Be Mausam Barsat par Kavita

बेमौसम बरसात | Be Mausam Barsat par Kavita

बेमौसम बरसात

( Be mausam barsat ) 

 

ओला आंधी तूफां आए, घिर आई काली रात।
धरती पुत्र सुस्त हो गए, हुई बेमौसम बरसात।

फसल खड़ी खेत रबी की, आने को हुई वैशाखी।
जमीदार मुंह ताक रहा, अब कर्ज चुकाना बाकी।

बिन बुलाए मेहमान आए, ज्यों बेमौसम बरसात।
अपने भी मुंह फेर रहे, ना पूछे कैसे गुजरी रात।

प्रेम सलोना कहां गया, कहां गई सुहानी बात।
स्वार्थ में सब झूल रहे हैं, करें घात पे प्रतिघात।

ईर्ष्या द्वेष की आंधी में, चौपट हुई फसलें सारी।
संस्कारों का हनन हो गया, संस्कृति लुप्त हमारी।

अपने-अपने रस्ते देखें, टूट गई रिश्तो की डोर।
बेमौसम बरसात ले गई, सब नई सुहानी भोर।

टूट गया छप्पर सारा, टूट रहे हैं सारे अरमान।
कहर बन बरस रहा है, कुदरत का फरमान।

 

कवि : रमाकांत सोनी

नवलगढ़ जिला झुंझुनू

( राजस्थान )

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