओं से होता है। उपन्यास का वातावरण हो रीवा धनिया के दुख दर्द से भरा हुआ है अतः गोदान भारतीय ग्राम संस्कृति में विकसित होते हुए ।गोरी, धनिया व उनकी तरह के किसानों की करुण कथा है।

गोदान में ग्रामीण जीवन और उसकी संस्कृति संपूर्णता में चित्रित है। गोदान की केंद्रीय समस्या ऋण की समस्या है, प्रेमचंद जी ने इस तथ्य को उद्घाटित किया है कि किसान शौक पूर्ति या विलास के लिए ऋण नहीं लेते, बल्कि कृषि के उपकरण, हल, बैल तथा बीज आदि के लिए, पुराने ऋण को चुकाने के लिए नए सिरे से ऋण लेते दिखते हैं।

होरी का पूरा परिवार अन्नाभाव का शिकार था होरी की चिंता की वैशाख तो किसी भी तरह कटा लेकिन जेट आते-आते घर में अनाज का एक दाना भी नहीं बचा खाने वाले 5-5 पेट, लेकिन घर में अनाज नदारत दोनों जून न सही 1 जून तो मिले, भरपेट ना सही आधा पेट तो मिले, भला भूखे पेट मे् कोई के दिन रह सकता है। यह गरीब होरी तथा उसके परिवार की थी बल्कि पूरे गांव की थी।

प्रेमचंद जी ने गांव की समस्याओं को गोदान के माध्यम से हमारे सम्मुख रखि। यह उपन्यास 1935 में लिखा गया था कहीं ना कहीं आज भी हमारे समाज में हमारे देश में गांव व किसान की स्थितियां वह परिस्थितियां साझा की हैं।

प्रेमचंद जी ने गोदान के माध्यम से हमें गांव की झलकियां व उनसे संबंधित समस्याओं का वर्णन किया है।

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लेखिका :-गीता पति ( प्रिया) उत्तराखंड

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