बंदरों का अमर प्रेम | Bandaron ka Amar Prem

हमने मनुष्य में लैला मजनू हीर रांझा आदि के अमर प्रेम की कहानी बहुत पढ़ी है लेकिन बंदर जैसे जीव भी इतने एक निष्ट प्रेमी हो सकते हैं कहना मुश्किल है।

प्रेम एक प्रकार की मानसिक स्थिति है। इसका प्रवाह जिस ओर होगा उसी तरह के परिणाम भी प्राप्त होंगे। प्रेम का सहज और सरल प्रवाह नैसर्गिक कार्यों में होता है। पानी सदैव ऊपर से नीचे की ओर बहता है। किंतु किसी पेड़ की जड़ों द्वारा शोख लिया जाता है तो वही मधुर फलों, सुंदर फूल और शीतल छाया में परिवर्तित हो जाता है।

एक बाग में बंदरों का झुंड रहता था। उस बंदरों के झुंड में एक बंदर और बंदरिया में गहरी मित्रता हो गई । दोनों जहां जाते साथ-साथ जाते । कुछ खाने पीने को मिलता तो यही प्रयत्न करता है कि इसका अधिकांश हिस्सा उसका साथी खाए । कोई भी वस्तु उनमें से एक ने कभी अकेले ना खाई ।

उनकी इस प्रेम भावना से मनुष्य को कुछ सीख लेनी चाहिए। किसी भी प्रकार का संकट आया हो उनमें से एक ने अविश्वास का परिचय नहीं दिया। अपने मित्र के लिए वें सदैव प्राणोत्सर्ग तक करने के लिए सदैव तैयार रहते थे।ऐसी थी उनकी अविचल प्रेम निष्ठा।

एक बार की बात है । बंदरिया कुछ समय बाद बीमार पड़ गई ।बंदर ने उसकी दिन रात भूखे प्यासे रहकर सेवा की । परंतु बदरिया बच ना सकी । मर गई ।बंदर के जीवन में मानों ब्रजपात हो गया हो। उसके बाद वह गुमसुम जीवन बिताने लगा।

जानवरों में विधुर विवाह पर प्रायः किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं है । एक साथी के न रहने पर नर हो या मादा अपने दूसरे साथी का चुनाव खुशी-खुशी कर लेते हैं। इस बंदर दल में कई अच्छी-अच्छी बंदरिया थी । बंदर हष्ट पुष्ट था। किसी नई बदरिया को मित्र चुन सकता था ।

परंतु उसके अंतःकरण का प्रेम स्वार्थ और कपट पूर्ण नहीं था । पता नहीं शायद उसे आत्मा के अमरत्व ,परलोक, पुनर्जन्म पर विश्वास था । इसलिए उसने फिर किसी बदरिया से विवाह नहीं किया।

प्रेम के प्रति पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य कहते हैं -” आत्मा जिस धातु की बनी है। वह प्रेम के प्रकाश से ही जीवित रहती है ।प्रेम विहीन जीवन तो नर्क समान लगता है। प्रेम में हिंसा नहीं बल्कि दया करुणा का निवास होता है। प्रेम में व्यक्ति अपना अहित करने वालों के प्रति भी दया करुणा की भावना रखता है । उनके सुधार के लिए शुभकामना करता है।”

आगे वे कहते हैं -“मनुष्य का जैसा दृष्टिकोण चिंतन होता है वैसा ही उसके लिए यह संसार दिखाई देता है । मनुष्य जब दूसरों से प्रेम करता है तो दूसरे भी उसे प्रेम करते हैं । उसके प्रति सहानुभूति रहते हैं प्रेम से ही प्रेम मिलता है।
उस बंदर ने अपनी निष्ठा पर आंच ना आने दिया । उसने संकल्प कर लिया होगा तभी तो दूसरा विवाह नहीं किया । परंतु आत्मीयता की प्यास कैसे बुझें?

अब बंदर सब में बदरिया का ही स्वरूप देखने लगा। उसे अब किसी से घृणा , द्वेष, नफरत नहीं रह गई। वह सबसे प्रेम करने लगा। अब उसने हर दिन दुखी में आत्मा के दर्शन करने और सबको प्यार करने का सिद्धांत बना लिया उसे ही उसे शांति मिलती।

बंदर एक स्थान पर बैठा रहता। अपने कबीले या दूसरे कबीले का कोई अनाथ बंदर मिल जाता तो वह उसे प्यार करता। खाना खिलाया करता,भटक गए बच्चे को ठीक उसकी मां तक पहुंचाया करता, लड़ने वाले बंदरों को अलग-अलग कर देता, इसमें तो वह कई बार अति उग्र पक्ष को मार देता था परंतु तब तक चैन नहीं लेता था जब तक उनमें मेलजोल नहीं करा देता। उसने कितने ही वृद्ध अपाहिज बंदरों को पाला, कितनो ही का बोझ उठाया। बंदर के इस निष्ठा ने उसे सब का आत्मीय बना दिया।

आखिर मनुष्य बंदरों से क्यों नहीं सीख लेता। आज किसी कि पत्नी यदि गुजर जाती है तो दूसरे दिन लोगों की लार टपकने लगती है। कई बार देखा गया है कि अपने सामान बराबर बच्चे होते हुए भी लोग दूसरी शादियां कर लेते हैं। ऐसे लोगों को बंदरों के इस आत्मीय प्रेम से सीख लेनी चाहिए।

जिस पत्नी के साथ जीवन भर जीने मरने के कसमें खाईं थी।वह कुछ दिनों बाद कैसे रफू चक्कर हो जाती है। क्या मनुष्य बंदरों से भी गया गुजरा हो चुका है? आज इस पर चिंतन करने की आवश्यकता है।

योगाचार्य धर्मचंद्र जी
नरई फूलपुर ( प्रयागराज )

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