आदिवासी समाज

आदिवासी समाज

आदिवासी समाज

संस्कृति
में हमारी
प्रेम अपार है,
प्रेम से ही सुगन्धित
सारा संसार आदिवासी समाज
ने पहल
की प्रकृति
की, प्रकृति
के बिना खवाबों
का न
कोई आकार है…”“
समय आने पर
दिखा देना कि
आपने क्या किया है मानवता

की खातिर
जरूरत से
ज़्यादा मौन
आपके पक्ष को
कमज़ोर
साबित करता है…
“जंगल के जीवों से
आपका उचित है
व्यवहारजिससे आपके यश का
होता है विस्तार…”
“माटी ने आवाज़
दी है साथियों, आज
फिर एक रण लड़ा जाए
प्रकृति के
संरक्षण हेतु
एक कदम आगे
अब और बढ़ा जाए…”
“वनों सा विशाल है अस्तित्व
हमारी संस्कृति का
इसकी शरण में जो
आया, इसने उन पर
ममता लुटाई…”

“हर प्रकार
की बुरी नज़र
से बचाकर रखेंगे
हम हमारी आस्था को
जिस आस्था द्वारा हम में करुणता
का भाव उत्पन्न
हो पाया“समय
रहते मान लो कि
बिना प्रकृति की जीवन संभव नहीं है
तड़प जाओगे
देख कर खुद के
पतन का मार्ग,
जो नासमझों जैसे तुमने व्यवहार किया…”
“प्रकृति प्रेम भावना का
श्रृंगार करती है प्रकृति
ही क्रूर भावना काप्रतिकार करती है
“पहाड़ों के
वासी हैं हम
भील मोह माया
से परे दूर कहीं
प्रकृति के नज़दीक
मन से सन्यासी हैं…
“मातृभूमि पर जो
उठती ऊँगली हैं, हम
हर उस ऊँगली को
उखाड़ फेकेंगे
चाहे कोई देखे या
न देखे हमें, हम
हमारी सभ्यता को
जीवन भर देखंगे…”

“हम उन्हीं वीरों की संतान हैं
अपना सुख चैन हँसकर
गवाया था“समय ने हर
बार हमारी वीरता को
परखा है हम
भी आत्म सम्मान
के लिए जीवन भर
जूझते रहे…”“जीत की जयकार हैं,

हम प्रकृति का
विस्तार हैं जो रोके
हमारे क़दमों को, हम
हर उस बुराई का संहार

हैं आदिवासी ने
महत्वकांक्षाओं
को कभी माटी से
बढ़कर नहीं देखा जहाँ

माटी ने
आवाज़ लगाई,
हमने हंसकर
बलिदानकिया आदिवासी

के अस्तित्व
पर इतिहास न
मौन रह पाता है
मातृभूमि की मर्यादा
पर जैसे गीत शौर्य का

बीएल भूरा भाबरा

जिला अलीराजपुर मध्यप्रदेश

यह भी पढ़ें :-

Similar Posts

  • मासूमियत | Masoomiyat par Kavita

    मासूमियत ( Masoomiyat )    मासूम सी वो भोली भाली सूरत वो अल्हड़पन इठलाता सा निश्चल निर्भीक मासूमियत चेहरा कोई अनजाना सा दुनिया के आडंबर से दूर अपने आप में मशगूल बेखबर जहां के दुष्चक्रो से खिलता सा प्यारा फूल मधुर सी मिठास घोलता प्यार भरे मृदु वचन बोलता मासूमियत भरी नैनों में लगा बचपन…

  • Hindi Kavita | Hindi Poetry -गलतफहमी!

    गलतफहमी! ( Galatfahmi ) ***** वो समझते हैं समझते नहीं होंगे लोग। वो उलझते हैं पर उलझते नहीं हैं लोग। वो सुलगाते हैं पर सुलगते नहीं हैं लोग। उम्र कद कर्म अनुभव संस्कार की कमी, लहजे से ही दिख जाता है, हर कहीं। कुछ ज्यादा ही उछलते है वो, आका के संरक्षण में पलते हैं…

  • जीत की आदत | Kavita jeet ki aadat

    जीत की आदत  ( Jeet ki aadat )  जीत की आदत बनाना ही होगा, ना करें बहाना आगे बढ़ना होगा। झूल रहीं उनकी मझधार में नैया, जो परेशानियों से घबराया होगा।।   जीतने का‌ जज़्बा रहता सब को, जीत लेते है जो पक्के ‌ठान लेते। सो बातों की है यह एक ही बात, निड़र होकर…

  • सामाजिक चिंतन | Samajik Chintan

    सामाजिक चिंतन ( Samajik chintan )    सामाजिक चिंतन, यथार्थ से आदर्श की ओर जननी जन्म भूमि गौ माता, अंध भौतिक युग शिकार । बढते वृद्धाश्रम भू विदोहन अवारा गायें, संकेत अनैतिक जीवन विकार । उपर्युक्त त्रि दैवीय मातृ आभा, फिर वंदन समग्र प्रयास पुरजोर । सामाजिक चिंतन, यथार्थ से आदर्श की ओर ।। वासनमय…

  • जाऊँ क्यों मैं घूमने

    जाऊँ क्यों मैं घूमने ( कुण्डलिया ) जाऊँ क्यों मैं घूमने, सारे तीरथ धाम।कण-कण में हैं जब बसे, मेरे प्रभु श्री राम। मेरे प्रभु श्री राम, बहुत हैं मन के भोले।खाये जूठे बेर, बिना शबरी से बोले। सच्ची हो जो प्रीत, हृदय में तुमको पाऊँ।तुम्हें ढूंढने और, कहीं मैं क्यों कर जाऊँ। डाॅ ममता सिंहमुरादाबाद…

  • मैं माटी का दीपक हूँ

    मैं माटी का दीपक हूँ जन्म हो या हो मरणयुद्धभूमि में हो कोई आक्रमणसरण के अग्निकुण्ड का हो समर्पणया पवित्र गंगा मे हो अस्थियों का विसर्जनमैं जलाया जाता हूँमाटी का दीपक हूँ ….अंत में इसी रजकण मे मिल जाता हूँमैं माटी का दीपक हूँमाना की नहीं हैसूर्य किरणों सी आभा मुझमेचंद्र सी नहीं है प्रभाअसंख्य…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *