आह ग़म की रोज़ मिलती खूब है
आह ग़म की रोज़ मिलती खूब है

आह ग़म की रोज़ मिलती खूब है

 ( Aah gam ki roz milti khoob hai )

 

आह ग़म की रोज़ मिलती ख़ूब है!

आँखें  रहती  रोज़  गीली  ख़ूब है

 

ए ख़ुदा भर दें ख़ुशी दिल में मेरे रहती

दिल  में  ग़म  की गाह जलती ख़ूब है

 

नफ़रतों के ख़ंजर मारे है इतने

कर  गया  वो  जख़्मी  ख़ूब है

 

ए ख़ुदा उससे मिला दें अब मुझे

याद जिसकी दिल में रहती ख़ूब है

 

पर किसी से ही वफ़ाये कब मिली

दोस्ती की  जिसकी गहरी ख़ूब है

 

ग़ैर आँखें वो दिखाकर “आज़म”को

जख़्म  दिल  में  रोज़ करती ख़ूब है

 

 

❣️

शायर: आज़म नैय्यर

(सहारनपुर )

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