अपने सजन पर रहे

अपने सजन पर रहे

बोझ बाक़ी न इतना भी मन पर रहे
कुछ भरोसा तो अपने सजन पर रहे

राहे- मंज़िल थी काँटो भरी इस कदर
दाग़ कितने दिनों तक बदन पर रहे

आज जी भर के साक़ी पिला दे हमें
मुद्दतों से ही हम आचमन पर रहे

कह रहे हैं ग़ज़ल हम तो अपनी मगर
वोही छाये हमारी सुखन पर रहे

हमने सीखे हुनर मीर ,ग़ालिब के हैं
हमसे शाइर हमेशा गगन पर रहे

कम न थीं राजा दशरथ की मजबूरियाँ
फिर भी क़ायम वो अपने वचन पर रहे

आज दुनिया में शोहरत है भारत की यूँ
हमसे परवान बेटे वतन पर रहे

सोचने की ये ज़हमत भी कब कर सके
दाग़ क्यों यह किसी के कफ़न पर रहे

दाद “साग़र “हमें हर बशर से मिली
उनके जलवों के साये सुखन पर रहे

Vinay

कवि व शायर: विनय साग़र जायसवाल बरेली
846, शाहबाद, गोंदनी चौक
बरेली 243003

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