Hindi katha

अनोखा रिश्ता | Hindi katha

अनोखा रिश्ता

( Anokha rista : Hindi kahani )

 

कुर्सी पर बैठी 50 वर्षीय निता आग बबूला थी और गुस्से में बडबडा़ रही थी – ” इतनी मजाल कि मेरी बेटी पर हाथ उठाया? क्या समझता है अपने आप को?  मैंने कभी हाथ नहीं उठाया और ये दो साल में ही मेरी फूल सी बेटी को… । बेटी तुम अभी उस घर मत जाना बस मैं उसे पुलिस के डंडे खिलाऊंगी और माफी मंगवाऊंगी । वो समझता क्या है अपने आप को?”
 शालू आवाक ! मां की ममता और प्यार के आगे उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या बोले?
तभी शालू की बड़ी बहन शकुंतला बोला पड़ी -” मम्मा ये आप क्या कह रही है? राज शालू से बेहद प्यार करता है इसकी गलती पर भी खुद सारी बोलता है और मनाता है । शालू की हर इच्छा पूरी करने की हर संभव कोशिश करता है कोई भी निर्णय अकेले नहीं लेता और कुछ निर्णय तो शालू ही लेती है विजनेस मैन है हर तरह की महिलाओं लड़कियों से मिलता है लेकिन शालू के अलावा किसी और की तरफ नजर उठा कर भी नहीं देखता।”
 ” हां जानती हूं ऐसे मर्दों को, अभी तो शुरुआत है उसे सबक सिखाना जरूरी है नहीं तो वो अब खुल गया है कल के मेरे बच्चे का जीना दुश्वार कर देगा।”
” मम्मा  आप समझती क्यों नहीं ?  इससे शालू का घर बर्बाद हो जाएगा”
व्यंग्यात्मक लहजे में-” मैं तो कुछ समझती नहीं अब जितना तुम समझती हो और मैं तो अपने बच्चों का ही घर बर्बाद करती हूं आपका तो…।”
” वैसे आज जीजा का पक्ष कुछ ज्यादा ही लिया जा रहा है इसकी कोई खास वजह..।”
गुस्से में – “म . म् . ममा !
    जितना शालू ने बताया है इतना ही जानती हूं और पक्ष नहीं ले रही हूं शहर का इतना बड़ा विजनेस मैन अपनी पत्नी ( जिसे वह बेहद चाहता है) के कारण जेल चला जाएगा तो उसकी रह क्या जाएगी । क्या फिर पहले जैसा प्यार करेगा ? वो एकदम से टूट जाएगा और हो सकता है वो खुद को नशे में डूबा दे।”
  ” शालू तू बता! क्या राज ने तुमसे माफी नहीं मांगी फोन नहीं किया।”
” दी फोन तो छिन छिन पर आ रहा है मैं ही फोन नहीं उठा रही हूं और सारी भी उन्होंने बोला कसमें खाई कान पकड़  कि गलती हो गई अब नहीं होगी।”
” फिर भी तूने माफ नहीं किया। तूने सोचा भी नहीं कि इतना प्यार करने वाला इंसान का हाथ उठा कैसे?”
   शालू अपनी बड़ी बहन का मुंह ताकने लगी।
” जानती है तू कुछ भी या नाराज ही हो गई”
 कल उनका दसों लाख का नुकसान हो गया दुश्मन की चाल थी जेल भिजवा कर बदनाम करने की लेकिन बच गए और तो और उसी टेंशन में कल उनकी गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया ये तो शुक्र कर भगवान का तू बहुत सौभाग्यशाली है कि उन्हें ख़रोंच तक नहीं आई नहीं तो  शायद पता नहीं क्या होता एक्सीडेंट देखने वाले हैरान हैं ।”
” दी प्लीज़ शुभ शुभ बोलो”
” नहीं विश्वास है तो अपने जीजू से पूछ लो। और तू कल उनके घर पहुंचते ही शुरू हो गई।”
” थैंक्स गॉड ! राज बच गए। उन्होंने कुछ मुझे बताया नहीं ।”
” तू कुछ सुनने को तैयार कब हुई जो वो बताते।
” थैंक्स दी !  सच मैं मेरा घर बर्बाद हो जाता आपने बच लिया । “
” सारी मम्मा! मैं अपने घर जा रही हूं ‌”
***
लेखक : उदय राज वर्मा उदय
छिटेपुर सैंठा गौरीगंज अमेठी
( उत्तर प्रदेश)  भारत
धूप छांव काव्य संग्रह व खूनी सरोवर लघु उपन्यास प्रकाशित
पलाश साहित्यिक पत्रिका के जिला प्रतिनिधि
विभिन्न क्षेत्रीय राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित
बीस से अधिक सम्मान
हिंदी अवधी लोककथाओं का हिंदी खड़ी बोली में अनुवादन सहयोग
हिंदी अवधी की पहली महिला दलित कहानी का हिंदी खड़ी बोली में अनुवाद

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