Avnish Kumar Gupta Poetry

अवनीश कुमार गुप्ता ‘निर्द्वंद’ की कविताएं | Avnish Kumar Gupta Poetry

बरखा की गोद में सोती संध्या

घन गगन में गूँज रही बादल की मंद पुकार,
धरती के आँगन में झर-झर मोती की बौछार।

सूरज की लाली थककर पथ से धीरे खो जाए,
बूँदों की चादर में संध्या चुपके सो जाए।

पीपल की डाली से टपके मोती-से आँसू,
भीगती हवाओं में छुप जाए दिन का मानसू।

दीपक की लौ भी झूमे जलते-जलते हँसकर,
बरखा के गीत सुनाए झींगुर हल्की फुसफुसाकर।

सांझ की गोदी में घिर आए नील घटाएँ,
मानो नभ ने अपने रहस्य धरती को बताए।

अर्धचंद्र मुस्काए बादल की ओट में,
जैसे कोई साधक ध्यान करे मौन की चोट में।

बूँद-बूँद बहते हैं समय के अमृत कण,
हर बूँद में छुपा है जीवन का अनुपम धन।

धरती का श्वास गीला, आकाश की आँख नम,
संध्या और वर्षा संग रचें अनंत का क्रम।

शाम की परछाई में भीगता है अस्तित्व,
बरखा की गाथा कहती — सब कुछ है चिर नित्य।

निर्विकल्प ज्योति

बन्धन त्यजि निरन्तर गतिमान।
संसार मोह विमुक्त महान।।

न निज कोई, न पराय जन।
समदृष्टि, शून्य मन समर्पण।।

धूप तपस्या, छाँह विश्राम।
नित्य प्रवाह, अचल परिणाम।।

वृक्ष छत्र, भूमि शय्या बनी।
नदी कलरव, वीणा रवी।।

निज गृह तरुच्छाया, सलिल निकेत।
धारा प्रवाहमयी, जीवन चेत।।

इच्छा शून्य, निरासक्ति भाव।
सर्वस्व समर्पित, पूर्ण विलाव।।

मन रिक्त, न किंचित प्रत्याशा।
क्षण-क्षण में स्थित अद्वितीय भाषा।।

कालरहित, निर्विकल्प स्वभाव।
सांसारिक कर्म, परे प्रभाव।।

इच्छा-रहित, तृष्णा विलीन।
श्वास-श्वास में ध्यान प्रवीन।।

शून्य मन, निर्विकार हृदय।
सर्वत्र स्थित, साक्षी स्वयं।।

कालचक्र का भंग विचार।
नश्वरता का लुप्त प्रचार।।

मौन ब्रह्म स्वरूप प्रकाशित।
शब्दातीत, सत्य विधारित।।

विलीन अस्तित्व, अहंकार हीन।
शाश्वत पथ, दिव्य प्रवीण।।

न लक्ष्य कोई, न गन्तव्य जड़।
स्वयं में स्थित, निर्मल पथ।।

न पंथ, न साध्य, न लक्ष्य विचार।
मलंग स्वयं, ब्रह्माकार।।

मलंग अजात, असीम अपर।
शिव-तुल्य, मुक्त, अखण्ड भर।।

फिट इंडिया – हिट इंडिया

स्वस्थ रहेगा जब तन-मन,
तभी चमकेगा हिंदुस्तान।
शक्ति, स्फूर्ति, जोश से भरकर,
बनेंगे हम सब अभियान।

सुबह सवेरे उठो दौड़ने,
सूरज संग मुस्कान मिले।
योग, व्यायाम, ध्यान लगाकर,
आत्मशक्ति से प्राण खिले।

खान-पान में संतुलन रखो,
तन-मन को मत रोग दो।
मजबूत इरादों से आगे बढ़ो,
फिट रहो और सुख भोगो।

तन स्वस्थ, तो मन भी जागे,
हर संकट से लोहा ले।
जोश, उमंग, ऊर्जा संग,
हर बाधा को पीछे धके।

फास्ट फूड को छोड़ो पीछे,
सादा भोजन साथ रहे।
जंक फूड से रोग बढ़ेंगे,
सच्ची सेहत हाथ रहे।

मिलकर खेलो, दौड़ लगाओ,
स्वस्थ रहो हर हाल में।
रोग भागेगा दूर हमेशा,
जोश रहे हर साल में।

तन-मन की जब शक्ति जागे,
हर मुश्किल आसान बने।
फिट इंडिया – हिट इंडिया,
विश्व में पहचान बने।

चलो मिलकर शपथ उठाएँ,
फिटनेस को अपनाएँ।
स्वस्थ, समर्थ, और सशक्त,
भारत को बनाएँ!

मातृभाषा : अंतःस्वर की अनुगूंज

गूँज रही थी अनहद ध्वनि,
समय की अटूट वीणा पर।
स्वर, शब्द, अनुभूति की रेखाएँ,
भाषा की थिरकती छायाएँ।

छायाएँ जो गढ़ती इतिहास,
विचारों की ध्वनियाँ मौन के पार।
अर्थों की गहराइयों से निकली,
आत्मबोध की अजस्त्र धारा।

धारा वही जो बहती रही,
अक्षरों की अनुगूँज में।
संवेदना, चेतना, संस्कार,
भाषा में निहित जीवन विस्तार।

विस्तार जो काल से परे,
ध्वनियों में घुलती अमर पहचान।
शब्द नहीं, आत्मा की अभिव्यक्ति,
भाषा नहीं, विचारों की क्रांति।

क्रांति जो बुदबुदाती रही,
पीढ़ियों की थरथराती शिराओं में।
जड़ों से उठती चेतना की गंध,
मातृभाषा में जागती आत्मस्मृति।

आत्मस्मृति जो मिटती नहीं,
समय के स्याह अध्यायों से।
भाषा नहीं, शाश्वत आत्मगान,
मातृभाषा, मेरा अभिमान।

पढ़ाई आउटसोर्स, भविष्य रिसोर्स

परीक्षा डील हो गया,
पेपर सुबह लीक हो गया।
होश किताबों में सिमट गया,
जुगाड़ ही अब जीत गया।

मानव मशीन बनता गया,
सोच प्रोग्रामिंग में ढल गया।
भावना कोडिंग में फंसी,
दिल अब सर्किट में बसी।

सवाल अब गूगल से पूछे,
ज्ञान यूट्यूब शॉर्ट्स में बुझे।
तर्क अब चैटबॉट से मिलते,
लाइफ आर्टिफिशियल में खिलते।

मशीन मानव बनते गए,
रिश्ते नेटवर्क में अटक गए।
संवेदना ऑफलाइन हो गई,
असली दुनिया लॉगआउट हो गई।

बसंत वंदना

सरस्वती माँ, ज्ञान की दाता,
बसंत में खिले फूलों की माला।

वीणा तुम्हारी, स्वरों का सागर,
मन को करे निर्मल, मति को अगर।

श्वेत वस्त्र में, शुभ्र कमल सी,
सबके मन में ज्ञान ज्योति जगी।

बसंत पंचमी, ऋतुओं की रानी,
तुम्हारी कृपा से बुद्धि हो ज्ञानी।

विद्या की देवी, सबकी आशा,
तुम्हारे बिना जीवन है व्यर्थ।

कलम की धारा, शब्दों का मेला,
तुम्हारी छाया में जीवन खेला।

सृष्टि का सार, ज्ञान का भंडार,
तुम्हारे चरणों में सबका आधार।

मूक को वाणी, अंधे को नेत्र,
तुम्हारी कृपा से मिले सबके हेतु।

बुद्धि की धारा, मति की गंगा,
तुम्हारे बिना जीवन है अंगारा।

सरस्वती माँ, तुम्हारी महिमा,
अनंत है, अगम है, अद्भुत है रीमा।

बसंत की बहार, फूलों की सुगंध,
तुम्हारे ज्ञान से भर दे संसार।

विद्या का दीप, जलाओ हमारे मन में,
तुम्हारी कृपा से बने हम ज्ञानी।

शब्दों का जाल, भावों का सागर,
तुम्हारे बिना जीवन है अधूरा।

सरस्वती माँ, तुम्हारी कृपा से,
जीवन में हो सदा ज्ञान की रोशनी।

बसंत पंचमी, तुम्हारा त्योहार,
ज्ञान का उजाला, मन का विस्तार।

तुम्हारे चरणों में सबका निवास,
तुम्हारी कृपा से हो सबका उद्धार।

वीणा की तान, मन को करे मोहित,
तुम्हारे ज्ञान से भर दे संसार।

सरस्वती माँ, तुम्हारी महिमा,
अनंत है, अगम है, अद्भुत है रीमा।

बसंत की बहार, फूलों की सुगंध,
तुम्हारे ज्ञान से भर दे संसार।

विद्या का दीप, जलाओ हमारे मन में,
तुम्हारी कृपा से बने हम ज्ञानी।

शब्दों का जाल, भावों का सागर,
तुम्हारे बिना जीवन है अधूरा।

सरस्वती माँ, तुम्हारी कृपा से,
जीवन में हो सदा ज्ञान की रोशनी।

बसंत पंचमी, तुम्हारा त्योहार,
ज्ञान का उजाला, मन का विस्तार।

तुम्हारे चरणों में सबका निवास,
तुम्हारी कृपा से हो सबका उद्धार।

वीणा की तान, मन को करे मोहित,
तुम्हारे ज्ञान से भर दे संसार।

सरस्वती माँ, तुम्हारी महिमा,
अनंत है, अगम है, अद्भुत है रीमा।

बसंत की बहार, फूलों की सुगंध,
तुम्हारे ज्ञान से भर दे संसार।

विद्या का दीप, जलाओ हमारे मन में,
तुम्हारी कृपा से बने हम ज्ञानी।

शब्दों का जाल, भावों का सागर,
तुम्हारे बिना जीवन है अधूरा।

सरस्वती माँ, तुम्हारी कृपा से,
जीवन में हो सदा ज्ञान की रोशनी।

बसंत पंचमी, तुम्हारा त्योहार,
ज्ञान का उजाला, मन का विस्तार।

तुम्हारे चरणों में सबका निवास,
तुम्हारी कृपा से हो सबका उद्धार।

अवनीश कुमार गुप्ता ‘निर्द्वंद’
प्रयागराज

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