अपनें ही हुस्न पे उसको गरूर है
अपनें ही हुस्न पे उसको गरूर है

अपनें ही हुस्न पे उसको गरूर है

( Apne hi husn pe usko guroor hai )

 

अपनें ही हुस्न पे उसको गरूर है !

उल्टा दिमाग़ में उसके फ़ितूर  है

 

मत दो सजा इसे झूठी बेवजह

मासूम  ए लोगों  ये  बेक़सूर है

 

है आरजू ये ही अपना बनाना उसे

 की मांग का होना उसके सिंदूर है

 

जो पास पास मेरे रहता था हर पल

की आजकल वो रहता दूर दूर है

 

सूखा है फ़ूल नफ़रत की तो आच से

कब फ़ूल प्यार का उसको मंजूर है

 

जो दें गया सजा ग़म अश्क़ आंखों में

ये प्यार करने का इतना  क़सूर है

 

आज़म का ही नहीं जो होना चाहता

दिल में चढ़ा उसका ही सुरूर है

 

❣️

शायर: आज़म नैय्यर

(सहारनपुर )

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