Tumhara ghar bhi jal jayega
Tumhara ghar bhi jal jayega

तुम्हारा घर भी जल जाएगा

( Tumhara ghar bhi jal jayega )

 

 

तुम्हारा घर भी जल जाएगा ,
क्यों हो आग लगाते ।

 

नासमझ बन जाने की जिद,
उन्हे भला कैसे समझाते।

 

नाम तुम्हारा ही आता ,
बताओं कैसे जख्म दिखाते।

 

टूटती नहीं ख़ाबो की ताबीर,
मुझसे किया वादा कोई निभाते ।

 

रोना गर आया तो , बना लिए मोती ,
रूसवाई थी आंसु की , जो इन्हे गिराते ।

❣️

शायर: गौतम वशिष्ठ

झुन्झुनूं (राजस्थान)

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