Budhape ki dehri

बुढ़ापे की देहरी | Budhape ki dehri | Chhand

बुढ़ापे की देहरी

( Budhape ki dehri )

मनहरण घनाक्षरी

बुढ़ापे की देहरी पे,
पग जब रख दिया।
हाथों में लकड़ी आई,
समय का खेल है।

 

बचपन याद आया,
गुजरा जमाना सारा।
बालपन की वो यादे,
सुहानी सी रेल है।

 

भागदौड़ जिंदगी की,
वक्त की मार सहते।
लो आया बुढ़ापा देखो,
नज़रो का फेर है।

 

जीवन के खट्टे मीठे,
अनुभव प्यारे-प्यारे।
पल-पल मुस्कुराते,
जीवन का मेल है।

 

 ?

कवि : रमाकांत सोनी सुदर्शन

नवलगढ़ जिला झुंझुनू

( राजस्थान )

यह भी पढ़ें :-

है तुझे भी इजाजत | Geet hai tujhe bhi ijazat

Similar Posts

  • दिव्य अनुभूति | Divya anubhuti | Chhand

    दिव्य अनुभूति ( Divya anubhuti ) मनहरण घनाक्षरी   साधना आराधना से, दिव्य अनुभूति पाई। त्याग तप ध्यान योग, नित्य किया कीजिए‌।   हरि नाम सुमिरन, जपो नित अविराम। राम राम राम राम, भज लिया कीजिए।   मंदिर में दीप कोई, जलाता ले भक्तिभाव। रोशन यह जग सारा, ध्यान किया कीजिए।   घट घट वासी…

  • शिव | Shiva | Chhand

    शिव ( Shiva ) मनहरण घनाक्षरी   नाग वासुकी लपेटे, गले सर्प की माला है। त्रिनेत्र त्रिशूलधारी, शंकर मनाइए।   डमरु कर में लिए, नटराज नृत्य करें। चंद्रमा शीश पे सोहे, हर हर गाइये।   जटा गंगधारा बहे, कैलाश पे वासा प्रभु। गोरी संग गणेश को, बारंबार ध्याइये।   त्रिपुरारी शिव भोले, शंकर दया निधान।…

  • भगवान जय श्री परशुराम जी

    भगवान जय श्री परशुराम जी ( छंद-मनहरण घनाक्षरी ) जमदग्नि रेणु सूत ,अति बलशाली पूत,छठे अवतार विष्णु ,राम  कहलाए है! अक्षय तृतीया आई,अटल मुहुर्त लाई,रामभद्र जन्मोत्सव ,जगत मनाए है। राम  बसे श्वास श्वास, करने अधर्मी नाश,हाथ में सदैव अस्त्र,परशु उठाए है । शिव धनु तोड़े राम , हर्ष हुआ चारों धाम,विलोकित राम-राम ,दोनों मुस्कुराए है। डॉ कामिनी व्यास…

  • जग से निराला लगे,

    जग से निराला लगे रूप घनाक्षरीमनमीत-8,8,8,8चरणांत -21 जग से निराला लगे,सबसे ही प्यारा लगे,छेड़े जब प्रेम धुन,वह राग मनमीत । मुख आभा लगे ऐसी,पूनम के चाॅ॑द जैसी,मुख शोभित लालिमा,ज्यों रजनी चाॅ॑दप्रीत । दीप उजियार करे,घर की है शोभा बढ़े,दमक रहे जुगनू,ऐसे लगे नैन जीत । अजब सी लीला देखो,प्रेम रस जरा चखो,कहे फिर सारा जग,है…

  • साजन | Virah

    साजन (Saajan  ) ( सायली छंद – विरह )   साजन सावन आया प्रेम ऋतु छाया पुरवा बयार हर्षाया   मेरा चंचल मन पिया अब आजा तडपत मनवा मचलत   रतिया कटती नाहीं विरह वेदना जाए याद करे पछताए   घबराए नाही आगे नन्द के लाल मदन गोपाल घनश्याम   कवि :  शेर सिंह हुंकार देवरिया…

  • धीरज | मनहरण घनाक्षरी छंद

    धीरज ( Dheeraj )   नर धीरज धारिये, संयम धरे विचार। धीरे-धीरे बढ़ चलो, ध्वज लहराइये।   धैर्यपूर्वक जो चले, शील गुणी जन जान। धीरे-धीरे मुखर हो, पहचान पाइए।   धीर अमोध अस्त्र है, मृदु वाणी सुरज्ञान। सुर लय तान बन, गीत मीत गाइए।   रणबीर बलवीर, समर न धरो धीर। राष्ट्रहित रणभूमि, वीरता दिखाइए।…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *