जानलेवा आदत जो छूटे न

जानलेवा आदत जो छूटे न

एक दिन अभिषेक अपने सेवानिवृत्त गुरु दिवाकर जी से मिलने उनके घर पहुँचा। गुरुजी को चरण स्पर्श करके उसने उनका हाल-चाल लेना शुरू ही किया था कि इतने में गुरु जी का लड़का आनन्द अपने मुँह को ढ़ककर कमरे में कुछ सामान लेने आता है। इस तरह मुँह को ढका हुआ देखकर अभिषेक ने आनंद से पूछा-

“भैया आप ठीक हो? आपने इस तरह मुँह को क्यों ढक रखा है? कोई दिक्कत है क्या?”

आनंद ने कोई जवाब नहीं दिया और चुपचाप कमरे से बाहर निकल गया। उसके जाने के बाद गुरुजी बोले-

“हम अपने इस लड़के की तरफ से बहुत दुखी है। 5 वर्ष पहले बहुत मुश्किल से इसकी जान बची थी। अब फिर से इसको दिक्कत हो गई है?”

“भैया को क्या हुआ सर? मुझे इस बारे में कुछ नहीं पता? अभिषेक ने सर से सवाल किया।

“होना क्या है? वहीं मुँह का कैंसर।” गुरुजी ने जवाब दिया

“मुँह का कैंसर तो गुटखा, तम्बाकू, सुपारी खाने और शराब पीने से होता है। क्या भैया गुटखा, शराब वगैरह का सेवन करते हैं” अभिषेक बोला।

“हाँ” सर ने सहमति में सर हिलाया। अभिषेक ने आगे कहा-

“बड़े आश्चर्य की बात है सर। आपको देखकर नहीं लगता कि आपके बच्चे इस तरह के दुर्व्यसन में संलिप्त होंगे? आश्चर्य से अभिषेक ने सवाल किया।

“मेरे लिए सबसे ज्यादा दुख की यही बात है बेटा। इस लड़के की वजह से मैं घर से बाहर निकलने से भी कतराता हूँ। इस लड़के ने हर बुरी आदत पाल रखी है। यह शराब के साथ-साथ गुटखा, सिगरेट सबका सेवन करता है। इन्हीं आदतों के कारण, अब से 5 साल पहले इसकी हालत बहुत ज्यादा बिगड़ गई थी।

तब भी इसको खाते समय अपने होंठों को हिलाने, भोजन चबाने, निगलने में बहुत कठिनाई होती थी। पूरा मुँह खुल नहीं पाता था। मुँह सूजकर काफी बड़ा हो गया था। दर्द से बिलबिला उठता था ये। दिल्ली में बड़े अस्पताल में हर तीन से चार सप्ताह में इसकी कीमोथेरेपी होती थी, इसको बचाने में पानी की तरह खूब पैसा बहाया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

फिर किसी ने हमें देहरादून के वैद्यजी का पता बताया जो कैंसर का इलाज करते हैं। फिर हमने इसका उन्हीं वैद्यजी से आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों का इलाज किया। हमें तो उस समय इसके बचने की उम्मीद बहुत कम थी लेकिन वैद्यजी की दवा ने चमत्कारिक रूप से असर दिखाया और यह बिल्कुल ठीक हो गया। वहाँ से लगभग एक साल इसका इलाज चला। फिर यह बिल्कुल ठीक हो गया। मुँह भी काफी खुलने लगा था।

सब कुछ पहले की तरह हो गया। यह सब पहले की तरह खाने-पीने भी लगा था, लेकिन अब पिछले एक साल से यह फिर से शराब, गुटखे आदि का सेवन करने लगा तो हमने इसको खूब डाँटा फटकारा लेकिन हमारी बातों का इस पर कोई असर ना हुआ और आज फिर से इसकी वही हालत हो गई जो पांच साल पहले हुई थी। चेहरा काला पड़ गया है, थोड़ा सा टेढ़ा भी हो गया है। यह अपना पूरा मुँह नहीं खोल पाता। खा पी नहीं सकता।

इसको भोजन करते समय अपने होठों को हिलाने या भोजन मुख में खाने में बहुत कठिनाई होती है। जिसको यह गंभीर कुरोग लग जाए उसको खाना चबाने, निगलने, जीभ हिलाने में और बोलने में बहुत कठिनाई का अनुभव होता है। यह रोटी अगर खानी चाहे तो मुँह में रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े रखकर अंगुली से अंदर सरकाता हैं।

तब जाकर शरीर में कुछ पहुँचता है। इससे मैं बहुत बार कह चुका हूँ कि चल.. फिर से उत्तराखंड वाले वैद्यजी के पास चलते हैं.. दवा ले आते हैं। लेकिन यह कुछ भी सुनने, कहना मानने और चलने को तैयार नहीं है। क्या करूं? कुछ समझ में नहीं आता।”

“सर, आपसे एक बात पूछूं, बुरा तो नहीं लगेगा?”

“मुझे बुरा क्यों लगेगा? पूछो, क्या मालूम करना है?” सर बोले।

“जहाँ तक मैं आपको जानता हूँ। आप हमेशा से शाकाहारी रहे हो। आपने कभी माँस, मछली, गुटखा, शराब, सिगरेट, सुपारी इत्यादि का सेवन नहीं किया। समाज में आपकी एक अच्छी छवि है। लोग आपसे राय मशवरा लेने भी आते हैं। लेकिन आपका बेटा ऐसा निकलेगा? मुझे यकीन नहीं होता। क्या आपने कभी आनंद, उसकी संगति, उसके दोस्तों पर नज़र नहीं रखी कि वह क्या खा-पी रहा है?

किसके साथ बैठ रहा है? अगर उसी समय इसकी बुरी आदतों को नियंत्रित कर दिया जाता तो यह सब ना होता, जो अब आपको देखना पड़ रहा है। एक पिता के लिए उसकी अपनी संतान उसके जीते जी कष्ट सहे, दुख भोगे और मरने के कगार पर खड़ी हो। यह माँ बाप के लिए जीते जी पल-पल मरने जैसा होता है।”

“यह सही है बेटा कि एकदम से सब कुछ नहीं बिगड़ता। सब संगति का असर होता है। इसकी संगति बेकार है। घर में तो हमने सब बच्चों को बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं। इसका सबसे छोटा भाई एक बड़ी कम्पनी में डायरेक्टर है। कभी किसी तरह की गन्दी आदत उसमें नहीं है।

लेकिन आनंद के सभी दोस्त खूब शराब, गुटखा इत्यादि नशीली चीजों का सेवन करते हैं। अब जबकि यह 4 साल पहले ठीक हो गया था तो इसने लगभग 3 वर्षों तक इन सबसे परहेज रखा, लेकिन जब इसने महसूस किया कि यह पूरी तरह ठीक हो गया है तो इसने फिर से दोस्तों के बहकावे में आकर सब कुछ शुरू कर दिया।

सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि जब तक इंसान खुद नहीं चाहता या उसकी खुद की कोई इच्छा (सहमति) नहीं होती तब तक कोई उसको कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता, गलत चीजों की लत नहीं लगा सकता, जबरदस्ती कोई चीज खिला-पिला नहीं सकता।

इसके बिगड़ने का एक कारण इसकी माँ भी है। मेरा तो सारा दिन स्कूल आने-जाने में ही और घर के बाकी कामों में निकल जाता था, समय का पता ही नहीं चलता था। इसकी माँ सब जानती थी कि यह किसकी संगति में रहता है और किन-किन गलत आदतों में पड़ गया है। यह बहुत बार शराब पीकर आया लेकिन इसकी माँ ने इस बात को मुझसे हमेशा छुपाया। इसको मेरी नज़रों से दूर रखा।

मुझे इस बात की भनक भी न पड़ने दी कि ये बिगड़ गया है, शराब पीने लगा है। मेरे सामने कभी इसने और इसके भाई-बहनों ने कोई गलत हरकत नहीं की, जो मैं इनको टोकता या रोकता। ज्यादा लाड़ प्यार करने से भी बच्चे बिगड़ जाते हैं। बच्चे तब भी बिगड़ जाते हैं जब पति-पत्नी में से कोई एक भी बच्चों के गलत कामों या आदतों पर पर्दा डालता है या उसको प्रोत्साहन देता है। इसके साथ यही हुआ।”
सर ने आगे बताया
“इतने सारे दुर्व्यसन होने के बाद भी यह लड़का अपने संस्कार को नहीं भूला। इसने अपने संस्कार नहीं छोड़े?”

“लड़का संस्कारी है? समझा नहीं सर? इस तरह की गंदी हरकतों को आप संस्कारी कहते हो?” अभिषेक ने शिकायती लहजे में सर से कहा।

“बेटा मेरे कहने का मतलब है कि इसको अच्छे बुरे, हर काम की सब समझ है। यह सुबह 4:00 बजे उठकर शौच इत्यादि से निवृत होकर.. नहा-धोकर कम से कम एक घण्टा पूजा-पाठ करता है फिर हम दोनों पति-पत्नी का आशीर्वाद लेने आता है। जिस दिन यह रात को शराब का सेवन करके सो जाता है, तो अगली सुबह यह समय पर उठ नहीं पाता और हमारा आशीर्वाद लेने नहीं आ पाता। इसको पता है कि मां-बाप का आशीर्वाद साफ-सुथरा होकर लेना चाहिए।

जिस दिन सुबह ये हमारा आशीर्वाद लेने नहीं आता.. हम समझ जाते हैं कि इसने रात में शराब पी है। अब तो खैर पिछले तीन महीने से इससे कुछ खाया-पिया ना जा रहा। पिछले तीन माह से यह रोज सुबह 5:00 बजे तक सब दैनिक कार्यों से निवृत होकर, पूजा-पाठ करके हमारा आशीर्वाद ले रहा है। दिन-रात भगवान का भजन करता रहता है। खाने में सिर्फ पतली दाल या जूस वगैरह ही ले रहा है।” सर ने अपना पक्ष रखा।

“यह कोई अच्छी बात है सर। ऐसी पूजा-पाठ का क्या फायदा? क्या भगवान की पूजा और आपका आशीर्वाद इसको बचा सकेंगे? जबकि इसके कर्म ही बेकार हैं। जब तक इंसान गलत काम करता रहेगा, गलत आदतों में पड़ा रहेगा, चाहे वह कितनी भी पूजा-पाठ कर ले, भगवान का या मां-बाप का आशीर्वाद/दुआएं ले ले। उसका भला नहीं हो सकता।

वे दुआएं उसको नहीं लग सकती। यह बात आप भी जानते होंगे। वह नहाधोकर पूजा पाठ करके आपके चरण स्पर्श करने आ जाता है और आप खुश हो जाते हैं कि कितना अच्छा और संस्कारी लड़का है। ये गलत है सर। पहले मौज लो, गंदे काम करो फिर दिक्कत होने पर भगवान की खूब पूजा पाठ करो, नुकसान पहुँचाने वाली चीजों से परहेज करके खुद को ठीक कर लो, संस्कारी बनकर दिखाओ। बहुत बढ़िया।

फिर जब पूरी तरह खुद को ठीक कर लो तो फिर से वह सब काम करने लग जाओ, वही सब गंदगी का सेवन करना शुरू कर दो जिससे दिक्कत पैदा हुई थी। यही काम बार बार करते रहो। पहले बीमार करो फिर खुद को ठीक करो। क्या यही जिंदगी है ऐसे लोगों के लिए?

खाना पीना और मौज लेना। ये लोग अपने माता-पिता, परिवार, बच्चों के बारे में क्यों नहीं सोचते? इन भैया के भी तीन बच्चे हैं, वाइफ है, क्या इन्हें उनका ख्याल नहीं आता? ऐसा काम फिर से करते हुए वे यह क्यों भूल जाते हैं कि कितनी मुश्किल से, कितना दर्द सहकार उन्होंने इस समस्या से छुटकारा पाया था?

उनके परिवार की कितनी बुरी हालत हो गयी थी.. आर्थिक रूप से कितनी दिक्कत का सामना परिवार को करना पड़ा था? क्या यह शराब, गुटखा, सिगरेट सब इतनी ज्यादा जरूरी हैं जिंदगी के लिए? परिवार के कोई मायने नहीं ऐसे लोगों की नजर में।

ऐसे व्यक्ति जीते जी किसी काम के नहीं होते, परिवार पर बोझ बने रहते हैं। इतना बचाते भी नहीं, जितना खर्च(बीमारी में)करवा देते हैं लेकिन मरने के बाद भी ऐसे लोग परिवार को किसी लायक नहीं छोड़ते। परिवार सड़क पर आ जाता है।” अभिषेक ने भी अपना पक्ष रखा।

“बेटा, लेकिन अब क्या हो सकता है? ईश्वर ने इसको फिर से एक मौका दिया था कि अपनी सभी बुरी आदतों को त्यागकर, अच्छा स्वस्थ जीवन जीने का, लेकिन इसने फिर भी गलत रास्ता चुना। अच्छे रास्ते को न चुनकर मरण का रास्ता चुना। मैं चाह कर भी इसको नहीं बदल सका।

मैं कितनी भी कोशिश कर लूं, इस पर नजर रख लूं और मैंनें रखी भी है। अगर यह खुद को बदलना ही नहीं चाहता तो कुछ नहीं हो सकता। जब तक मैं इस पर नजर रखूंगा, यह नहीं पियेगा, लेकिन नजर बचते ही शराब, गुटखा, सिगरेट सब पीने लगेगा। नशे का आदि हो गया है।

बस इतना है कि मेरी शर्म करता है। सब कुछ मेरी पीठ पीछे करता है और ऐसा करके मेरे सामने नहीं आता। बाहर चाहे सबसे लड़-झगड़ ले लेकिन मेरे से बदतमीजी से पेश नहीं आता। मेरे लिए यही काफी है। मेरे पास अब इतना पैसा तो रहा नहीं कि इसको बड़े अस्पताल में फिर से इलाज के लिए लेकर जाऊं। पिछली बार इसकी कीमोथेरेपी कराने में काफी रुपया खर्च हो गया था। यह कुछ कमाता भी नहीं है।

इसके परिवार का पूरा खर्चा मेरी पेंशन से ही होता है। अपने रिटायरमेंट पर मैंने प्राप्त सभी रुपया अपने बच्चों में बराबर बराबर बांट दिया था और खुद पेंशन पर रहने लगा था। इसने वो सब रुपया खाने-पीने में उड़ा दिया। अब ये मेरे जिम्मे है। पिछली बार वैद्य जी की दवा से इसको आराम मिला।

अब यह वहां भी जाने से इनकार कर रहा है। ईश्वर जाने अब क्या होगा इसका? भगवान इसको सद्बुद्धि दे तभी कुछ हो सकता है। नहीं तो हमारी, तुम्हारी सलाह, बातें, वैद्यजी या डॉक्टर की दवा सब बेकार है।

बहुत बार जब यह दर्द से तड़पता है, पूरी रात करवटे बदलता रहता है.. तो लगता है कि इसका मर जाना ही ठीक है क्योंकि यह अगर ठीक हो भी जाएगा तो फिर से कुछ दिनों बाद अपनी यही हालत कर लेगा। जीते जी पल पल मरने से अच्छा है कि यह हमेशा हमेशा के दर्द से छुटकारा पा जाए। हमें भी कम से कम सब्र तो आ जाएगा।” यह बोलते हुए उनकी आंखों में आंसू आ गए।

अभिषेक ने गुरु जी को सांत्वना देकर चुप कराया और उम्मीद जताई कि सब कुछ ईश्वर अच्छा ही करेंगे। गुरुजी से मिलकर जब अभिषेक अपने घर के लिए निकल रहे थे तो पूरे रास्ते वे गुरुजी और उनके लड़के आनंद के बारे में ही सोचते रहे। वे सोच रहे थे कि जब बेटा पैदा होता है तो उसके पैदा होने पर खुशियां मनाई जाती है, मिठाइयां बांटी जाती हैं और सीना चौड़ा करके सबको बताया जाता है कि बेटा हुआ है।

बेटे से उम्मीद जताई जाती है कि यह हमारे बुढ़ापे का सहारा बनेगा, हमारा नाम रोशन करेगा। कहीं ना कहीं हम उस बेटे को पाकर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे होते हैं। लेकिन अगर बेटा बड़ा होकर.. कुछ कामधाम न करके इस तरह की गंदी आदतों(दुर्व्यसन) में पड़ जाए तो सच में मां-बाप के लिए जीते जी मरण होता है।

बहुत बार ऐसे बेटों के लिए माँ-बाप कहते नजर आते हैं कि कपूत, पैदा होते ही मर क्यों न गया? वैसे तो इन नशीले पदार्थों का सेवन करने से बचना चाहिए लेकिन अगर ज्यादा ही मन कर रहा हो तो किन्हीं विशेष अवसर पर शराब, गुटखा, सिगरेट इत्यादि का सेवन किया जा सकता है, लेकिन इनका अत्यधिक सेवन जानलेवा होता है।

हम अपने मां-बाप को, परिवार को इन बुरी आदतों को त्याग कर सच्ची खुशी प्रदान कर सकते हैं। इन बुरी आदतों को त्याग कर क्यों ना अपने परिवार को इस साल एक गिफ्ट दिया जाए?

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

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