Kavita Holi ka Rang

रंगों का त्यौहार है होली

रंगों का त्यौहार है होली

खुशियों का इजहार है होली ,
रंगों का त्यौहार है होली ॥

जिसके प्रियतम पास नहीं हैं,
उसके लिए अंगार है होली ।

सच हो जाते जिसके सपने ,
उसके लिए बहार है होली ।

रंग रंगीला जीवन जिसका ,
उसके लिए बहार है होली ।

जहाँ वक्त पर रोटी मुश्किल ,
वहाँ पर खड़ी मजार है होली ।

महंगाई से रंग हुआ फीका ,
ऐसे लगे उधार है होली ।

वैर भाव हो जांय तिरोहित ,
आशा का संचार है होली ।

मजलूमों के संग भी खेलो ,
उनका भी अधिकार है होली ।

 राम अवतार शर्मा ” राम “
बाड़ी ( धौलपुर ) राजस्थान
M – 9461011471

यह भी पढ़ें :-

Similar Posts

  • आदमी बड़ा चाटुकार है | Aadmi Bada Chatukar

    आदमी बड़ा चाटुकार है! ( Aadmi Bada Chatukar Hai ) आदमी बड़ा चाटुकार है- स्वार्थ देखा नहीं; कि, झटपट चाटने लगता है। ऐसी-ऐसी चाटुकारी… आदमी-आदमी लेकर बैठा है; कि, वक्त आने पर… आदमी, आदमी को चाट लेता है। चाटुकारों की इस दुनिया में, आदमी इतना चाटुकार है- अपना काम निकल जाये, इसकी ख़ातिर… थूक तक…

  • रक्षक

    रक्षक जन्म लेकर जब वह आंख खोलती है देख कर दुनिया जाने क्या सोचती है   भरकर बाहों में है प्यार से उठाता शायद इसे ही मां कहा जाता   चारों तरफ है लोगों की भीड़ किससे कौन सा रिश्ता नाता   कोई भाई, चाचा कोई तो कोई मेरा पिता कहलाता मैं तो ढूंढूं उसे…

  • लाचार नारी | Poem on nari in Hindi

    लाचार नारी ( lachar nari )    एक नारी थी वक्त की मारी थी दुनिया में कोई बेचारी थी। मानवता का स्वांग करने वालों पे फिर भी चोट भारी थी।   लाचार नारी तड़पती रही दर्द से लोग वीडियो बनाते रहे। दरिंदो की दरिंदगी वो वहशीपन का नाना खेल रचाते रहे।   दुनिया की भीड़…

  • धन्यवाद | Dhanyavad

    धन्यवाद ( Dhanyavaad )   जीवन में सीख लेना सदा मदद करे कोई जब तुम्हारी धन्यवाद तुम्हारी प्रथम जिम्मेदारी चाहे फिर छोटा या बड़ा हो कोई धन्यवाद करना आदत हो तुम्हारी ।। ये जीवन हैं बहुत ही छोटा सा जो कभी सम्मान हो तुम्हारा दिल खोल धन्यवाद करना यारा मिलता हर घड़ी नया ही अनुभव…

  • सियासत से बड़ा कोई जालिम नहीं है | Poem on siyasat

    सियासत से बड़ा कोई जालिम नहीं है ( Siyasat se bada koi zalim nahi hai )     दूसरों के दर्द को   जो  अपना  समझते हैं, नमक के बदले  वो  मरहम ले के चलते हैं   जिंदगी की हर जंग  वही  लोग जीतते  है, जीते  जी  जो कभी   हार  नहीं मानते हैं।   उन्हीं के …

  • मौन | Kavita maun

    मौन ( Maun )   एक समय के बाद बहुत उत्पीड़न अन्तत: मौन की ओर हमें ले जाता है। और मौन? निराशा की ओर। निराशा किसी अपने से नहीं, ईश्वर के किसी निर्णय से नहीं। मात्र खुद से। अकेले रहते रहते हमारी आत्मा इतनी कुण्ठित होती जाती है, कि हमारा क्रोध, प्रतिशोध, आकाँक्षायें सब कुछ…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *