जानें कब आएंगे अपने अच्छे दिन!

जानें कब आएंगे अपने अच्छे दिन!

जानें कब आएंगे अपने अच्छे दिन!

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गरीबों तुमने..
बहुत कुछ झेला है!
बहुत कुछ झेलना बाकी है,
इतिहास इसका साक्षी है।
अभी महामारी और कोरोना का दौर है,
गरीबों के लिए यहां भी नहीं कोई ठौर है।
सरकारों की प्राथमिकता में अभी कुछ और है,
सेवा सहानुभूति का नहीं यह दौर है।
धनवान निर्धन को देखना नहीं चाहते,
अपने को खुदा से कम नहीं मानते।
गरीबों की संपदा पर है उनकी नजर,
कहां किसका कितना छिपा है किधर?
येन-केन प्रकारेण चाहते हैं हड़पना!
सारी वसुंधरा चाहते अपना।
गरीब उनकी आंखों में हैं चुभते!
चाहते ये रहें दुबके दुबके।
इन्हें शिक्षा चिकित्सा को तरसाओ,
बेवजह इन्हें न्यायालयों में दौड़ाओ।
बिना रिश्वत नहीं हो कोई काम,
यथाशीघ्र हो जाए इनका काम तमाम!
ताकि संसाधन और शासन तक नहीं हो पहुंच,
दफ्तरों में भी ये दिखें न बहुत!
अभाव में जीयोगे तभी तो जी हुजूरी करेंगे,
वरना बन मालिक बैठ हुकूमत करेंगे;
अमीरों के नाक में दम करने लगेंगे।
इसके लिए कई तरह की साजिशें
रची जाती हैं,
गरीब जनता सदैव ठगी जाती है।
बहुत कुछ झेलते आए हैं…
अभी बहुत कुछ झेलना बाकी है,
सिर्फ ईश्वर ही अपना साथी है।
जिनकी कृपा से चली आ रही जिंदगानी है,
वरना इस दौर में-
हमारी कहां कुछ निशानी है?
जिंदगी भी बेमानी है।

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नवाब मंजूर

लेखक-मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर

सलेमपुर, छपरा, बिहार ।

यह भी पढ़ें : 

https://thesahitya.com/lalach-buri-balaay-kavita/

 

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