इधर भी उधर भी

इधर भी उधर भी

इधर भी उधर भी

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सब सम सा हो रहा है,
लिए पताका कोई व्हाइट हाउस-
तो कोई मस्जिद पर चढ़ रहा है।
देता था जो दुनिया को जनतंत्र की दुहाई,
चंद सिरफिरों ने उसकी करा दी जगहंसायी।
देखो तो कैसे कैपिटल सिटी में?
धमाके हो रहे हैं,
मशालें लिए उस ऐतिहासिक इमारत पर-
चढ़ रहे हैं;
घेर लिए हैं उसको,
कब्जा जमा लिया है?
जीतकर आए हैं उनको!
पराजित बता रहे हैं।
गोली व आगजनी ने करायी फजीहत,
अंदर की उसके अब दिख गई हकीकत!
जनमत के ऊपर हावी हुआ है धनबल,
इसी के दम पर हो रहा है सब छल?
संवैधानिक ढ़ांचे भी इस दलदल में जाकर –
हो रहे विफल!
भला हो अमेरिकी जनता मीडिया और न्यायालयों का,
जिन्होंने अपनी साख बचा रखी है-
वरना बहुत कुछ अभी होता !
‘नई दुनिया’ का यह चेहरा,
रूपहले पर्दे वाला निकला?
जब सबके सामने आया!
सैल्यूट है उनको जिन्होंने लाज बचाया!!

 

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नवाब मंजूर

लेखक-मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर

सलेमपुर, छपरा, बिहार ।

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कलम का जादू चलाओ

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