बदलाव की नींव | Badlav ki Neev

श्याम एक सामान्य घर का लड़का था। वह विश्वविद्यालय परिसर के हॉस्टल में रहता था । एक दिन देखता है कि बहुत से बच्चे खेल रहे हैं तो उनसे बातचीत किया । उसे पता चला कि यह सब मजदूर के बच्चे हैं जो माता-पिता के साथ ऐसे टहलते हैं । यह कहीं पढ़ने लिखने भी नहीं जाते।

श्याम की इच्छा हुई कि इन्हें पढ़ाया जाए । परंतु दैनिक दिनचर्या बहुत कठिन थी उसके बीच समय निकालना बहुत मुश्किल काम था। परंतु वह समय निकाल कर उन बच्चों को पढ़ाने लगा ।

लेकिन बच्चे ऐसे की पढ़ाई के समय एक भी नहीं दिखता। यदि बुलाने जाओ तो भाग कर दूसरी ओर चले जाते हैं अर्थात एक बार पढ़ाने के पहले श्याम को छड़ी लेकर पूरे विश्वविद्यालय परिसर में जहां भी बच्चे होते वहां दौड़ना पड़ता। परंतु वह भी हार नहीं मानने वाला था।

धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ते बढ़ते 40 से 50 तक पहुंच गई । सुविधा के नाम पर कुछ भी नहीं था । ना तो विश्वविद्यालय प्रशासन कुछ इन बच्चों के लिए करना चाहता था ना ही मजदूरों के रहनुमा ठेकेदार। श्याम ने सोचा यदि बच्चों को सरकारी स्कूलों में दाखिला करा दिया जाए तो कुछ समाधान निकल सकता है ।

इसके लिए उसने पास के ही प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य से संपर्क किया। वह तैयार हो गई पर शर्त रखी कि बच्चे जब मर्जी हो तब नाम कटा कर ना भाग जाएं। इसकी जिम्मेदारी तुम्हें लेनी पड़ेगी ।तभी मैं दाखिला लूंगी ।

अंत में जो बच्चे विद्यालय जा सकते उनका दाखिला करा दिया। बच्चों के साथ से श्याम उनको विद्यालय तक शुरू शुरू में पहुंचाने जाता क्योंकि बच्चों के माता-पिता उस समय काम में जाते थे।

श्याम के लिए काम बढ़ गया। सुबह दैनिक नित्य क्रिया के पश्चात योग की कक्षा में जाना फिर भोजन करना बच्चों को छोड़ना क्लास करना । सायं काल बच्चों को पढ़ाना एवं रात्रि में मजदूरों को दवा देना ।

कभी-कभी इसके लिए उसको ताने भी खाने पड़ते कि बड़ा सेवक पैदा हो गया है । कई बार तो उस पर लाक्षंन भी लगाए गए परंतु कभी विचलित नहीं हुआ क्योंकि सच को कैसी आंच। उसने सोचा जब मेरा हृदय पवित्र है कोई कुछ नहीं कर सकता ।

इन सब कार्यों में उसका संभल बनी डॉक्टर मनीषा जो कि वही की क्लीनिक में सेवा दे रही थी ।उन्होंने कहा –” देखो भैया! तुम कभी घबराना मत यहां के लोग ऐसे हैं जो होगा मैं देख लूंगी कोई माने या ना माने परंतु यह मजदूर तुम्हारा उपकार जरूर मानेंगे।”

श्याम की कर्मठता रंग लाई। सभी बच्चे 70% से अधिक अंकों से सफल हुए । विद्यालय की प्राचार्य ने कहा -“आपने कीचड़ से कहा हीरे मोती खोज लाए । आलम यह था कि जनाब उन मजदूर बच्चों के सामने खाते पीते घरों के बच्चों की लात भी नहीं लगी।

अब श्याम को मजदूर लोग अपना मसीहा मानने लगे परंतु उसको इन सब का कोई अहंकार नहीं था ।उसका मात्र मकसद यही था कि इस जीवन में किसी का भला हो जाता है तो इसमें मेरा सौभाग्य है ।आगे उसने प्रयास किया कि कार्यकर्ताओं एवं मजदूर बच्चों में समानता हो परंतु इस काम में उसे सफलता नहीं मिल सकी।

इसका मूल कारण सोचने पर उसको लगा कि यह सब जातिवादी आकार के कारण है। जहां मजदूर अधिकांश अति पिछड़े वर्ग के हैं वहीं कार्यकर्ता उच्च जातियों के लोग हैं। हम कितने भी ढोल पीटते रहे परंतु जातिगत अहंकार के बीज से अपने बच्चों को नहीं बचा सके हैं।

इतिहास में आंख खोलकर देखा जाए तो यही दिखेगा की जाति अहंकार के ही कारण हम हजारों वर्ष गुलामी के जंजीरो में जकड़े रहे ।

धीरे-धीरे वह समय भी आ गया है उसे विश्वविद्यालय छोड़कर जाना पड़ेगा। हजारों आखों में गीली हैं अपनों को छोड़कर जाते देखकर ।

अब कौन हमें यहां ऐसा प्यार करेगा श्याम को लोगों के प्रेम को देखकर खुशी के आंसू छलक पड़े । उसे खुशी है कि आने वाली पीढ़ी को एक दिशा दिखा दिया है कि समाज में सेवा करना हो तो कैसे करनी चाहिए।

नोट – यह कहानी सत्य घटना पर आधारित है। एक बार पढ़कर प्रतिक्रिया जरुर दे।

 

योगाचार्य धर्मचंद्र जी
नरई फूलपुर ( प्रयागराज )

यह भी पढ़ें :-

सफलता का राज | Safalta ka Raj

Similar Posts

  • आराम

    “यहाँ क्या कर रहे हो?” अस्पताल में वेंटिलेटर पर अशोक को लेटा देखकर विनोद ने पूछा। “आराम” अशोक ने जवाब दिया “वो तो दिख रहा है। यह सब कैसे हुआ?” “बड़े भाई, हर समय काम, काम और काम। काम के सिलसिले में मैंने आराम करने का बिल्कुल ध्यान नहीं रखा। नतीजा यह हुआ कि अब…

  • PROMISE (वादा ) – (दूसरा भाग ) | Promise Hindi kahani

    PROMISE (वादा )  (A typical love story)      PART-2      ●●●●● यह तो खुशकिस्मती रही कि आकांक्षा और उसका परिवार जुलूस में शामिल न होकर आश्रम में ही रहा।मैं भगवान का लाख-लाख शुक्रगुजार हूं। उस त्रासदी को बीते हुए 15 दिन होने को हैं लेकिन वह हादसा भुलाए नही भूलता। उस मंजर की…

  • मौन | Laghu katha maun

    मौन ( Maun )   सुधा ने अपने पति से पूछा रोज की तरह उसकी आदत थी बाहर जा रहे हो कब तक लौट आओगे l यह जानकारी वह जानकारी हासिल करने के लिए नहीं लेती थी l या उन पर पहरेदारी नहीं करती थी l बल्कि वह जानना चाहती थीl यदि देर से आ…

  • अनमोल तोहफा : बाल कहानी

    न्यू ईयर चार दिन बाद आने वाला था। 10 वर्षीय राजू की मम्मी सन्ध्या का बर्थडे इत्तेफाक से न्यू ईयर पर ही पड़ता था। अपनी मम्मी के जन्मदिन पर राजू ने अपनी मम्मी को गिफ्ट देने का प्लान बनाया। उसने बातों बातों में अपनी मम्मी से पूछा:-“मम्मी जी, इस न्यू ईयर पर आपके जन्मदिन के…

  • पर्वत पर्वत शिखर श्रृंखला | Parvat parvat shikhar shrinkhala

    पर्वत पर्वत शिखर श्रृंखला ( Parvat parvat shikhar shrinkhala )   पर्वत पर्वत शिखर श्रृंखला, मेघ दिखे घनघोर घटा। अवनि को अम्बर ने देखा,प्रेम मिलन की प्रथम छंटा। आएगी ऋतु बार बार पर, प्रियतम बोलो कब आओगे, कल कल छल छल निर्मल जल,सागर मे मिलती खोल जटा।   उपरोक्त कविता सुनने के लिए ऊपर के…

  • मानव धर्म | Ek laghu katha

    हर हर गंगे जय राधे कृष्ण आदि उच्चारणों के सत्तो मौसी हमेशा ही सब सुगह मन्दिर जाती उनकी पूजा टोकरी हमेशा ही सामग्री से भरी रहती वह अपनी पूजा की टोकरी का ध्यान से ज्यादा रखती कोई उनकी टोकरी के पास से भी जाये यह उन्हें मन्जूर नहीं था। खासकर वह छोटी वालो से हमेशा…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *