तेरही | Terahee

“बहुत मजा आया। कितनी अच्छी पूड़ी कचौड़ी सब्जी बने थे ऊपर से रसगुल्ले भी मिले।’ तेरही खाकर लौट रहे सुदेश ने अपने मित्र से कहा।

” मजा तो आया भाई लेकिन यार देखो ना बीमारी के कारण शरीर सूखकर कांटा हो गया ।सारा पैसा दवाई में खर्च कर दिया । खेत भी गिरवी रख दिया फिर भी नहीं बचे ऊपर से एक यह भी मजबूरी बस तेरही खिलाना।” राकेश ने अपने मित्र से दुख व्यक्त करते हुए कहा।

” यार तुम कहां उलझ जाते हो। तेरही खाकर के कितना मजा आया इसको नहीं सोचते। यह समाज है ऐसा चलता है ही रहेगा इसे कोई नहीं बदल सकता।” सुदेश ने कहा।

दोनों मित्रों में बातचीत होती रही। फिर सुदेश ने है कहां कि-” बात तो तुम ठीक करते हो। देखो ना उनके पेट का ऑपरेशन हुआ था। गलत ऑपरेशन के कारण पेट में जहर फैल गया और घर में जो भी जमा पूजी थी सारी खर्च हो गए। ऐसे में सामाजिक दबाव के कारण तेरही ऊपर से और खिलाने पड़े जिसके कारण पूरा परिवार और कर्ज में डूब गया।।”

वास्तविक रुप में देखा जाए तो यह समाज लकीर के फकीर की तरीके सामाजिक कुप्रथा को ढोता चला आ रहा है।। एक तो पूरा परिवार अपने दुखों से पीड़ित रहता है। ऊपर से दुखी मन से मरते ही भोज की तैयारी उसे करनी पड़ती है। एक तो मुख्य कमाने वाला व्यक्ति चला जाता है घर तो पहले से वैसे ही तबाह हो जाता है।

ऊपर से यह तेरहवीं भोज खिलाना। हमारे समाज में देखा जाए तो बहुत सी ऐसी कुप्रथा हैं जिनको समाज आज भी ढोता चला आ रहा है। यदि कोई ना करें तो लोग कहते हैं –” ससुरे को इतना भी नाही रहा कि मरने के बाद तेरही भी नहीं खिलाया।”

अधिकांश में देखा जाता है कि कभी कोई युवा व्यक्ति नहीं रहता है तो मजबूरी बस वहां भी तेरहवीं खिलाना पड़ता है। तेरही एक कुप्रथा है जिसे समाज के जागृत व्यक्तियों को चाहिए कि इसे बंद करें।

यदि अपने पूर्वजों के नाम पर कुछ करना है तो उनकी स्मृति में कोई ऐसा कार्य करें जिससे समाज की और उन्नति हो सके। समाज के बहुत से कार्य हैं जो आर्थिक अभाव में नहीं हो पाता है ऐसे में 13वीं की जगह ऐसे कार्यों में सहयोग देने की आवश्यकता है।

हजारों वर्षों की कुप्रथाएं को बदलने में समय जरूर लगता है लेकिन संकल्प यदि कर लिया जाए तो इसे रोकना कोई कठिन कार्य नहीं है। शुरू शुरू में थोड़ा विरोध जरूर होगा लेकिन बाद में सब शांत हो जाते हैं।
हम सभी लोगों को यह संकल्प लेना चाहिए कि तेरहवीं जैसी कुप्रथा का अंत करके ही रहेंगे।

 

योगाचार्य धर्मचंद्र जी
नरई फूलपुर ( प्रयागराज )

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