निर्मल कुमार दे की कविताएं | Nirmal Kumar Dey Poetry
रिटायरमेंट
जिंदगी के सफ़र में
कई पड़ाव आते हैं
बचपन जवानी औेर बुढ़ापा
सबको मालूम है।
एक पड़ाव है रिटायरमेंट
उसकी चर्चा हम कहाँ करते है?
साठ के बाद बाकी साल
हम यूहीं क्यों जाने दें?
अपनी ऊर्जा,अपनी ताकत
क्यों हम बर्बाद करें?
मन में रख विश्वास
सही चिंतन के साथ
ऐसा कुछ काम करें
खुद को मिले संतुष्टि
दूसरों को भी लाभ मिले।
सरस सावन
वसुधा अब सरस हुई
सावन की प्यास मिटी
चंचल नदी ली अंगड़ाई
चारों ओर छाई हरियाली।
खिले कदंब महकी जूही
बिकने लगीं चूडियाँ हरी
पिया मिलन तरसे मन
बड़ी कठिन तेरी जुदाई।
बचपन खेले पानी संग
कीचड़ सना उसका अंग
नव वधू सजाए मेहँदी
रति हर्षित, आयेंगे अनंग।
वीर शिबू
शिबू सोरेन नहीं रहे
हम अनाथ हो गये
दिशोम गुरु!
तुम थे महान।
झारखंड को दी तुमने
एक नई पहचान।
शोषण,अन्याय, अत्याचार के खिलाफ
तुमने लड़ी लम्बी लड़ाई
अलग राज्य का सपना
तुमने ही पूरा किया
हम झारखंडियों की आवाज
सुना सारा हिंदुस्तान।
तेरी ही रहनुमाई में
हाशिए में जो थी आबादी
लड़ी अलग राज्य की लड़ाई
आसान नहीं था तेरा सपना
लेकिन अदम्य था साहस तेरा
तुम्हें तोड़ने का की सारी साजिश
हो गई जब नाकाम।
सिदो कानू की अमर आत्मा ने
तुम्हें दिया वरदान।
तुम्हारे ही पद चिह्नों पर चलकर
हम बनायेंगे एक समृद्ध झारखंड
बार बार, सौ बार
करता हूँ तुम्हें सलाम
वीर शिबू तुम्हें सलाम
दिशोम गुरु तुम्हें सलाम।
धिक्कार है तुम्हें
अरे बलात्कारियों!
तुम जब करते हो बलात्कार
याद नहीं आती तुम्हारी बहन!
याद नहीं आती तुम्हारी माँ ?
उसके पास भी है योनि
जहाँ से तुम पैदा हुए
याद करो अपनी माँ की दो छाती
जिसमें बहती थी अमृत धारा
पीकर जिसे तुम हो धरती पर खड़ा।।
तुम भी योनिज हो,
माँ तेरी खुश हुई थी,
अपनी योनि पर गर्व की थी।
जाकर पूछो अपनी माँ से
तुम्हारे कुकृत्य पर रो रही या हँस रही है?
भारत माता की ओर देखो!
अश्रुसिक्त उनकी दो अनमोल नयन!
क्यों बर्बाद करते हो बलात्कारियों
अपना बहुमूल्य जीवन ?
सलोना सावन
वसुधा अब सरस हुई
सावन की प्यास मिटी
चंचल नदी ली अंगड़ाई
चारों ओर छाई हरियाली।
खिले कदंब महकी जूही
बिकने लगी चूड़ियाँ हरी
पिया मिलन तरसे मन
बड़ी कठिन तेरी जुदाई।
बचपन खेले पानी संग
कीचड़ सना उसका अंग
नव वधू सजाए मेहंदी
रति हर्षित, आयेंगे अनंग।
सलोना सावन
वसुधा अब सरस हुई
सावन की प्यास मिटी
चंचल नदी ली अंगड़ाई
चारों ओर छाई हरियाली।
खिले कदंब महकी जूही
बिकने लगी चूड़ियाँ हरी
पिया मिलन तरसे मन
बड़ी कठिन तेरी जुदाई।
बचपन खेले पानी संग
कीचड़ सना उसका अंग
नव वधू सजाए मेहंदी
रति हर्षित, आयेंगे अनंग।
अपना तिरंगा
संघर्ष और शहादत के बल पर
पूरा हुआ है स्वतंत्र भारत का सपना
अपनी ध्वजा,अपनी सरकार अपना संविधान।
विश्व के नक्शे पर
भारत देश महान।
जय जवान जय किसान जय विज्ञान
लेकर संकल्प हम गढ़ें अब
विकसित हिन्दुस्तान।
विकास की दौड़ में
न पीछे रह जाए देश अपना
हर किसी के मन में यह भाव रहे,
शांति के साथ समृद्धि
है अपना अरमान।
शपथ तिरंगे की
झुकने नहीं देंगे
भारत माँ की शान।
तुम नहीं आए
वसंत आया
पर तुम नहीं आए
दहकता पलाश
मन में अगन लगाए।
कोयल की कूक
हूक- सी लगे
भ्रमर के गुंजन
पल -पल तरसाए।
वसंत आया
पर तुम नहीं आए
वासंती पवन
अलसाया बदन
मुकुलित रसाल
मधुप दिखे ललचाए।
वसंत आया
पर तुम नहीं आए।
तन्हा है दिन
तन्हा है रजनी
एक ही प्रश्न
तुम क्यों नहीं आए ?
सावन की घटा
मधुर वाणी प्रियतम तेरी
मिश्री की डली- सी,
सावन की पहली फुहार
गुलाब की कली -सी।
प्रीत जगाए सावन की घटा।1।
फूल सा बदन तेरा
आँखें हिरणी बन गई
लबों की लाली तूने
सुर्ख गुल से चुराई
प्रीत जगाए सावन की घटा।2।
तस्वीर कैसे उतारूंँ तेरी
पल पल तू बदल रही
मुस्कान तेरी आँखो की
बिजली है गिरा रही
प्रीत जगाए सावन की घटा।3।
एक ही प्रार्थना प्रभो
एक ही प्रार्थना प्रभो
कोरॉना का अंत करो
परेशान है पूरी दुनिया
दया करो,दया करो ।
दिन गुजरे महीने गुजरे
थक चुका है इंसान
कॉरॉना से लड़ते लड़ते
जिंदगी हुई मौत समान ।
गर्मी गई वर्षा अाई
खेतों में रोता किसान
काम के अभाव में
मजदूर का जीना हराम।
विनाश लीला करने आया
अदृश्य विषाणु बड़ा शैतान
लाखों आदमी मर चुके
दया करो हे भगवान।
एक ही प्रार्थना प्रभो
करोना का अंत करो
परेशान है पूरी दुनिया
दया करो दया करो।।
कसम
क्या लिखूँ किसे लिखूँ
समझ नहीं आता
अशांत हूंँ
आहत भी।
भू भूधर नदी नाले
जल,जंगल जीव जंतु
खुद इंसान सबों का
अस्तित्व
खतरे में दिख रहा है ।
हम कितने सभ्य हुए
या मानव से दानव हुए
सोचने की फुर्सत किसे है
विकास की अंधी दौड़ में
जीवन से जुड़े प्रकृति
के हर वरदान को
अपने हाथों
बर्बाद किए जा रहे हैं।
पहाड़ अब कितने बचे
नदियाँ सूखी सूखी क्यों
पानी में जहर क्यों
हवा में धुआंँ क्यों
तालाब सब कहाँ गए
हरियाली क्यों नहीं दिखती
पानी में रहती मछली
जल ही उसका जीवन है
हाथी,बाघ, गीदड़ भालू
सब जंगल में रहते हैं
हम मनुज के कारण ही
खतरे में उनका जीवन है।
खेत खलिहान की हालत देखो
हालत देखो मैदान की
द्विज पंखेरू, मूक जानवर
सभी व्याकुल अंदर ही अंदर
सारी करतूत इंसान की
ठहर जाओ,पीछे मुड़कर देखो
सोचो भविष्य के बारे में,मनुज
कसम तुम्हें भगवान की।
सफर मेरा सुहाना हो गया
कितनी कठिन थी डगर
पर हिम्मत कम नहीं थी
चाह थी एक हमसफर की
और तुम साथ आ गई
सफर मेरा सुहाना हो गया।
घोर अमावस में
तुम दीपशिखा- सी जली
बनके मेरी ताकत
हमसाया बन मुस्काती रही
तुम जो हम कदम बनी मेरी
सफर मेरा सुहाना हो गया।
अस्त व्यस्त था जीवन मेरा
शूलों से भरी थी डगर
अनिश्चयता के अँधेरे को
चीरकर तूने मशाल जलाई
हमराज मेहरबान मेरे
तुम ही जिंदगी मेरी
तेरा साथ जो मुझे मिला
सफर मेरा सुहाना हो गया।
खूबसूरत जिंदगी
जिंदगी मिली है खूबसूरत
नगमा बनाकर इसे गुनगुनाना है
मंज़िल चाहे दूर सही
सफ़र अपना बहुत सुहाना है।
बारिश में भीगने का मज़ा कुछ और है
तो धूप में नहाने का मज़ा क्या कम है।
शूल को फूल में बदलते जाना है।
जिंदगी मिली है खूबसूरत
नगमा बनाकर इसे गुनगुनाना है।1।
पतझड़ में पत्ते झर जाते
पेड़ को मुरझाते देखा नहीं
बसंत के इंतजार में
कुछ ही लम्हें बिताना है।
जिंदगी मिली है खूबसूरत
नगमा बनाकर इसे गुनगुनाना है।2।
जेठ में सूख जाने पर
नदियाँ कहाँ हाहाकार मचाती
जानती हैं नदियाँ सारी
सावन को आना ही आना है।
जिंदगी मिली है खूबसूरत
नगमा बनाकर इसे गुनगुनाना है।3।
दिल चाहता है
मेरी आँखों में तस्वीर तुम्हारी
मेरे लबों पे गीत तुम्हारे
मेरी सांसों में खुश्बू तुम्हारी
मेरे दिल में धड़कन तुम्हारी ;
दिल चाहता है
आजाद न होने दूँ तुम्हें
अपनी बाँहों के घेरे से।
रात कितनी नशीली
बरस रही फुहारें मीठी
रिमझिम -रिमझिम शब्दों की
बज रही शहनाई ;
दिल चाहता है
आजाद न होने दूँ तुम्हें
अपनी बाँहों के घेरे से।
सावन की घटा- सी
काली जुल्फें तुम्हारी
मेरे चाँद पर आज
मंडरा रही है ;
दिल चाहता है
आजाद न होने दूँ तुम्हें
अपनी बाँहों के घेरे से।
नीरद कब बरसोगे
नीरद कब बरसोगे?
गरजते हो
पर बरसते नहीं
तेरी यह अदा
मुझे पसंद नहीं
धरती है कितनी प्यासी
आस लिए तुम्हें निहारती
तुम खेल में मगन हो।
कभी इधर कभी उधर
करतब बहुत दिखाते हो
गरजते हो
पर बरसते नहीं
तेरी यह अदा
मुझे पसंद नहीं ।
सूख गई नदियाँ सारी
दो बूँद को तरस रहीं
हाय हाय कर रहे लोग
तुमको दे रहे हैं गाली
मिट चली हरियाली देखो
अब तो सरस बनो, तुम निर्दय
प्रेम सुधा बरसा दो।
बहुत सुना गर्जन तेरा
अब नहीं सुहाते हो।
बरसो, अब बरसो नीरद;
सिर्फ गरजना बंद करो।
बिहार की बिटिया
जी,
मैं ज्योति पासवान हूंँ
बिहार की हूंँ
दलित हूंँ
गरीब हूंँ
उपेक्षित हूंँ।
गरीबी और भूख से
लड़ने पिताजी गए थे गुड़गांँव
कठिन परिश्रम करते थे
आधा पेट खाते थे
कुछ पैसे घर भेज पाते थे
कोरोना के कारण
पिता हो गए बेकार
काम नहीं मजदूरी नहीं
फफक -फफक रो रहे थे।
घर वापस आना चाहते थे
कोई गाड़ी नहीं
रेल नहीं टेंपो नहीं
पानी और रोटी के बिना
आँसू बहा रहे थे।
देख राम पुकार की दशा
मुझसे रहा नहीं गया
दौड़ पड़ी साइकिल लेकर
पिताजी के पास पहुंँची
बिठा कर साइकिल पर
कमजोर पिता को
मैं ले आई
अपने घर तक
हिम्मत मेरी जीत गई
बारह सौ किलो मीटर
की दूरी
तय कर ली।
राम पुकार की बेटी मैं
गरीब पर दिलेर हूँ।
धिक्कार है !
कुछ दरिंदों ने
मेरी हमनाम ज्योति का
किया बलात्कार,
फिर ले ली उसकी जान
अपराध उसका महज इतना
बाग से चुरा लिया था एक आम।
इससे बड़ी शर्म की बात
कुछ लोगों ने
इस घटना से जोड़ दिया
मेरा भी नाम।
मैं जिंदा हूंँ
घर पर हूंँ
क्यों करना चाहते
मेरा जीना हराम?
वर्षा बहार
आया आषाढ़ का महीना
अब लगे मौसम सुहाना
देख काले बादल की क्रीड़ा
मन मयूर नाचने लगा।1।
चारों ओर छाई हरियाली
कूक रही है कोयल काली
नदी बनी अल्हड़ बाला
सारी उदासी मिट चली।2।
मेघा संग बिजली खेले
लग गए बाग में झूले
मन बेचैन पिया परदेश
कैसे भेजूँ अपना संदेश।3।
नदियों में बहता पानी
सुंदर लगे इसकी रवानी
बच्चे तैरते मछली जैसे
आकाश से पानी बरसे।4
चलना ही जिंदगी है
रुको मत बढ़े चलो
मंजिल अभी आई नहीं
हिम्मत तेरी टूटे नहीं
चलना ही जिंदगी है।1।
घटा है घनघोर छाई
सूर्य नहीं दिख रहा
धैर्य तुम खोना नहीं
चलना ही जिंदगी है।2।
नगेन्द्र के शीर्ष पर
अभी जाना है बाकी
चरण तेरे थके नहीं
चलना ही जिंदगी है।3।
हिम शीतल हवा बहे
पैर नीचे बर्फ जमे
निराश हो रोना नहीं
चलना ही जिंदगी है।4।
वृक्षहीन मही में
पेड़ हों हरे भरे
जहर तुम बोना नहीं
चलना ही जिंदगी है।5।
उर में जोश हो
मन में हो विश्वास
तुम कोई खिलौना नहीं
चलना ही जिंदगी है।6।
चलना ही जिंदगी है
रुको मत बढ़े चलो
मंजिल अभी आई नहीं
हिम्मत तेरी टूटे नहीं
चलना ही जिंदगी है।1।
घटा है घनघोर छाई
सूर्य नहीं दिख रहा
धैर्य तुम खोना नहीं
चलना ही जिंदगी है।2।
नगेन्द्र के शीर्ष पर
अभी जाना है बाकी
चरण तेरे थके नहीं
चलना ही जिंदगी है।3।
हिम शीतल हवा बहे
पैर नीचे बर्फ जमे
निराश हो रोना नहीं
चलना ही जिंदगी है।4।
वृक्षहीन मही में
पेड़ हों हरे भरे
जहर तुम बोना नहीं
चलना ही जिंदगी है।5।
उर में जोश हो
मन में हो विश्वास
तुम कोई खिलौना नहीं
चलना ही जिंदगी है।
अजब इसका अंदाज है
कोयल काली गा रही थी
मीठी आवाज भा रही थी
सोचा एक सवाल कर दूं आज
कोयल,क्या गाती हो,
अपनी मीठी तान किसे सुनाती हो?
किसी को तो नहीं देखा मैंने
खड़े होकर तुम्हें सुनते
फिर क्यों गाती हो
अपने मन से?
सामने देखा एक बच्चे को
गुड़ियों के साथ खेलते,
संगी साथी कोई नहीं
फिर भी मगन अपने खेल में
बात आई मेरी समझ में
ज्यों बिजली चमकी गगन में
कोयल गाती है अपनी धुन में
मधुर आवाज बेमिसाल भुवन में।
बच्चा दिल का राजा है
अपनी दुनिया का सरताज है,
कौन भला करे इसका मुकाबला
अजब इसका अंदाज है।।
प्रकृति की अनमोल धरोहर
सुनो सुनो मानव सुनो
पेड़ पौधों की गाथा
गाथा नहीं सत्य है
पुरखों ने है कहा।1।
पेड़ है तो मानव है
सुख सम्पदा जीवन है।
पेड़ देता फल हमें
फूल और सुगंध हमें।2।
प्रकृति की अनमोल धरोहर
शुद्ध हवा देती निरंतर
मत काटना पेड़ कभी
धरती रहे सदा मनोहर।3।
आम बेल पीपल बरगद
चम्पा तुलसी जामुन कटहल
सखुआ ताल पाकड़ बेर
शंभू का प्रिय कनेर।4।
पेड़ पौधों की गाथा निराली
चारों ओर दिखे हरियाली
पेड़ बिना सबकुछ सुना
तुम इसकी रक्षा करना।5।
सावन की बारिश में
मचल जाता है दिल
जब सामने आ जाते हो
कहीं तुम्हारे दिल की हालत
मेरे जैसे तो नहीं।
कई बार सोचता हूंँ
तुम सिर्फ मेरे हो
पर हुस्न पर पहरा
किसी एक का क्यों हो।
चमन के फूलों जैसे
तुम बहुत खूबसूरत हो
किसी का भी दिल आ जाएगा
सोचकर हैरान हूंँ मैं।
तसव्वुर में तुम रहते हो मेरे
बहुत खुशगवार लगता है
तुम्हें सोचना
चलो कभी भीगते हैं
सावन की बारिश में।
बंजर में फूल
टूटे सपनों को जोड़ने की मुकम्मल कोशिश की
एक नए अंदाज में सामने है एक तस्वीर खड़ी।
माना कि वक्त होता है बड़ा बलवान
पर अपनी भुजाओं में भी ताकत होनी चाहिए
इसे बदलने के लिए।
नदी कहाँ रुकती है सामने देख चट्टान को
या तो तोड़ देती है चट्टान को
या बदल लेती है अपना रास्ता
रात चाहे कितनी भी काली क्यों न हो
रोक नहीं सकती दिनकर को
उजास फैलाने से कभी।
पत्थर में भी दूब उगती हैं
बंजर में भी फूल खिलते हैं
कीचड़ की दुर्गंध नहीं होती पंकज में
भ्रमर जुटते हैं मकरंद के लिए।
एक नया आदर्श गढ़ने की है तमन्ना
बस आपका आशीर्वाद चाहिए।
तेरी जिजीविषा
मत घबराओ मानव
तुम मनु के वंशधर हो!
प्रलय क्षणिक है
संघर्ष अथक है।
तेरी जिजीविषा सदा अटल है।
शून्य से आ रही रवि किरणें
दे रही जीवन की वार्ता नई
विध्वंस के बाद सृजन
प्रकृति का अमोघ नियम है
पुहुप -सा खिल,निर्झर -सा विहँस
पौरुष तेरा सदा धवल है।
मत घबराओ मानव
तुम मनु के वंशधर हो।
श्यामपट
बहुत महत्व रखता था श्यामपट
किसी मंदिर की वेदी- सा लगता था;
एक एक अक्षर एक एक अंक पर
नज़रें केंद्रित रहती थीं;
गुरुजी जो कुछ लिखते थे
मंत्र सिद्ध से लगते थे;
काली पट्टी पर सफेद रंग
यूंँ चमकते थे मानों
काली चादर पर सफेद तारे हों!
श्याम पट ने दिया जीने का कौशल
बचपन की हर बातें ,स्कूल में बिताए दिन
सब याद आ जाते हैं
देख कोई श्याम पट।
खुशबू पसीने की
एक आलीशान मकान के सामने
मजदूर एक खड़ा
चालीस साल पहले की बात
सोच रहा बेचारा
मैंने महीनों काम किया है
कड़ी धूप और बारिश में
और भी मजदूर थे साथ मेरे
पच्चीस थी उम्र मेरी
आज पैंसठ में लाचार बूढ़ा
आँखों में ज्योति कम
शरीर में नहीं रहा दम
मालिक इस मकान का
अस्सी साल का होगा
फुर्तीला नौजवान- सा
फियेट से उतरते देखा
सामने खड़े बूढ़े को
भिखारी समझ मालिक ने
पाँच का एक सिक्का थमा दिया
कुछ कहता बूढ़ा पर
मालिक को क्या पता
किसके पसीने की खुशबू से
उसका यह मकान है खड़ा।
सपनों की दुनिया
मैं भी बुन रखी थी
अपने सपनों की एक दुनिया
एक झोंका ऐसा आया
बिखर गए सारे धागे
कुछ न बचा सिवाय
एक रीतापन के;
काश मैं भी होती एक चिड़िया
फिर से सजाती अपना घोंसला
एक एक कर चुनती बिखरे तिनकों को
खड़ी कर लेती
अपनी अलग एक,
सपनों की दुनिया।
तुम्हारा खत
एक खत तुम्हारा
आज भी सहेज रखा है मैंने
हर शब्द में झलकता है तुम्हारा प्यार
खुशबू मिलती है तेरी जुल्फों की
अनायास सामने आ जाता है तुम्हारा चेहरा
तुम्हारी बड़ी- बड़ी आँखें
तुम्हारी मासूमियत,तुम्हारी नादानी
तुम्हारी सादगी
सभी प्रतिबिंबित हो जाती हैं
इस गुलाबी खत में।
कुछ भ्रम -सा है
यह मेरी नादानी भी
बरसों बीत गए
पर याद है कि
जेहन में बिल्कुल ताजा है
भूल जाता हूँ कि
उम्र ठहरती नहीं
फिर भी एक
सुकून -सा देता है
तुम्हारा यह पत्र।
मनुहार
कहाँ भूला पाया हूँं तुम्हें
हर गुलाब में तुम्हीं नज़र आती हो।
हवा भी महकती है
तेरी जुल्फ़ों की खुशबू से।
दहकते पलाश को देख
तेरे होठों का भरम हो जाता है
तुम्हें भूलने की कोशिश
नाकाम हो जाती है।
यादों में सिर्फ तुम ही तुम
बसती हो
ख्वाबों में जब आती हो
अप्सरा -सी लगती हो।
न रहो रूठकर
मुझसे
क्यों कोयल -सी
दूर से चहकती हो।

निर्मल कुमार दे
जमशेदपुर
nirmalkumardey07@gmail.co
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