अब चली आओ

अब चली आओ

अब चली आओ

तेरी राहों में हर दिन गुजरता है,
तेरी यादों में हर पल सिसकता है,
दिल को समझाऊँ कैसे,
अब तुम ही बताओ,
अब नहीं सहा जाता, बस जल्दी से चली आओ।

सपनों में आकर फिर दूर चली जाती हो,
दिल की पुकार को अनसुना कर जाती हो,
बेकरार दिल को अब और ना तड़पाओ,
अब नहीं सहा जाता, बस जल्दी से चली आओ।

हर शाम तन्हाई में डूब जाती है,
तेरी जुदाई हर सांस पर भारी पड़ जाती है,
टूटे इस दिल को अपनी मुस्कान से सजाओ,
अब नहीं सहा जाता, बस जल्दी से चली आओ।

बरसातें भी अब उदास हो चली हैं,
सजती बहारें भी वीरान हो चली हैं,
इन वीरानों में फिर से बहार बन जाओ,
अब नहीं सहा जाता, बस जल्दी से चली आओ।
अब नहीं सहा जाता, बस जल्दी से चली आओ।

कवि : प्रेम ठक्कर “दिकुप्रेमी”
सुरत, गुजरात

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