Karva chauth poem

देख ही लेती हूँ मै उसको

देख ही लेती हूँ मै उसको

दूर गगन की किस बदली में,
जाने मेरा चाँद छुपा है,
कौन भला उसे ढ़ूँढ़ के लाये
किसी को मेरी फिक्र कहाँ है,
मै तो हूँ बस आँख उठाए कि
कब काली बदली छँट जाये,
और मेरी सूनी आँखों मे,
मुझको मेरा चाँद दिखाए,
मै बर्षों से चौथ उपासी,
पानी की दो बूँद को प्यासी,
बस एक ही आस ये दिल में संजोये,
कभी चाँद अपने हाथों से,
पानी की दो बूँद पिलाये,
लेकिन चाँद कहाँ बस मेरा,
उसको दुनियाँ भर का फेरा,
वो तो है बस एक खिलाड़ी,
सबसे करता आँख मिचौनी,
कभी पेंड़ के पीछे झाँके,
कभी पहाड़ के ऊपर भागे,
कभी सितारों के मेले मे,
कभी बादलों के खेले में,
फिर भी अपने छलनी दिल से,
देख ही लेती हूँ मै उसको,
उसके नाम से पीकर पानी,
खोल ही लेती हूँ मैं व्रत को।

Abha Gupta

आभा गुप्ता
इंदौर (म. प्र.)

यह भी पढ़ें :-

Similar Posts

  • मैं विकलांग नहीं हू | Main Viklang nahi Hoon

    मैं विकलांग नहीं हू ( Main viklang nahi hoon )   कुछ लोग हँसते हैं, जबकि अन्य बस देखते रहते हैं। कुछ लोग सहानुभूति भी रख सकते हैं, लेकिन वास्तव में किसी को परवाह नहीं है। मेरे पैर नहीं हैं, और स्थिर नहीं रह सकता. हाँ, मैं अलग हूँ, लेकिन मैं विकलांग नहीं हूं. कुछ…

  • जवाबदारी | Javabdari

    जवाबदारी ( Javabdari )    बूंद, बूंद से बन जाती है नदी और सागर से महासागर तक भी हस्ती कोई भी हो ,छोटी नही होती बूंद मे समाया रहता है महासागर भी… एक ध्रुव तारा ही बदल देता है पंचांग को एक इंद्र धनुष ही करा देता है पहचान रंगों का एक ,कभी भी एक…

  • कैसा धर्म | Kaisa Dharam

    कैसा धर्म ( Kaisa dharam )    भगवा तो कभी ‌हरा ओढ़ा दिया रंग हीन,उस दयादीन को कैसा कैसा जामा पहना दिया निर्गुण, निराकार को सब ने जाने क्या क्या अपनी मर्जी से आकार दिया सर्व भूत, सर्व व्यापी तुझे हमने कैद कर दीवारों में बांध दिया हे स्रष्टा ,जग केरचयिता तुझको ही सीमाओं से…

  • बेजुबानों को प्यार दो | Kavita Bejubano ko Pyar do

    बेजुबानों को प्यार दो ( Bejubano ko pyar do )    नन्हे बालक भोले भाले हाथी घोड़े शेर पाले पशुओं से प्रेम जताते खग पखेरू दाने डाले जीवो पर दया दर्शाते गले मिलके स्नेह जताते हिल मिलकर ऐसे रहते जैसे हो कोई पुराने नाते कुत्ता बिल्ली हो खरगोश उत्साह उमंग लाते जोश ऊंटों की सवारी…

  • बेवफा जमाने को | Bewafa jamane ko

    बेवफा जमाने को ( Bewafa jamane ko )   न गुनगुनाया करो, तुम मेरे फसाने को। याद जब मेरी नहीं ,बेबफा जमाने को।।   अपना बस्ता वो खिलौने, वहीं पे बेच दिए घर से निकला था इकरोज़,जब कमाने को।   है अजीब शहर ,यहाँ पर मत आना यहाँ न राह कोई घर को लौट जाने…

  • बनारस भाग-२ | Poem on Banaras

    बनारस भाग-२ ( Banaras )   ब्रह्मा, विष्णु सदा विराजें, करता है गुणगान बनारस। बँधती गँठरी पुण्य की देखो, सुख की है खान बनारस। दोष-पाप सब दूर है करता, ऐसा है वो घाट बनारस। खल-कामी,लोभी- अज्ञानी, इन सबका है काट बनारस। गंगा की लहरों में जीवन, शीतल-मंद-सुगंध बनारस। कल्- वृक्ष के जैसा है वो, ऋषि,मुनि…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *