तुम उस शर्वरी पढ़ते
तुम उस शर्वरी पढ़ते
खत मेरा अंततः तक,
काश ! तुम उस शर्वरी पढ़ते,
प्रेम का एक नव रूप,
काश ! तुम विभावरी गढ़ते।
तुम अगर पढ़ते तो शायद,
फैसले आज कुछ और होते,
देह से भले विलग रहते,
किन्तु ह्रदय से एक रहते।
प्रिय ! निर्णय तुम्हारा सहजरूपी,
निर्मित ताज होता,
शीश मैं झुकाती,
पूर्ण सब अभिषेक होते।
सोपान उस दिन प्रणय का,
काश ! तुम दो चार चढ़ते,
खत मेरा अंततः तक,
काश ! तुम उस शर्वरी पढ़ते।
अंत तक पढ़ते तो–
कहते हूँ तुम्हारे साथ प्रिय,
नेह की डोर थाम लो अब नेह प्रिय।
ये दुनिया क्या कहेगी,
फर्क अब पड़ता नही है,
मांग का सिंदूर दो,
तुम मान लो यह बात प्रिय।
भाग्य के अनजान पथ पर,
काश ! तुम उस शर्वरी बढ़ते,
खत मेरा अंततः तक,
काश ! तुम उस शर्वरी पढ़ते।
कल तुम्हारी तस्वीर से,
बात मेरी हो रही थी,
होठों पर झूठी हँसी थी,
आँखे खुलकर रो रही थी,
मन व्यथा का पट लपेटे,
भाव के जब घाट बैठी,
मैं एहसासों के आंसुओं से,
दाग सारे धो रही थी,
देखकर यह दृश्य दारुण,
चेतना थी चीख पड़ी,
खत मेरा अंततः तक,
काश ! उस शर्वरी पढ़ते।।

डॉ पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’
लेखिका एवं कवयित्री
बैतूल ( मप्र )
शर्वरी – रात
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