अनकही बातें!

अनकही बातें | Ankahi baatein poetry

अनकही बातें

( Ankahi baatein )

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कुछ न कहते हुए भी
बहुत कुछ कह जातीं हैं
अनकही बातें!
सोच सोचकर हम लेते हैं
गहरी गहरी सांसें!
कुछ तो बात होगी?
क्या बात होगी?
इस संवादहीनता की!
जरूर खास होगी?
जो उसने नहीं बताई,
हमसे नहीं जताई!
बिन कहे छोड़ गई?
मुझे रूला गई।
इस दर्द की दवा नहीं कोई!
रात भर नींद नहीं आई,
समझे भाई !
जाते वक्त आंखें भी न मिलाई ;
यह बात अबतक समझ न आई ।
सोचता हूं जाकर मिलूं,
बात क्या है समझूं?
जानूं नाराजगी का राज,
ढंग से नहीं कर पा रहा हूं कोई काज।
ऐसे तो नहीं चलेगा,
कोई निर्णय तो लेना पड़ेगा।
लेकिन पहले एक बार समझ लूं,
सोच लूं हर एक पहलू।
सुलह की गुंजाइश होगी-
तो झुककर भी मना लूंगा,
उसकी हर बात मान लूंगा।
वरना तेरी खुशी ही मेरी खुशी!
उफ़! ये बातें अनकही,
इस हद तक ले आएगी;
मेरी खुशियां ही मुझसे दूर चली गई।
क्या करें?
इंतजार करना ही बेहतर है-
गाड़ी एक पहिए पर तो नहीं चलती!
जिस दिन समझेगी?
लौटकर खुद ही आएगी!
जिंदगी पुनः संवर जाएगी।

?

नवाब मंजूर

लेखक– मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर

सलेमपुर, छपरा, बिहार ।

 

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