अनपढ़ प्रेम | Kavita Anpadh Prem

अनपढ़ प्रेम

( Anpadh Prem )

 

प्रेम अनपढ़ होता है,
न सुकुन से रहता न रहने देता है।

रहता हमेशा मन के विपरीत,
सिखाता तरीका प्रीति की रीत।

विरोधाभास में जीवन व्यतीत होता,
न हस्ताक्षर करता न सुलह ही कराता ।

धधकती चिंगारी जिसका नाम दिल,
धड़कन की तेज रफ्तार करता उद्विग्न ।

चन्दन की भी शीतलता फीकी पड़ जाती,
चाँदनी रात भर, तारे गिनती रह जाती।

फिर क्यूँ होता भला किसी को किसी से प्यार?
बस ढाई अक्षर ही है पर करता गजब कमाल।

सबका चैन-ए-सुकून, खुशी छीन लेता,
गम, बेवशी, बेचैन, बेवफाई ही है देता।

तिल-तिल है मरता मानव तन-मन,
फिर भी आजीवन रखता याद का धन।

मिटाने को आतुर रहता अमूल्य जीवन,
जो पचा न पाये, रहता आजीवन प्रेमधन।

कमजोर पड़ जाता, बेकाबू दिल दिमाग,
विह्वल, पागलपन, क्रोधवश फेंकता तेजाब ।

भूल जाता सब धर्म, कर्म अपना वजूद,
भूखा हवस में बस मांगता, चाहता…..।

प्रतिभा पाण्डेय “प्रति”
चेन्नई

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