आधुनिक आयुर्वेद ऋषि है : आचार्य बालकृष्ण
भारत के जन-जन में जहां एलोपैथिक दवाओं का साम्राज्य फैला हो उनके बीच जिस व्यक्ति ने घर-घर में आयुर्वेद की अलख जगाया उनमें आचार्य बालकृष्ण का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
उनका जन्म 4 अगस्त 1972 ई को हरिद्वार के उत्तराखंड में हुआ था। इनकी माता का नाम सुमित्रा देवी एवं पिता का नाम जय वल्लभ है।
अपने माता-पिता के प्रति उद्गार व्यक्त करते हुए आचार्य श्री कहते हैं –” बंदनीय जन्मदात्री मां जिन्होंने इस धरा पर लाने के लिए मुझे 9 माह तक अपने गर्भ में धारण किया मेरे हृदय में जो शुभ संस्कार और शुद्ध भाव और जीवन में जो करने की तमन्ना है यह सब उस ममतामई जो अक्षर ज्ञान शून्य होने पर दृढ़ संकल्पी , कठोर परिश्रमी, विभिन्न परिस्थितियों में भी निर्भय रहने वाली है।
ऐसी तपस्वी मां श्रीमती सुमित्रा देवी की तपस्या व उनके द्वारा किए गए संस्कारों का प्रतिफल है कि अनवरत कार्य व्यस्तम दिनचर्या होने पर भी यह तन मन थकान व्याधि तनाव अवसाद से रहित बना हुआ है।”
नाना विधि कष्टों को सहते हुए एक संत की तरह जीवन यापन करते हुए भी जो गृहस्थ आश्रम में जाने की इच्छा से रहित थे ।
बाल विवाह के प्रचलन काल में भी 30 वर्ष जिन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत का पवित्रता के साथ पालन किया जिन्हें गांव वाले जंगली कह कर पुकारते थे क्योंकि उन्होंने संतों की तरह केश व दाढ़ी मूंछ बड़ा रखे थे परंतु घर वालों के अत्यधिक आग्रह पर गृहस्थ आश्रम में प्रवेश किया ऐसे पिता श्रद्धा श्री वल्लभ जी की प्रथम संतति के रूप में इस संसार में आने का अहो भाग्य प्राप्त हुआ।”
आचार्य श्री के द्वारा माता-पिता के प्रति जो उद्गार व्यक्त किए गए हैं वह वर्तमान समय के माता-पिता के लिए पद प्रदर्शक बन सकते हैं।
बचपन से ही वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गुरुकुल में ही हुई। गुरुकुल की दिनचर्या पालन करने में वह सदैव सतर्क रहते थे। कभी शिकायत का मौका नहीं देते थे।
प्रातः काल 4:00 बजे से ही आपकी दिनचर्या दैनिक नित्य कर्म के पश्चात योगाभ्यास से शुरू होती थी। आपकी विशेष रुचि दंड बैठक और सूर्य नमस्कार में थी । इससे आपका शरीर इतना बलिष्ठ और स्फूर्तिवान हो गया था कि हर कार्य को वह चुटकियों में निपटा दिया करते थे।
बचपन से ही दीन दुखियों की सेवा करने का भाव आप में रहा करता था । वह मात्र एक ही बात का चिंतन किया करते थे कि क्या किया जाए कि जिससे लोगों का दुख दर्द और कष्ट दूर हो।
गुरुकुल खानपुर नारनौल में शिक्षा के दौरान ही आपकी मुलाकात स्वामी रामदेव जी से हुई । दोनों दो जिस्म एक जान बनकर पीड़ित मानवता की सेवा में आज भी अग्रसर हैं–
जिसमें दो होकर भी दिल एक हो अपने ऐसे ,
मेरा आंसू तेरी पलकों से उठाया जाए।।
कहते हैं कि अभाव मनुष्य को जीना सिखा देता है स्वामी जी के साथ जैव विविध थे तो उसे स्थिति का वर्णन करते हुए आचार्य जी कहते हैं एक दिन ऐसा था जब इस दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट का रजिस्ट्रेशन करने के लिए मात्र ₹12000 की आवश्यकता थी लेकिन किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि हम लौट पाएंगे या नहीं अत इतनी राशि एकत्र करने के लिए चार लोगों से उधार लेना पड़ा था।
आज वही दिव्य योग मंदिर का ट्रस्ट पतंजलि योगपीठ के रूप में देश व दुनिया के करोड़ों लोगों तक पहुंच चुका है जो जीवन में निराश होकर अपना मार्ग छोड़ देते हैं।
उनके बारे में आचार्य श्री कहते हैं -” देखो यदि आपका लक्ष्य पवित्र हो, ऊंचा हो , आप पुरुषार्थ करने में कभी नहीं घबराते हो , ईश्वर की कृपा का पल-पल अनुभव करते हुए उसी की साक्षी में कर्म करते रहते हो, तो एक दिन आप निश्चित रूप से सफलता की बुलंदी को छू सकोगे।”
आचार्य जी के जीवन संघर्षों को यदि हम अपने जीवन में भी अपना सके तो हमारा हम भी अपने जीवन में सफल हो सकते हैं।

योगाचार्य धर्मचंद्र जी
नरई फूलपुर ( प्रयागराज )







